चींटियों की जीवनशैली और परस्पर सम्पर्क (Ant life in Quran)

हो सकता है कि अतीत में कुछ लोगों ने पवित्र क़ुरआन में चींटियों की उपरोक्त वार्ता देख कर उस पर टिप्पणी की हो और कहा हो कि चींटियां तो केवल कहानियों की किताबों में ही बातें करती हैं। अलबत्ता निकटतम वर्षो में हमें चींटियों की जीवन शैली उनके परस्पर सम्बंध और अन्य जटिल अवस्थाओं का ज्ञान हो चुका है। यह ज्ञान आधुनिक काल से पूर्व के मानव समाज को प्राप्त नहीं था।
अनुसंधान से यह रहस्य भी खुला है कि वह “जीव: कीट” पतंग, कीड़-मकोड़े जिनकी जीवन शैली मानव समाज से असाधरण रूप से जुड़ी है वह चींटियां ही हैं।
इसकी पुष्टि चींटियों के बारे में निम्नलिखित नवीन अनुसंधानों से भी होती है:
क). चींटियां भी अपने मृतकों को मानव समाज की तरह दफ़नाती हैं।
ख). उनमें कामगारों के विभाजन की पेचीदा व्यवस्था है जिसमें मैनेजर, सुपरवाईज़र, फोरमैन और मज़दूर आदि शामिल हैं।
ग). कभी कभार वह आपस में मिलती है और बातचीत भी करती हैं।
घ). उनमें विचारों का परस्पर आदान प्रदान (Communication) की विकसित व्यवस्था मौजूद है।
च). उनकी कॉलोनियों में विधिवत बाज़ार होते हैं जहां वे अपने वस्तुओं का विनिमय करती हैं।
छ) सर्द मौसम में लम्बी अवधि तक भूमिगत रहने के लिये वह अनाज के दानों का भंडारण भी करती हैं और यदि कोई दाना फूटने लगे यानि पौधा बनने लगे तो वह फ़ौरन उसकी जड़ें काट देती हैं ।
जैसे उन्हें यह पता हो कि अगर वह उक्त दाने को यूंही छोड़ देंगी तो वह विकसित होना प्रारम्भ कर देगा ।
– अगर उनका सुरक्षित किया हुआ अनाज भंडार किसी भी कारण से उदाहरण स्वरूप वर्षा में गीला हो जाए तो वह उसे अपने बिल से बाहर ले जाती हैं और धूप में सुखाती हैं।
– जब अनाज सूख जाता है तभी वह उसे बिल में वापस ले जाती हैं। यानि यूं लगता है , जैसे उन्हें यह ज्ञान हो कि नमी के कारण अनाज के दाने से जड़ें निकल पड़ेंगी जिसके कारण वह दाने खाने के योग्य नहीं रह जाएंगे।

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Comments (2)
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  • rafikahmed safiullah diwan

    good work


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