सिरतून नबी (ﷺ) सीरीज | Part 15

Seerat un Nabi (ﷺ) Series: Part 15

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मेराज का सफर

मुसलमान सन ०७ नबवी में शोबे अबी तालिब में कैद कर दिए गए थे। सन् १० नबवी में बाईकाट खत्म हुआ। पूरे तीन साल दर्रे में पड़े रहे। ये साल जिस सख्ती, जिस मुसीबत और जिन तक्लीकों से मुसलमानों ने गुजारे, उन का सौवां हिस्सा भी बयान करना इस जमाने के मुसलमानों के दिलों को हिला देने के लिए काफ़ी है।

सन १० नबवी में जब बाईकाट खत्म हुआ और मुसलमान अपने घरों में वापस आए, तो ख्याल होता था कि शायद कुरैश की बेजा सख्तियों और नामुनासिब और जालिमाना जुल्मों का खात्मा हो जाएगा, वे मुसलमानों

को उन के हाल पर छोड़ देंगे। पर होने वाले वाकिआत ने बहुत जल्द बता दिया कि कुफ्फारे कुरैश पहले से भी ज्यादा सख्त जालिम साबित हुए। 

एक दिन हजरत अबू बक्र रजि० हुजूर (ﷺ) की खिदमत में पहुंचे। आप अपने मकान पर न मिले। अबू बक्र सिद्दीक रजि० बैतुल हरम की तरफ़ चल पड़े। रास्ते में अबू जहल मिला। उस ने मजाक उड़ाने की नीयत से कहा, अबू बक्र ! तुम्हारे नबी को आज मेराज हुई है। वह कहते हैं कि उन्हों ने बैतुल मक़्दिस तक सफ़र किया था, फिर आसमान पर गये और रात ही को वापस लौट आए, क्या यह यकीन करने के काबिल बात है ?

क्यों नहीं? एक रसूल कभी झूठ नहीं बोल सकता, हजरत अबू बक्र रजि० ने कहा। 

अबू जहल ने हंस कर कहा, लेकिन आज यह साबित किया जाएगा कि हुजूर (ﷺ) जो इस वक्त कह रहे हैं, सही नहीं है। मैं उन लोगों को बुलाने जा रहा हूं, जो कि बैतुल मक़्दिस में रह कर आए हैं। वे बैतुल मक़दिस और मस्जिदे अक्सा के वाक़िआत पूछेगे, देखें, तुम्हारे नबी बताते हैं या नहीं ? 

जरूर बताएंगे, तुम इम्तिहान लेना चाहते हो, ले लो, हजरत अबू बक्र रजि० ने कहा, तमाम नबियों का इम्तिहान उन की कौम ने लिया है, हुजूर (ﷺ) का भी ले लो।

अबू जहल चला गया।

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हजरत अबू बक्र सिद्दीक रजि० बैतूल हराम में पहुंचे। हुजूर (ﷺ) काबे के दरवाजे के सामने बैठे थे और आप के सामने सैकड़ों कुफ्फ़ारे कुरैश बैठे और खड़े थे। इन में कुरैश के बड़े लोग भी मौजूद थे। 

हजरत अबू बक्र रजि० ने प्यारे नबी को सलाम किया और आप के सामने बिल्कुल करीब बैठ गये।

अबू लहब ने मजाक उड़ाने के तौर पर कहा, अपने नबी से आसमान व जमीन की बातें मालूम कर लो। रात उन्हें मेराज हुई है। अर्श मुअल्ला पर खुदा के पास से हो कर आ रहे हैं। जन्नत और दोजख वगैरह सब देख कर आए हैं।

हजरत अब बक्र रजि० ने फ़रमाया, मेरा ईमान है कि हुजूर (ﷺ) ने जो कुछ फ़रमाया होगा, वह सही है। मुझे अभी-अभी अबू जहल ने बताया है, इस लिए मैं भी हुजूर (ﷺ) से वाकिआत मालूम करने के लिए आया। 

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, अबू बक्र वाकई मुझे मेराज हुई है। पहले मैं बैतुल मक्दिस गया, फिर आसमान पर पहुंचा और फिर अर्श मुअल्ला पर पहुच कर खुदा से हमकलाम हुआ।

मैं हुजूर (ﷺ) के एक-एक लफ़्ज़ पर ईमान लाया, गुजारिश है थोड़ा तफ्सील से इन वाक़िआत को सुनाएं, हजरत अबू बक्र रजि० ने कहा।

फिर हुजूर (ﷺ) ने तफसील से वाक़िआत सुनाये।

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मौजूद लोग बहुत गौर से सुनने लगे। इस मुद्दत में अबू जहल भी आ गया। उस के साथ कुछ और लोग भी आ गये। 

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया–

में सो रहा था कि जिब्रईल अलै. आये और ऊंची आवाज से कहा, ऐ मुहमम्द ! खड़े हो जाओ, तुम को परवरदिगार ने बुलाया है।

मैं तुरन्त उठा। हजरत.जिब्रईल अलै० को देखा। 

उन्हों ने कहा, ऐ मुहम्मद ! वूजू करो। 

मैं ने वुजू किया। वह मुझे अपने साथ लेकर जब सफ़ा व मरवा की पहाड़ियों के बीच पहुंचे, तो एक मकंब (सवारी), निहायत ही खूबसूरत,

खूब सजा व सजाया देखा! यह मर्कब खच्चर से छोटा और गधे से बड़ा था सीना याकूत सुख से सजा हुआ था, पीठ सफ़ेद मोती से जड़ी हुई थी। दो खूबसूरत पर दोनों तरफ़ से खुले थे कि उस की, पिंडलिया नजर न आती। 

हजरत जिब्रील ने कहा, ऐ मुहम्मद ! यह बुर्राक है, इस पर नबी सवार होते रहे हैं, आप इस पर सवार हो जाएं।

मैं तुरन्त बुर्राक पर सवार हो गया।

बुर्राक़ इस तेजी से रवाना हुआ कि मैं हैरान रह गया। मैं ने कोई ऐसी, तेज रफ्तार सवारी ही नहीं देखी थी कि उस जैसा बताऊ। और कुछ ही लम्हों में मैं एक ऐसे बहारदार इलाके में पहुंचा, जिस में खजूर.के पेड़ ज्यादा से ज्यादा खड़े थे। जमीन हरी-भरी थी। बुर्राक उस जगह रुक गया। 

हजरत जिब्रईल (अ.स) ने कहा, ऐ मुहम्मद ! यह वह जगह है, जहां आप मक्का से हिजरत कर के आएंगे। इस जगह का नाम मदीना तैयिबा है। यहां ठहर कर दो रकअत नमाज पढ़ लीजिए।

मैं ने फ़ौरन दो रकअत नमाज़ पढ़ी। 

नमाज पढ़ कर मैं फिर बुर्राक पर सवार हो गया। बुर्राक़ रवाना हुआ।

पलक झपकते ही हम एक ऐसे पहाड़ पर पहुंचे, जो जल कर काला हो गया था।

जिब्रईल ने कहा, इस पहाड़ का नाम कोहे तूर है। इस पहाड़ पर हजरत मूसा (अ.स) खुदा से हमकलाम हुआ करते थे। 

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हजरत जिब्रईल ने अभी बात खत्म भी नहीं की थी कि हम बाबुलहम पहुंचे। यहां हजरत ईसा (अ.स) पैदा हुए थे।

बुर्राक अपनी तेज रफ्तारी के साथ भागा जा रहा था। तर्फतुल ऐन में हम एक हरी-भरी जगह पहुंचे। सामने एक बहुत बड़ा किला था। किले के पास एक आलीशान मस्जिद थी। बुर्राक मस्जिद के पास पहुंच कर रुक गया। 

जिब्रईल (अ.स) ने फ़रमाया, मुहम्मद ! उतरिये, यह बैतूल मक़्दिस है और यह सामने मस्जिदे अक्सा है। मैं बुर्राक से उतरा। मुझे बहुत से लोग सफ़ेद पोश और नूरानी सूरत वाले नजर आए। उन्हों ने मुझे देखते ही ‘ऐ अल्लाह के रसूल! सलामती हो आप पर’ कहा। मैं ने सलाम का जवाब दिया। वे लोग सामने से इस तरह गायब हो गये, जैसे सुबह के वक्त चांदनी सुबह का उजाला फैलते ही गायब हो जाती है। 

मैं मस्जिदे अक्सा के अन्दर पहुंचा। मस्जिद में बहुत से आदमी मौजूद थे। मैं ने दो रकअत नमाज पढ़ी। सब लोग मेरे पीछे आकर खड़े हो गये। उन्हों ने नमाज में मेरी इक्तिदा की। 

जब मैं नमाज पढ़ कर मस्जिदे अक्सा से निकला, तो जिब्रईल ने कहा, ऐ खुदा के हबीब! आप ने पहचाना कि मस्जिदे अक्सा के अन्दर वे लोग कौन थे?

मैंने कहा, इन में से किसी को भी इस से पहले न देखा था। हजरत जिब्रईल ने कहा, ये तमाम नबी थे। 

मैं ने कहा, तुम ने पहले ही मुझे क्यों न बताया ? आओ वापस चल कर देखें और इन से मिले। 

हजरत जिब्रईल ने कहा, अब वापस जाना बेकार है। वे जहां से आए थे, वहां चले गये।

मुझे अफ़सोस हुआ।

जिब्रईल (अ.स) ने कहा, अफ़सोस न कीजिए, आप उन से फिर मिलेंगे। अब चलिए।

मैं बुर्राक पर सवार हुआ। बुर्राक आसमान पर उड़ने लगा था।

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पलक झपकते ही हम पहले आसमान पर पहुंच गये। बुर्राक हवा की तरह उसे पार कर गया। यहां मुझे फिर ऐसे सफ़ेद पोश नूरानी सूरत वाले बुजुर्ग नजर आए, जैसे मस्जिदे अक्सा के पास मिले थे। इन सब ने मुझे सलाम किया। मैं ने सलाम का जवाब दिया। 

जिब्रईल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि ये फ़रिश्ते हैं। इन फ़रिश्तों के दरमियान एक बुजर्ग बेहतरीन पोशाक पहने हुए तश्रीफ़ फ़रमा थे। मैं ने बढ़ कर उन्हें सलाम किया। उन्हों ने तपाक से जवाब दिया। 

हजरत जिब्रईल अलैहिस्सलाम ने कहा, यह तुम्हारे दादा हजरत आदम अलैहिस्सलाम हैं।

बुर्राक पर फिर सवार हुआ और पलक झपकते ही दूसरे आसमान पर पहुंच गये। यहां भी फ़रिश्ते लाइनों में खड़े थे। उन्हों ने भी मुझे सलाम किया। मैं ने सलाम का जवाब दिया। इन फ़रिश्तों के दरमियान दो बुजुर्ग अच्छे कपड़े पहने बैठे देखे। 

हजरत जिब्रईल अलैहिस्सलाम ने मुझे बताया कि इन में से एक हजरत ईसा अलैहिस्सलाम रुहुल्लाह हैं और दूसरे हजरत यह्या बिन जकरिया अलैहिस्सलाम हैं। दोनों मुझ से बग़लगीर हुए।

इन से रुक्सत हो कर हम तीसरे आसमान की तरफ़ उड़े। वहां पहुंच कर भी फ़रिश्तों का जमाव पाया। उन्हों ने भी सलाम किया और मैं ने भी सलाम का जवाब दिया। 

इन फ़रिश्तों के दर्मियान एक नवजवान निहायत खूबसूरत पोशाक पहने तकिया का सहारा लगाये बैठा था। वह मुझे देखते ही लिपट गया। हजरत जिब्रील ने बताया कि यह हजरत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम हैं।

मैं उन से विदा होकर चला और चौथे आसमान पर पहुंचा। वहां हजरत इदरीस अलैहिस्सलाम से मुलाकात हुई। पांचवें पर हजरत हारून (अ.स) से और छठे पर हजरत मूसा अलैहिस्सलाम से मुलाकात हुई।

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हजरत मूसा अलैहिस्सलाम मुझे देखते ही रो पड़े।

मैंने पूछा, ऐ कलीमुल्लाह ! आप किस वास्ते रो रहे हैं ?

हजरत मूसा अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया, इस वजह से कि तुम्हारी उम्मत मेरी उम्मत से कहीं ज्यादा जन्नत में जाएगी और कियामत के दिन तुम्हारी सिफ़ारिश सुनी जाएगी और जिस की ओर तुम इशारा करोगे वह बख्शा जाएगा, आप खुदा के चहेते पैग़म्बर हैं। काश! मुझे भी यह मंसब मिला होता। 

हजरत मूसा अलैहिस्सलाम से रुक्सत होकर हम सातवें आसमान पर पहुंचे। इस आसमान पर इतनी रोशनी और फ़रिश्तों की भीड़ थी कि इस 8 से पहले किसी आसमान पर न थी।

वहां एक मस्जिद नजर आयी। उस का नाम बैतुलमामूर था, वह बहुत खूबसूरत मस्जिद थी। मस्जिद के चारों तरफ़ फ़रिश्ते लाइन लगाए खड़े कुछ रुकूअ की हालत में थे, कुछ सज्दे में पड़े थे।

एक बुजुर्ग आदमी बैतुलमामूर से पीठ लगाये बैठे थे, वह मुझे देखते ही उठे और अपनी गोद में भरने के लिए आगे बढ़े।

जिब्रईल ने मुझे बताया कि यह हजरत इब्राहीम (अ.स) हैं। मैं भी उन से तपाक से मिला। उन्हों ने मेरा इस्तेकबाल किया और फिर रोकर कहा प्यारे बेटे ! तू जब तक दुनिया में रहेगा, परेशानियों का मुकाबला करता रहेगा। तेरी उम्मत बेहद कमजोर होगी, आज अल्लाह ने तुझे बुलाया है, तू अपनी उम्मत की बख्शीश का वायदा अपने रब से करवा लेना।

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मैंने कहा, मेरे बुजर्ग! मुझे अपनी उम्मत से मुहब्बत है। मैं उस की फलाह (कामियाबी) के लिए रब से उस वक्त तक अर्ज करता रहूंगा, जब तक वह अपनी रहमत में आ कर सारी उम्मत के बख्शने का वायदा न कर ले।

मैं उन से विदा हो कर आगे बढ़ा और एक अजीब व गरीब पेड़ के पास पहुंचा। यह पेड़ जहां तक निगाह जाती थी, वहां तक फैला हुआ था। पेड़ के बीच में एक सजा-सजाया मकान था। हजरत जिब्रईल (अ.स) ने फ़रमाया यह सिद्रतुल मुन्तहा है और यह मकान मेरे रहने की जगह है। 

वहां से मुझे एक पुर-बहार इलाके में ले गये, जिस की नजीर दुनिया के किसी इलाके में नहीं मिलती। हरा-भरा सदा बहार इलाका, फूलफल, बेहतरीन इमारतें, नहरें, खूबसूरत सड़कें, सुन्दर औरतें, सभी कुछ। हजरत जिब्रईल ने बताया, यही वह जन्नत है, जिसका वायदा अल्लाह ने मुसलमानों से किया है। अगर अल्लाह के बन्दे अपनी जाहिरी आंखों से भी एक बार जन्नत का नजारा कर लें, तो उम्र भर उसे दोबारा देखने की ख्वाहिश में परेशान रहें।

जन्नत से आगे हम एक ऐसी जगह से गुजरे, जहां आग कसरत से जल रही थी, शोले उठ रहे थे। सांप और दूसरे जानवर फुकारें मार रहे थे। गर्म-गर्म खौलता पानी बह रहा था। जक्काम के कांटेदार पेड़ खड़े थे। आग की लपट दूर तक वार कर रही थी। मैं ने उस जगह को देखते ही समझ लिया कि यह दोजख है अल्लाह के नाफरमान बन्दों के रहने की जगह। बे-अख्तियार मेरी आंखों से आंसू जारी हो गये। मैं ने कहा, ऐ खुदा ! मेरी कमजोर उम्मत को इस सजा से बचाइए।

मेरे यह कहते ही दोजख के दरवाजे बन्द हो गये।

मैं हजरत जिब्रईल के साथ आगे बढ़ा। कुछ दूर चल कर जब सिदरतुल मुन्तहा की आखिरी हद पर पहुंचा, तो हज़रत जिब्रईल ठिठक गये। 

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मैं ने कहा, ऐ भाई ! तुम रुक गये, मेरे साथ आओ। 

हजरत जिब्रईल ने कहा, हम में से, कोई ऐसा नहीं है, जिस की जगह तै न हो। मेरी मजाल इस से आगे बढ़ने की नहीं है, अगर कुछ कदम और आगे बढ़ती तजल्ली इलाही से मेरे तमाम बाल व पर जल जाएंगे। 

मैं ने जवाब दिया, तो मैं तन्हा बढ़ू ?

अब आप को तन्हा ही बढ़ना पड़ेगा, हजरत जिब्रील ने जवाब दिया।

ऐ आखिरी नबी ! तशरीफ़ ले जाइए, अब कुदरत आप की रहनुमाई करेगी। 

मैं बढ़ा, सामने एक परदा रोक था। यकायक उस परदे ने अपनी गोद में मुझे ले लिया। हजरत जिब्रईल  अलैहिस्सलाम, सिदरतुल मुन्तहा और तमाम चीजें मेरी नजरों से ओझल हो गयीं, सिर्फ़ रोशनी रह गयी।

इस रोशनी में मैं आगे बढ़ा चला जा रहा था कि एक अजीब किस्म का हरा फ़र्श बिछा हुआ देखा, निहायत मुलायम, गहरा हरा, जिस पर चलने से दिल व दिमाग को ताक़त पहुँचती थी। इस फ़र्श का नाम रफ़रफ़ था। यहां एक फ़रिश्ता सूर लिए खड़ा था। उसने मुझे सलाम किया। उस फ़रिश्ते का नाम इसराफ़ील था। यह फ़रिश्ता क़ियामत के दिन सुर फूकेगा और इस की हौलनाक आवाज मे जमीन व आसमान के टुकड़े हो जाएंगे।

ज्यों-ज्यों में आगे बढ़ता था, रोशनी अजीब और दिल में उतरने वाली होती जाती थी, नुरानी पर्दे हटते जाते थे, यहां तक कि मैं अर्श मुअल्ला के क़रीब जा पहुंचा। मेरा दिल व दिमाग़ रौबे इलाही से भर गया। अब मैं ऐसी जगह पहुंचा, जहां रोशनी न थी, बल्कि नूर था। कैसा नूर था, मेरी जबान में नुर की कैफियत बयान करने की ताकत नहीं है। न दुनिया में मैं ने कोई ऐसी चीज देखी है, जिस से उस नूर के बारे में कह सकू कि उस जैसा है।

मैं हैरान खड़ा रह गया। मेरे खड़े होते ही आवाज आयी, ऐ मुहम्मद ! नजदीक आओ।

मुझ में हिम्मत हुई और मैं आगे बढ़ा, लेकिन उस नूर के रौब से मेरा सीना भर गया।

मैं चलते-चलते ठहर जाता। मेरे ठहरते ही आवाज आती, ऐ मुहम्मद ! नजदीक आओ। 

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मैं फिर चलने लगता। आखिर में चल कर एक ऐसी जगह पहुंचा, जहां तजल्ली इलाही के साए से आगे बढ़ने की हिम्मत न हुई और बेअख्तियार मेरी ज़बान से निकला ‘अत्तहीयातु लिल्लाहि वस्सलवातु वत्तय्यिबात्।’ फ़ौरन गैब से आवाज़ आयी, ‘अस्सलामु अलै-क-अय्यु हन्नबीयुव रहमतुल्लाहि व.बरकातुह अस्सलामु अलैना व अला इबा  दिस्लाहिस्सालिहीन।’

इस आवाज के सुनते ही तमाम फ़रिश्तों ने ऊंची आवाज से कहा ‘अशह्दु अन-न मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू’ अब मैं समझ गया कि अल्लाह में और मुझ में दो कमान से भी कम फासला रह गया है। मैं बे-अख्तियार सज्दे में गिर गया।

जब मैं उठा तो रौबे इलाही से मेरा जिस्म थरथराने लगा। अल्लाह की रहमत हुई और पांच वक्त की नमाज मेरी उम्मत पर फ़र्ज हुई।

फिर मैं ने वापसी की इजाजत चाही। इजाजत मिलने पर वापस हुआ। वापस लौट कर सिदरतुल मुन्तहा के पास आया। 

हजरत जिब्रईल मेरे इन्तिजार में खड़े थे। उन्हों ने मुझे देखते ही मारे खुशी के कहा, मुबारक हो! अब में उन के साथ वापस लौटा। थोड़ी दूर चला था कि एक गजबनाक चेहरे वाला सख्त मिजाज फ़रिश्ता मिला, अगरचे उस ने मेरी ताजीम की, पर उस की पेशानी का बल न गया और उस की हर-हर अदा से संगदिली टपकती थी।

मैं उस से विदा हो कर आगे बढ़ा, रास्ते में हजरत जिब्रईल से पूछा कि यह सख्त मिजाज फ़रिश्ता कौन है ?

यह इजराईल हैं; मौत का फ़रिश्ता, हजरत जिब्रईल ने बताया । 

मैं ने हजरत जिब्रईल से कहा, मुझे इस से कुछ कहना है, आयो इस के पास चलें।

हजरत जिब्रईल मुझे मलकुलमौत के पास वापस गये!

मैं ने उन से कहा, ऐ खुदा के मुकर्रब फ़रिश्ते ! मेरी आरजू है कि मेरी उम्मत के साथ किसी कदर नर्मी और आसानी का बर्ताव करते रहना।

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उस ने कहा, ऐ उम्मत के शैदाई ! ऐ खुदा के महबूब रसूल ! मुझे अल्लाह की तरफ से हर दिन हिदायत होती रहती है कि मुहम्मद के उम्मती की रूह कब्ज करते वक्त नर्मी कीजीए। मेरी क्या मजाल है कि उसके हुक्म की नाफरमानी कर सकूँ।

मैं वहाँ से वापस लौटा। बुर्राक पर सवार हुआ। बूर्राक हवा जैसी तेजी के साथ रवाना हुआ, यहां तक कि आसमानों को पार करता हुआ मैं धरती पर आ गया। 

मुझे प्यास मालूम हुई। रूमा नामी जगह पर एक काफ़िला ठहरा हुआ था। काफ़िले वालों का ऊंट गुम हो गया था। तमाम काफ़िले वाले गुमशुदा ऊंट को तलाश करने के लिए गये हुए थे। मैंने पड़ाव के पास जाकर पानी पिया।

तनईम में एक काफिला आ रहा था। सब से आगे एक खाकी रंग का ऊंट था। उस पर काला टाट पड़ा हुआ था और दो स्याह गोनें लगी हुई थीं। मैं ने काफ़िले वालों को सलाम किया और उन्होंने सलाम का जवाब दिया। 

बुर्राक हवा जैसी तेजी से दौड़ रहा था, यहां तक कि मक्का आ गया।

सफ़ा और मरवा के दरमियान आ कर बुर्राक रुक गया। मैं उतर कर अपनी ख्वाबगाह में आया। अजीब बात यह देखो कि जंजीर पहले ही की तरह हरकत में थी और बिस्तर गर्म था। 

मुझे सख्त हैरत हुई कि कितनी जल्दी मैं मक्का मुअज्जमा से बैतुल मक़्दिस और वहां से आसमान के ऊपर और आसमानों से अर्शमुअल्ला पर से हो आया।

हजरत अबूबक्र रजि० ने जल्दी से कहा, सच कहा, ऐ अल्लाह के रसूल (ﷺ) !

उसी दिन से आप का लकब ‘सिद्दिक’ पड़ गया। 

अबू जहल ने हंस कर कहा, अबू बक्र! क्या तुम ऐसी दूर की कौड़ी और समझ में न आने वाली बातों को सही समझते हो, जिसे मुहम्मद (ﷺ) ने बयान की है ?

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इस में न समझ में आने वाली बात क्या है? अबू जहल ! 

अबू जहल ने कहा, क्या यह बात समझ से बाहर नहीं है कि मुहम्मद (ﷺ) रात ही को बैतुल मक़्दिस हो आए। यह गैर-मुम्किन है। इतनी बड़ी दूरी एक रात को तो क्या, एक हफ्ते में भी तै नहीं हो सकती।

जो लोग उस वक्त बैठे थे, सब इस अजीब बात पर हैरान व परेशान थे।

हजरत अबू बक्र रजि० ने फ़रमाया,
खुदा में सब कुछ कुदरत है। वह गैर-मुमकिन को मुम्किन कर देता है। खुदा ने जब दुनिया को पैदा करना चाहा, तो फ़रमाया, हो जा, तो वह हो गयी। जब वह ऐसी कुदरत वाला है, तो क्या उस के लिए नामुम्किन है कि वह अपने महबूब रसूल को मक्के से बैतुल मक़्दिस और वहां से आसमानों पर ले जाए और फ़ौरन वापस ले आए। 

अबू जहल हंस पड़ा, मैं बेवकूफ़ नहीं हूं। अबू बक्र ! देखो, तुम्हारे नबी का झूठ-सच अभी खुला जाता है।

अबू जहल जिन लोगों को साथ ले आया, उनसे खिताब करते हुए कहा, हाँ, तुम बैतुल मक़्दिस में अर्से तक रह चुके हो। मुहम्मद से वहां के हालात पूछो। उन लोगों ने बारी-बारी से पूछना शुरू कर दिया। मसलन बैतुल मक़दिस पहाड़ से कितनी दूरी पर है ? मस्जिद कहां है? उस में ताक कितने हैं और कितने कंगरे हैं ? आंगन कितना बड़ा है ? और बाबुल मेराज किस तरफ़ है? 

अगरचे हुजूर (ﷺ) ने रात को सरसरी नजरों से बैतुल मक़्दिस और मस्जिदे अक्सा को देखा था, न ताक गिने थे, न कंगरे गिने थे और न यह देखा था कि बैतुल मक़दिस पहाड़ से किस तरफ़ है और कितने फासले पर है, पर अल्लाह के फ़ज़्ल से इन तमाम सवालों का जवाब ऐसा तसल्लीबख्श दिया कि सवाल करने वाले हैरान रह गये।

जवाब से सवाल करने वालों को चुप्पी अपनानी पड़ी। अबू जहल का गुस्सा भड़क उठा। उस ने कहा, सवाल करने वाले मुहम्मद से मिल गये हैं, इस लिए हम इन बातों पर यकीन नहीं करेंगे।

हुजूर (ﷺ) ने पूछा, फिर तुम किस तरह मानोगे?

अबू जहल ने कहा, अब जब उस के कबीले वाला काफ़िला आएगा और उस के लोग तुम्हारे सलाम करने की गवाही देंगे, तो यकीन आ जाएगा।

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हुजूर सल्ल० ने कहा, मुझे यकीन है कि वह क़ाफ़िला आएगा, मगर कल सुबह।

बस अब किस्सा बन्द कर दीजिए, अबू जहल बोला, कब जब काफ़िला आएगा, तो तमाम झूठ-सच निकल आएगा।

मंजूर है, आप (ﷺ) ने फ़रमाया । आप (ﷺ) हजरत अबूबक्र के साथ उठ कर चले गये। थोड़ी देर में तमाम लोग उठ कर अपने-अपने घरों को चले गये।

थोड़ी देर में मेराज मुबारक की खबर तमाम मक्के में गर्म हो गयी।

जिस मुसलमान ने सुना ईमान ले आया और जिस काफ़िर ने सुना, वह हैरान रह गया।

सुबह सवेरे से ही लोग मक्के से निकल कर मदीना मुनव्वरा के रास्ते पर जा कर बैठे और काफ़िले के आने का इन्तिजार करने लगे।

जब सूरज निकला और काफ़िला न आया, तो कुफ्फ़ारे मक्का बहुत खुश हुए, बग़लें बजा बजा कर कहने लगे, अब तक भी काफ़िला न आया, इस लिए सब बातें गलत थीं।

सब ने कहा चलो, चलो, आज तो हमारी चढ़ बनी है।

ये सब लोग वापस लौटना ही चाहते थे कि धूल उड़ती नजर आयी। तमाम लोग ठहर गये और उसी ओर नजरें गाड़ दीं।

थोड़ी देर में क़ाफ़िले के ऊंट नजर आने लगे। सब ने देखा कि काफिले के आगे एक खाकी रंग का ऊंट है, जिस पर काला टाट पड़ा हुआ उस के दोनों तरफ़ काली गोने लदी हुई हैं। 

जब काफिला बराबर में आ गया, तो अबू ज़हल ने काफिले के सरदार से पूछा कि मुहम्मद (ﷺ) कल रात तुम्हारे काफिले के पास से गुजरे थे।

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जवाब दिया, हां, गुजरे थे। अजीब मर्कब पर सवार थे और बहुत तेज आ रहे थे। उन्हों ने सलाम किया। जब हम ने जवाब दिया, तो वहा से गयब हो चुके थे।

अबू जहल ने मुंह बिसोरते हुए कहा, क्या वाहियात बात है? कहीं तुम पर भी मुहम्मद (ﷺ) ने जादू तो नहीं कर दिया है?

काफिले के सरदार ने बताया, जादू नहीं, मैं ने उन को (हुजूर सल्ल.0 को) आंखों से देखा, और उन की आवाज अपने कानों से सुनी है।

अबू जहल ने तमाम लोगों से खिताब करते हुए कहा, कुछ नही इस काफ़िले ने भी मुहम्मद (ﷺ) से सांठ-गांठ कर ली है। आओ, इस की बातें न सुनो, वरना तुम भी बहक जाओगे? 

तमाम कुफ्फ़ार काफ़िले वालों का मजाक उड़ाते हुए रवाना हुए।

चूंकि काफिले वालों को मेराज शरीफ़ का हाल मालूम न था, इस लिए वे हैरत से कुफ्फ़ार को देखने लगे। सरदार ने काफिले वालों से कहा, ऐसा लगता है कि ये लोग कुछ दीवाने हो गये हैं। आप ही तो सवाल करते हैं और आप ही मुंह चिढ़ाते है और मजाक उड़ाते हैं।

काफ़िले वालों ने कहा, इन लोगों के पागल होने में कोई शक नहीं है। न जाने ये ऐसी हरकत क्यों करते हैं ?

सरदार ने जोश में आ कर कहा, जाने दो इन पागलों को? काफिला धीरे-धीरे चलता रहो, यहां तक कि वह मक्का शहर में दाखिल हो कर गयब हो गया।

To be continued …

इंशा अल्लाह सीरीज का अगला हिस्सा कल पोस्ट किया जायेगा ….
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