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शबे क़द्र और इस की रात का महत्वः ….

∗ शबे क़द्र और इस की रात का महत्वः ….

रमज़ान महीने में एक रात ऐसी भी आती है, जो हज़ार महीने की रात से बेहतर है। जिसे शबे क़द्र कहा जाता है। शबे क़द्र का अर्थ होता हैः ” सर्वश्रेष्ट रात “, ऊंचे स्थान वाली रात”, लोगों के नसीब लिखी जानी वाली रात।
शबे क़द्र बहुत ही महत्वपूर्ण रात है, जिस के एक रात की इबादत हज़ार महीनों (83 वर्ष 4 महीने) की इबादतों से बेहतर और अच्छा है। इसी लिए इस रात की फज़ीलत क़ुरआन मजीद और प्रिय रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की हदीसों से प्रमाणित है। – @[156344474474186:]

♥ क़द्र वाली रात का महत्वः
(1) इस पवित्र रात में अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम को लोह़ महफूज़ से आकाश दुनिया पर उतारा फिर 23 वर्ष की अवधि में आवयश्कता के अनुसार मुहम्नद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारा गया। जैसा कि अल्लाह तआला का इर्शाद है।
• अल कुरान: “हमने इस (क़ुरआन) को क़द्र वाली रात में अवतरित किया है।……..” – (सुराः ९७ क़द्र)
(2) यह रात अल्लाह तआला के पास बहुत उच्च स्थान रखती है। इसी लिए अल्लाह तआला ने प्रश्न के तरीके से इस रात की महत्वपूर्णता बयान फरमाया है और फिर अल्लाह तआला ने स्वयं ही इस रात की फज़ीलत को बयान फरमाया कि यह एक रात हज़ार महीनों की रात से उत्तम है।
• अल कुरान: “और तुम किया जानो कि क़द्र की रात क्या है ?, क़द्र की रात हज़ार महीनों की रात से ज़्यादा उत्तम है।” – (सुराः ९७ क़द्र)
(3) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से अनगीनत फरिश्ते और जिब्रईल (अलैहि सलाम) आकाश से उतरते है। अल्लाह तआला की रहमतें, अल्लाह की क्षमा ले कर उतरते हैं। इस से भी इस रात की महत्वपूर्णता मालूम होती है। जैसा कि अल्लाह तआला का इर्शाद हैः
• अल कुरान: “फ़रिश्ते और रूह (जिब्रईल अलैहि सलाम) उस में अपने रब्ब की आज्ञा से हर आदेश लेकर उतरते हैं।” – (सुराः ९७ क़द्र)
(4) यह रात बहुत सलामती वाली है। इस रात में अल्लाह की इबादत में ग्रस्त व्यक्ति परेशानियों, ईश्वरीय संकट से सुरक्षित रहते हैं। इस रात की महत्वपूर्ण, विशेषता के बारे में अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम में बयान फरमाया हैः
• अल कुरान: “यह रात पूरी की पूरी सलामती है उषाकाल के उदय होने तक। ” – (सुराः ९७ क़द्र)
(5) यह रात बहुत ही पवित्र तथा बरकत वाली हैः इस लिए इस रात में अल्लाह की इबादत की जाए, ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह से दुआ की जाए, अल्लाह का फरमान हैः
• अल कुरान: “हमने इस (क़ुरआन) को बरकत वाली रात में अवतरित किया है।…….. ” – (सुराः ९७ क़द्र)
(6) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से लोगों के नसीबों (भाग्य) को एक वर्ष के लिए दोबारा लिखा जाता है। इस वर्ष किन लोगों को अल्लाह तआला की रहमतें मिलेंगी ? यह वर्ष अल्लाह की क्षमा का लाभ कौन लोग उठाएंगे ?, इस वर्ष कौन लोग अभागी होंगे ?, किस को इस वर्ष संतान जन्म लेगा और किस की मृत्यु होगी ? तो जो व्यक्ति इस रात को इबादतों में बिताएगा, अल्लाह से दुआ और प्रार्थनाओं में गुज़ारेगा, बेशक उस के लिए यह रात बहुत महत्वपूर्ण होगी । जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद हैः
• अल कुरान: “यह वह रात है जिस में हर मामले का तत्तवदर्शितायुक्त निर्णय हमारे आदेश से प्रचलित किया जाता है। ” – (सुराः44 अद् दुखानः 4-5 )
(7) यह रात पापों, गुनाहों, गलतियों से मुक्ति और छुटकारे की रात है। मानव अपनी अप्राधों से मुक्ति के लिए अल्लाह से माफी मांगे, अल्लाह बहुत ज़्यादा माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। खास कर इस रात में लम्बी लम्बी नमाज़े पढ़ा जाए, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों, गलतियों पर माफी मांगा जाए, अल्लाह तआला बहुत माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। जैसा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन हैः
• हदीस: “जो व्यक्ति शबे क़द्र में अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रातों को तरावीह (क़ियाम करेगा) पढ़ेगा, उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे।” – (बुखारी तथा मुस्लिम)

♥ यह महान क़द्र की रात कौन सी है?
यह अल्लाह की ओर से एक प्रदान रात है जिस की महानता के बारे में कुछ बातें बयान की जा चुकी हैं। इसी शबे क़द्र को तलाश ने का आदेश प्रिय रसूल(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने कथन से दिया है। “जैसा कि आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) वर्णन करती है -
• हदीस: “रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः ” कद्र वाली रात को रमज़ान महीने के अन्तिम दस ताक रातों में तलाशों ” – (बुखारी तथा मुस्लिम)
प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने शबे क़द्र को अन्तिम दस ताक वाली (21, 23, 25,27, 29) रातों में तलाशने का आदेश दिया है। शबे क़द्र के बारे में जितनी भी हदीस की रिवायतें आइ हैं। सब सही बुखारी, सही मुस्लिम और सही सनद से वर्णन हैं। इस लिए हदीस के विद्ववानों ने कहा है कि सब हदीसों को पढ़ने के बाद मालूम होता है कि शबे क़द्र हर वर्ष विभिन्न रातों में आती हैं। कभी 21 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 23 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 25 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 27 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 29 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती और यही बात सही मालूम होता है। इस लिए हम इन पाँच बेजोड़ वाली रातों में शबे क़द्र को तलाशें और बेशुमार अज्रो सवाब के ह़क़्दार बन जाए। – @[156344474474186:]

♥ शबे क़द्र की निशानीः
प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस रात की कुछ निशानी बयान फरमाया है। जिस के माध्यम से इस महत्वपूर्ण रात को पहचाना जा सकता है।
(1) यह रात बहुत रोशनी वाली होगी, आकाश प्रकाशित होगा, इस रात में न तो बहुत गरमी होगी और न ही सर्दी होगी बल्कि वातावरण अच्छा होगा, उचित होगा। जैसा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने निशानी बतायी है, जिसे सहाबी वासिला बिन अस्क़अ वर्णन करते है कि -
• हदीस: रसूल ने फरमायाः “शबे क़द्र रोशनी वाली रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और वातावरण संतुलित होता है और सितारे को शैतान के पीछे नही भेजा जाता।” – (तब्रानी)
(2) यह रात बहुत संतुलित वाली रात होगी। वातावरण बहुत अच्छा होगा, न ही गर्मी और न ही ठंडी होगी। हदीस रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इसी बात को स्पष्ट करती है -
• हदीस: “शबे क़द्र वातावरण संतुलित रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो लालपन धिमा होता है ।” – (सही- इब्नि खुज़ेमा तथा मुस्नद त़यालसी)
(3) शबे क़द्र के सुबह का सुर्य जब निकलता है, तो रोशनी धिमी होती है, सुर्य के रोशनी में किरण न होता है । जैसा कि उबइ बिन कअब वर्णन करते हैं कि -
• हदीस: “रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ) ने फरमायाः उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है, तो रोशनी में किरण नही होता है।” – (सही मुस्लिम)

♥ शबे क़द्र की रात में कैसी इबादत करे ?
हक़ीक़त तो यह है कि इन्सान इन रातों की निशानियों का परिचय कर पाए या न कर पाए बस वह अल्लाह की इबादतों, ज़िक्रो-अज़्कार, दुआ और क़ुरआन की तिलावत, क़ुरआन पर गम्भीरता से विचार किरे । इख्लास के साथ, केवल अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए अच्छे तरीक़े से अल्लाह की इबादत करे, प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की इताअत करे, और अपनी क्षमता के अनुसार अल्लाह की खूब इबादत करे और शबे क़द्र में यह दुआ अधिक से अधिक करे, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों, गलतियों पर माफी मांगा जाए। जैसा कि -
• हदीस: आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि, मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रश्न किया कि यदि मैं क़द्र की रात को पा लूँ तो क्या दुआ करू, तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः “अल्लाहुम्मा इन्नक अफुव्वुन करीमुन, तू हिब्बुल-अफ्व, फअफु अन्नी।” अर्थः ‘ऐ अल्लाह! निःसन्देह तू माफ करने वाला है, माफ करने को पसन्द फरमाता, तू मेरे गुनाहों को माफ कर दे।”

अल्लाह हमें और आप को इस महीने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे और हमारे गुनाहों, पापों, गलतियों को अपने दया तथा कृपा से क्षमा करे। आमीन……… Shab-e-Qadr , Shabe Qadr

♫ Shabe Qadr – Ramzan Ki Fazilat – Part (IV, V) ….

∗ ♫ Shabe Qadr – Ramzan Ki Fazilat – Part (IV, V) ….
♪ Shabe Qadr – (Ramzan Ki Fazilat) – Part (IV)
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• Ramzan Me Shabe Qadr Ki Sabse Badi Ahmiyat Aur Fazilat
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♪ Roze Chodney Se Bachey – (Ramzan Ki Fazilat) – Part (V)
Length → 00:14:04 Sec | Size → 10 MB.
• Sharayi Ujr Ke Bagair Roza Chodne Se Parhez Karey .
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Iftar Ke Waqt Rozedar Ki Dua Radd Nahi Hoti ….

∗ Iftar Ke Waqt Rozedar Ki Dua Radd Nahi Hoti ….

» Hadees : Hazrate Abdullah Bin Amr Bin As (RaziAllahu Anhu) Se Rwvayat Hai Ki Rasool’Allah (Sallallahu Alaihi Wasallam) Ne Farmaya -
“Iftar Ke Waqt Rozedar Ki Dua Radd Nahi Hoti”.
- (Sunan Ibn Majah, Vol 1, 1753-Hasan)

Agar Koi Bhul Gaya Aur Kuch Kha Pee Liya ….

∗ Agar Koi Bhul Gaya Aur Kuch Kha Pee Liya ….

» Hadees : Hazrate Abu Hurairah (RaziAllahu Anhu) Se Riwayat Hai Ki, Rasool’Allah (Sallallahu Alaihi Wasallam) Ne Farmaya -
“Agar Koi Bhul Gaya Aur Kuch Kha Pee Liya Tou Usey Chahiye Ki Apna Roza Puraa Karey Kyonki Usey Allah Ne Khilaya Aur Pilaya Hai.”
- (Sahi Bukhari, Vol3, Hadees-1933 : @[156344474474186:])

Iftar Ki Dawat Denewalo Ke Liye Ye Dua Padhey ….

∗ Iftar Ki Dawat Denewalo Ke Liye Ye Dua Padhey ….

» Hadees Hazrate Abdullah Bin Zubair (RaziAllahu Anhu) Se Riwayat Hai Ki Rasool’Allah (Sallallhu Alaihi Wasallam) Ne Muadh (RaziAllahu Anhu) Ke Wahan Roza Iftar Kiya Tou (Unko Ye) Dua Di Ki -
“Aftara Indakumus-Saimun, Wa Akala Taamakumul-Abrar, Wa Sallat Alaikumul- Malaikah”
(Tarjuma : Rozedar Tumharey Yahan Iftar Karey, Nek Log Tumhara Khana Khaye Aur Farishtey Tumharey Liye Dua Karey)
- (Sunan Ibn Majah, Vol 1 , H-1747-Sahih)

Zulm Ke Badle Nek Amal Le Liya Jayega ….

∗ Zulm Ke Badle Nek Amal Le Liya Jayega ….

» Hadees : Abu Hurairah (RaziAllahu Anhu) Se Riwayat Hai Ki Rasoo’l'Allah (Sallallahu Alaihi Wasallam) Ne Farmaya -
“Agar Kisi Shaksh Ne Kisi Dusre Ki Izzat (Reputation) Ya Koi Aur Cheez Par Zulm Kiya Ho Tou Us Se Aaj Hi Uss Din Ke Aane Se Pahle Muaf Karwa Le! Jis Din Na Deenar Honge Na Dirham Balki Uska Koi Nek Amal Hoga Tou Uss Zulm Ke Badle Wohi Le Liya Jayega Aur Agar Koi Neik Amal Uske Paas Nahi Hoga Tou Uss Mazloom(Zulm Sehne Wale) Ki Buraiyan Uss Par Daal Di Jayegi”.
- (Sahih Bukhari, Vol 3, 2449)

Jis Ne Apni Maal Ki Zakaat Ada Kar Dee ….

∗ Jis Ne Apni Maal Ki Zakaat Ada Kar Dee ….

» Mehfum-e-Hadees : Hazarte Zabir (RaziAllahu Anhu) Riwayat Karte Hain Ki Ek Aadami Ne Arz Kiya :
‘Ya Rasool’Allah (Sallallahu Alaihi Wasallam) ! Uss Shakhs Ke Baare Me Aap Ka Kya Khayaal Hai Jisne Apne Maal Ki Zakaat Ada Kar Dee ?’
Rasool’Allah (Sallallahu Alaihi Wasallam) Ne Farmaya : ‘Jisne Apni Maal Ki Zakaat Ada Kar Dee, Uss Maal Ka Sharr (Buraayi) Uss Par Se Jaata Raha.’
- [Ibn Khuzaymah As-Sahih, 04/13, Raqam-2258,
Hakeem Al-Mustadrak, 01/547, Raqam-1439,
Tabarani Al-Mu'jam-Ul-Awsat, 02/161, Raqam-1579,
Mundhiri At-Targhib Wat-Tarhib, 01/301, Raqam-1111]

Saari Umar Ke Rozey Bhi Ramzan Ki Kami Puraa Nahi Karegi ….

∗ Saari Umar Ke Rozey Bhi Ramzan Ki Kami Puraa Nahi Karegi ….

» Mehfum-e-Hadees : Abu Hurairah (RaziAllahu Anhu) Se Riwayat Hai Ki Rasool’Allah (Sallallahu Alaihi Wasallam) Ne Farmaya -
“Agar Kisi Ne Allah Ki Di Huyee Rukhsat Ke Alawa Ramzan Ka Roza Na Rakha (Ya Tod Diya) Tou Saari Umar Ke Rozey Bhi Iski Kami Ko Puraa Na Kar Sakegey”.
- (Sunan Abu Dawud, Vol2, No.624 – @[156344474474186:])

कुरान और समुद्र विज्ञान – मीठे और खारे पानी के बीच ‘आड़‘ !

∗ कुरान और समुद्र विज्ञान – मीठे और खारे पानी के बीच ‘आड़‘ !

» शुरु अल्लाह (ईश्वर) के नाम से ….
♥ अल कुरान: ये अल्लाह ही है जिसने पानी के दो धारे आज़ाद छोड़ रखे है ! वो आपस में मिलते है लेकिन घुलते नहीं. इनके दरमियान एक हद्दे फासिल (बरज़ख) है जिसे वो तजाउज़ (Contravention) नहीं कर सकते.
- (सुरा 55: आयात 19 & 20)

आप देख सकते हैं कि इन आयतों के अरबी वाक्यांशों में शब्द ‘बरज़ख‘ प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ ‘न दिखने वाली दीवार’ है यानि (Unseen Partition) इसी क्रम में एक अन्य अरबी शब्द ‘मरज‘ भी आया हैः जिसका अर्थ हैः ‘वह दोनों परस्पर मिलते और समाहित होते हैं।
प्रारम्भिक काल में पवित्र क़ुरआन के भाष्यकारों के लिये यह व्याख्या करना बहुत कठिन था कि पानी के दो भिन्न देह से सम्बंधित दो विपरीतार्थक आशयों का तात्पर्य क्या है ? अर्थात यह दो प्रकार के जल हैं जो आपस में मिलते भी हैं और उनके बीच दीवार भी है।

• आधुनिक विज्ञान ने यह खोज कर ली है कि जहां-जहां दो भिन्न समुद्र Oceans आपस में मिलते है वहीं वहीं उनके बीच ‘दीवार’ भी होती है। दो समुद्रों को विभाजित करने वाली दीवार यह है कि उनमें से एक समुद्र की लवणता:Salinity जल यानि तापमान और रसायनिक अस्तित्व एक दूसरे से भिन्न होते हैं ।
- (संदर्भ: Principleas of Oceanography Devis पृष्ठ .92-93)

आज समुद्र विज्ञान के विशेषज्ञ ऊपर वर्णित पवित्र आयतों की बेहतर व्याख्या कर सकते हैं। दो समुद्रो के बीच जल का अस्तित्व (प्राकृतिक गुणों के कारण ) स्थापित होता है जिससे गुज़र कर एक समंदर का पानी दूसरे समंदर में प्रवेश करता है तो वह अपनी मौलिक विशेषता खो देता है, और दूसरे जल के साथ समांगतात्मक मिश्रण: Homogeous Mixture बना लेता है। यानि एक तरह से यह रूकावट किसी अंतरिम सममिश्रण क्षेत्र का काम करती है। जो दोनों समुद्रों के बीच स्थित होती है। इस बिंदु पर पवित्र क़ुरआन में भी बात की गई है:

♥ अल कुरान: ‘‘और वह कौन है जिसने पृथ्वी को ठिकाना बनाया और उसके अंदर नदियां जारी कीं और उसमें (पहाडों की) खूंटियां उत्थापित कीं और पानी के दो भण्डारों के बीच पर्दे बना दिये ? क्या अल्लाह के साथ कोई और ख़ुदा भी (इन कार्यों में शामिल) है ? नहीं, बल्कि उनमें से अकसर लोग नादान हैं”
- (सूर: 27 आयत 61) – @[156344474474186:]

यह स्थिति असंख्य स्थलों पर घटित होती है जिनमें Gibralter के क्षेत्र में रोम-सागर और अटलांटिक महासागर का मिलन स्थल विशेष रूप से चर्चा के योग्य है। इसी तरह दक्षिण अफ़्रीका में,‘‘अंतरीप-स्थल Cape Point और‘ अंतरीप प्रायद्वीप ‘‘Cape Peninsula में भी पानी के बीच, एक उजली पटटी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है जहां एक दूसरे से अटलांटिक महासागर और हिंद महासागर का मिलाप होता है। लेकिन जब पवित्र क़ुरआन ताज़ा और खारे पानी के मध्य दीवार या रूकावट की चर्चा करता है तो साथ-साथ एक वर्जित क्षेत्र के बारे में भी बताता है:

♥ अल कुरान: ये अल्लाह ही है जिसने पानी के बहते हुए दो धारे बनाये! एक मीठे पानी के काबिल और दूसरा कड़वा! वो आपस में मिलते है लेकिन घुलते नहीं. इनके दरमियान एक रुकावट (बरज़ख) दाल दी गयी है जो उनको घुलने नहीं देती!
- (सुरा 25: आयात 53)

• आधुनिक विज्ञान ने खोज कर ली है कि साहिल के निकटस्थ समुद्री स्थलों पर जहां दरिया का ताजा़ मीठा और समुद्र का नमकीन पानी परस्पर मिलते हैं वहां का वातावरण कदाचित भिन्न होता हैं जहां दो समुद्रों के नमकीन पानी आपस में मिलते हैं। यह खोज हो चुकी है कि खाड़ियों के मुहाने या नदमुख: Estuaries में जो वस्तु ताजा़ पानी को खारे पानी से अलग करती है वह घनत्व उन्मुख क्षेत्रः Pycnocline Zone है जिसकी बढ़ती घटती रसायनिक प्रक्रिया मीठे और खारे पानी के विभिन्न परतों Layers को एक दूसरे से अलग रखती है।
- (संदर्भः Oceanography ग्रूस: पृष्ठ 242 और Introductory Oceanography थरमनः पुष्ठ 300 से 301)

• रूकावट के इस पृथक क्षेत्र के पानी में नमक का अनुपात ताज़ा पानी और खारे पानी दोनों से ही भिन्न होता है
- (संदर्भ: Oceanography, ग्रूसः पृष्ठ 244 और Introductory Oceanography ‘‘थरमन: पुष्ठ 300 से 301)

इस प्रसंग का अध्ययन कई असंख्य स्थलों पर किया गया है, जिसमें मिस्र म्हलचज की खास चर्चा है जहां दरियाए नील, रोम सागर में गिरता है। पवित्र क़ुरआन में वर्णित इन वैज्ञानिक प्रसंगों की पुष्टि ‘डॉ. विलियम एच‘ ने भी की है जो अमरीका के कोलवाडोर यूनीवर्सिटी में समुद्र-विज्ञान और भू-विज्ञान के प्रोफेसर हैं।

♥ तो तुम अल्लाह (ईश्वर) की कोन कोन सी नेयमतो (उपकारो) को जुठलाओगे….???

ज़कात क्या है ? और किसको देनी चाहिये ? …

∗ ज़कात क्या है ? और किसको देनी चाहिये ? …

Zakaatरमज़ान के अशरे में सब मुसलमान अपनी साल भर की कमाई की ज़कात निकालते है। तो ज़कात क्या है???
कुरआन मजीद में अल्लाह ने फ़र्माया है : “ज़कात तुम्हारी कमाई में गरीबों और मिस्कीनों का हक है।”
ज़कात कितनी निकालनी चाहिये ये काफ़ी बडा मुद्दा है इस मसले पर बहुत सारे इख्तिलाफ़ है, कोई इन्सान कुछ कहता है और कुछ कहता है| इस मसले पर हम विस्तार से बाद में बात करेंगे। अभी हम मुख़्तसर से अंदाज़ में बयांन करने की कोशिश कर रहे है.

♥ ज़कात क्या है ? : अल्लाह के लिये माल का एक हिस्सा जो शरियत ने तय किया उसका मुसलमान फकीर (जरूरतमंद) को मालिक बना देना शरीयत में ज़कात कहलाता है’

» ज़कात किसको दी जाये ???
ज़कात निकालने के बाद सबसे बडा जो मसला आता है वो है कि ज़कात किसको दी जाये???
ज़कात देते वक्त इस चीज़ का ख्याल रखें की ज़कात उसको ही मिलनी चाहिये जिसको उसकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत हो…वो शख्स जिसकी आमदनी कम हो और उसका खर्चा ज़्यादा हो। अल्लाह ने इसके लिये कुछ पैमाने और औहदे तय किये है जिसके हिसाब से आपको अपनी ज़कात देनी चाहिये। इनके अलावा और जगहें भी बतायी गयी है जहां आप ज़कात के पैसे का इस्तेमाल कर सकते हैं।

१. सबसे पहले ज़कात का हकदार है : “फ़कीर” :
फ़कीर कौन है?? – फ़कीर वो शख्स है मानो जिसकी आमदनी 10,000/- रुपये सालाना है और उसका खर्च 21,000/- रुपये सालाना है यानि वो शख्स जिसकी आमदनी अपने कुल खर्च से आधी से भी कम है तो इस शख्स की आप ज़कात 11,000/- रुपये से मदद कर सकते है।

२. दुसरा नंबर आता है “मिस्कीन” का :
“मिस्कीन” कौन है?? मिस्कीन वो शख्स है जो फ़कीर से थोडा अमीर है। ये वो शख्स है मानो जिसकी आमदनी 10,000/- रुपये सालाना है और उसका खर्च 15,000/- सालाना है यानि वो शख्स जिसकी आमदनी अपने कुल खर्च से आधी से ज़्यादा है तो आप इस शख्स की आप ज़कात के 5,000/- रुपये से उसकी मदद कर सकते है।

३. तीसरा नंबर आता है “तारिके कल्ब” का :
“तारिके कल्ब” कौन है?? “तारिके कल्ब” उन लोगों को कहते है जो ज़कात की वसुली करते है और उसको बांटते है। ये लोग आमतौर पर उन देशों में होते है जहां इस्लामिक हुकुमत या कानुन लागु होता है। हिन्दुस्तानं में भी ऐसे तारिके कल्ब है जो मदरसों और स्कु्लों वगैरह के लिये ज़कात इकट्ठा करते है। इन लोगो की तनख्खाह ज़कात के जमा किये गये पैसे से दी जा सकती है।

४. चौथे नंबर आता है “गर्दन को छुडानें में” :
पहले के वक्त में गुलाम और बांदिया रखी जाती थी जो बहुत बडा गुनाह था। अल्लाह की नज़र में हर इंसान का दर्ज़ा बराबर है इसलिये मुसलमानों को हुक्म दिया गया की अपनी ज़कात का इस्तेमाल ऎसे गुलामो छुडाने में करो। उनको खरीदों और उनको आज़ाद कर दों। आज के दौर में गुलाम तो नही होते लेकिन आप लोग अब भी इस काम को अंजाम से सकते है।
अगर कोई मुसलमान पर किसी ऐसे इंसान का कर्ज़ है जो जिस्मानी और दिमागी तौर पर काफ़ी परेशान करता है तो आप उस मुसलमान की ज़कात के पैसे से मदद कर सकते है और उसकी गर्दन को उस इंसान के चंगुल से छुडा सकते हैं।

५. पांचवा नंबर आता है “कर्ज़दारों” का :
आप अपनी ज़कात का इस्तेमाल मुसलमानों के कर्ज़ चुकाने में भी कर सकते है। जैसे कोई मुसलमान कर्ज़दार है वो उस कर्ज़ को चुकाने की हालत में नही है तो आप उसको कर्ज़ चुकाने के लिये ज़कात का पैसा दे सकते है और अगर आपको लगता है की ये इंसान आपसे पैसा लेने के बाद अपना कर्ज़ नही चुकायेगा बल्कि उस पैसे को अपने ऊपर इस्तेमाल कर लेगा तो आप उस इंसान के पास जायें जिससे उसने कर्ज़ लिया है और खुद अपने हाथ से कर्ज़ की रकम की अदायगी करें।

६. छ्ठां नंबर आता है “अल्लाह की राह में” :
“अल्लाह की राह” का नाम आते ही लोग उसे “जिहाद” से जोड लेते है। यहां अल्लाह की राह से मुराद (मतलब) सिर्फ़ जिहाद से नही है। अल्लाह की राह में “जिहाद” के अलावा भी बहुत सी चीज़ें है जैसे : बहुत-सी ऐसी जगहें है जहां के मुसलमान शिर्क और बिदआत में मसरुफ़ है और कुरआन, हदीस के इल्म से दुर है तो ऐसी जगह आप अपनी ज़कात का इस्तेमाल कर सकते है।
अगर आप किसी ऐसे बच्चे को जानते है जो पढना चाहता है लेकिन पैसे की कमी की वजह से नही पढ सकता, और आपको लगता है की ये बच्चा सोसाईटी और मुआशरे के लिये फ़ायदेमंद साबित होगा तो आप उस बच्चे की पढाई और परवरिश ज़कात के पैसे से कर सकते है।

7. और आखिर में “मुसाफ़िर की मदद” :
मान लीजिये आपके पास काफ़ी पैसा है और आप कहीं सफ़र पर जाते है लेकिन अपने शहर से बाहर जाने के बाद आपकी जेब कट जाती है और आपके पास इतने पैसे भी नही हों के आप अपने घर लौट सकें तो एक मुसलमान का फ़र्ज़ बनता है की वो आपकी मदद अपने ज़कात के पैसे से करे और अपने घर तक आने का किराया वगैरह दें।

ये सारे वो जाइज़ तरीके है जिस तरह से आप अपनी ज़कात का इस्तेमाल कर सकते है। अल्लाह आप सभी को अपनी कमाई से ज़कात निकालकर उसको पाक करने की तौफ़ीक दें ! और अल्लाह तआला हम सबको कुरआन और हदीस को पढकर, सुनकर, उसको समझने की और उस पर अमल करने की तौफ़िक अता फ़रमाये।
आमीन,