हज का सुन्नत तरीका ~ कुरआन व सुन्नत की रौशनी में

हज का सुन्नत तरीका ~ कुरआन व सुन्नत की रौशनी में

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हज का सुन्नत तरीका ~ कुरआन व सुन्नत की रौशनी में।

۞ बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ۞

1. तारूफ (Intro)

यह पोस्ट ‘हज्ज वा उमराह का तरीका और मस्जिदे नबवी में नमाज़ पढ़ने अहकाम’ पर मुश्तमिल है, जिस में हम ने कोशिश कि है कि वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की (सहीह) सुन्नत से साबित अरकान हो। साथ ही साथ कुछ गलतफहमियां और मुख़ालफतों की ओर भी निशानदेही  की गयी है जिन्हें कुछ हाजी हजरात कर बैठते हैं।

इसके आखिर में एक अहम् जानकारी भी जोड़ दी गई है जिस में उन बातों का तज़किरा किया गया है जिनकी जानकारी हासिल करना बन्दे पर वाजिब है। बहरहाल आप हज़रात से इल्तेजा है के इस पोस्ट का पूरी तरह से मुताअला करें और इस से ज्यादा से ज्यादा फायदा हासिल करने के की कोशिश करे। जजाकल्लाहु खैरन कसीरा।

2. हज के फ़र्ज़ होने की दलील

हज्ज इस्लाम के पाँच (सुतून) फ़राइज़ में से एक फ़र्ज़ है। यह पूरी हयात में महज एक मर्तबा ही फ़र्ज़ है। इसके फ़र्ज़ होने की दलील में अल्लाह तआला का फरमान है:

“और लोगों पर वाजिब है कि महज़ अल्लाह के लिए ख़ानाए काबा का हज करें जिन्हे वहां तक पहुँचने की इस्तेताअत है और जिसने बावजूद कुदरत हज से इन्कार किया तो (याद रखे) कि अल्लाह सारे जहॉन से बेनियाज़ है।”

[सुरः आले इमरान ३:९७]

और अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का यह फरमान है:

“इस्लाम यह की तुम गवाही दो के अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो, रमजान के रोज़े रखो और हज्जे बैतुल्लाह जाने की इस्तेहात हो तो हज करो।”

[बुखारी व मुस्लिम]

3. हज्ज के फ़र्ज़ होने की ५ शर्तें

  1. इस्लाम (मुसलमान होना)।
  2. आकिल। (समझदार)
  3. बालिग होना।
  4. आजादी।
  5. इस्तेहात (जिस्मानी और माली तौर से)।
  6. ख़वातीन के लिए एक जाएद शर्त भी है; और वह यह कि उसके साथ मेहरम मौजूद हो जो उसके साथ सफर करे, क्योंकि उसके लिए बिना महरम के हज्ज या फिर कोई और सफर करना हराम है। इसलिए कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फरमान है: “कोई औरत बिना मेहरम के सफर न करे।[बुखारी व मुस्लिम]

अगर यह बिना महरम के हज्ज कर लेती है, तो गुनहगार होगी।

मेहरम यानी  जैसे: पति, या बाप, या बेटा, या भाई, या चचा, या मामूँ, या भतीजा, या भाँजा। आम इस्तेलाह में महरम की गिनती में वो तमाम मर्द रिश्तेदार आते है जिस से उसका निकाह हराम है।

इस्तेहात से मुराद जिस्मानी सेहत और माली कुवत दोनों शामिल है, चुनाँचे जो शख्स अपने माल से सफर का खर्च या हज्ज का खर्च
पूरा करने की इस्तेहात नहीं रखता, तो उसपर हज्ज फर्ज़ नहीं है। लेकिन जो आदमी अपने माल से हज्ज की ताक़त रखता है और जिस्मानी सेहत से इसके काबिल न हो, या वह आदमी लम्बी बीमारी में मुब्तेला हो, या अपाहिज या बूढ़ा हो, तो ऐसा आदमी किसी दूसरे शख्स को अपनी ओर से हज्ज करने के लिए रवाना कर सकता। लेकिन उस दूसरे शख्स की और से चाहिए के वो अपने फ़र्ज़ हज की अदाएगी कर चूका हो।

• हज में एहतियात करने वाली बाते

अल्लाह तआला का फर्मान है:

“हज के महीने तो (अब सब को) मालूम हैं (शव्वाल, ज़ीक़ादा, जिलहज) पस जो शख्स उन महीनों में अपने ऊपर हज लाज़िम करे तो (एहराम से आख़िर हज तक) न औरत के पास जाए न कोई और गुनाह करे और न झगडे।”

[सुरः बक़रह २:१९७]

अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:

जिस आदमी ने हज्ज किया और शहवत और उस से मुतालिक चीज़ों और अल्लाह की नाफरमानी से बचा रहा, तो वह उस दिन की तरह वापस लौटा जिस दिन उसकी माँ ने उसे जना था।

[बुखारी व मुस्लिम]

एक रिवायत में आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:

एक उम्रा से दूसरा उम्रा उनके बीच के गुनाहों के लिए कफ्फारा है, और मब्रू्रूर-हज्ज का बदला जन्नत है।

[बुखारी व मुस्लिम]

बहरहाल मेरे हाजी भाई! आप नाफरमानी और गुनाह में पड़ने से बचें, चाहे वह छोटा गुनाह हो या बड़ा; जैसे नमाज़ को उसके समय से ताख़ीर करना, ग़ीबत, चुग़ुलखोरी, गाली-गलोज, गाना सुनना, दाढ़ी मुँडाना, टखने से नीचे कपड़े लटकाना, तम्बाखूनोशी करना (बीड़ी-सिगरेट पीना), रास्ते और टेलीवीज़न में हराम चीज़ों को देखना। औरत पर लाज़िम है कि शरई हिजाब (पर्दा) से अपने पुरे जिस्म को ढाँक कर रखे और बेपर्दगी से दूर रहे।

लोगों की भीड़-भाड़, और थकावट की वजह से आदमी ट्रेफिक कर्मी, या बस-चालक के साथ, या तवाफ और जमरात की भीड़-भाड़ में हज्ज के दौरान मम्नूअ् (निषिद्ध) लड़ाई-झगड़े में पड़ जाता है, बहरहाल आप शैतान के बहकावे और उसके फन्दे में फँसने से बचाव करें, सब्र से काम लें और जाहिलों से किनारा करें, आप की ज़ुबान से सिर्फ अच्छी बात ही निकले।

• ख़वातीन और परदे का अहतमाम

कुछ औरतें हज्ज में बुरक़ा (हिजाब) नहीं पहनती हैं और अपने कपड़ों ही में लोगों के बीच से गुज़रती हैं, और कभी-कभार पैन्ट पहन कर निकलती हैं, और यह समझती हैं कि हिजाब महज सिर पर दुपट्टा रख लेने का नाम है। यह एक फासिद समझ है। तथा मामला इस से और संगीन हो जाता है कि कुछ औरते ईद के दिन बनाव-सिंगार करती हैं, फिर सुनहरे कपड़े पहन कर और मेकप (जीनत) कर के मर्दों के पास से गुज़रती हैं, और यह समझती हैं कि यह सब ईद की खुशी मनाने में दाखिल है,

हालाँकि उसे नहीं मालूम कि यह हज्ज के अन्दर बोहोत बड़ा गुनाह है, जबकि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान हैः

मैं ने अपने बाद मर्दो के लिए औरतो से बढ़कर नुकसानदेह (खतरनाक) कोई फित्ना नहीं छोड़ा।

[बुखारी व मुस्लिम]

और कुछ ख़वातीन दौरान-ऐ-हज आम जगह पर सोने या आराम करने में लापरवाही करती हैं, जिसकी वजह मर्द उन्हें देखते हैं।

जबकि मुसलमान खातून पर फ़र्ज़ है कि वह अल्लाह से डरे और बिना ज़ीनत (श्रृंगार) वाला हिजाब पहन कर पराये मर्दों से इस तरह पर्दा करे कि उस के जिस्म का कोई हिस्सा दिखाई न दे; न तो उसका चेहरा, न उसके दोनों हाथ और न ही उसके दोनों पाँव; क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फर्मान है: “औरत सरापा सत्र (छुपाने और पर्दा करने की चीज़) है, जब वह बाहर निकलती है तो शैतान उसे निगाह उठाकर देखता है।” (इसे तिर्मिज़ी ने सहीह सनद के साथ रिवायत किया है)

(इस्तिश्राफ: असल में कहते हैं माथे (भौँ) पर हथेली रख कर और सिर उठा कर देखना। इसका अभिप्राय यह है कि जब औरत अपने घर से बाहर निकलती है तो शैतान के अन्दर उसे बहकाने और गुमराह करनी की लालसा पैदा होती है।)


4. एहराम की हालत में ममनूअ (मना की हुई) चीज़ें

जब मुसलमान आदमी हज्ज या उम्रा का एहराम बाँध ले (अर्थात हज्ज या उम्रा की इबादत में दाखिल होने की नीयत कर ले) तो उस पर ग्यारह (11) चीज़ें हराम हो जाती हैं यहाँ तक कि वह अपने एहराम से हलाल हो जाए:

  1. बाल काटना (या उखाड़ना)।
  2. नाखून बनाना (तराशना)
  3. खुश्बू का इस्तेमाल करना।
  4. खुश्की का शिकार मारना, लेकिन समुन्दरी शिकार जायज़ है।
  5. (खास तौर से मर्दो के लिए) सिले हुए कपड़े पहनना। सिले हुए कपड़े से मुराद वह कपड़ा है जो बदन के नाप के अनुसार तैयार किया गया हो, जैसेः जुब्बा, बनियान, पैजामा, कमीज, पैन्ट, दस्ताना, मोज़ा। लेकिन वह कपड़ा जिस में धागा हो और वह बदन के नाप के हिसाब से तैयार ना किया हो तो इस के पहनने में कोई हर्ज़ नहीं। जैसे: पट्टा, या घड़ी, या जूता जिसमें धागा लगा हो।
  6. (खास तौर से मर्दो के लिए) सिर या चेहरे को किसी चिपकने वाली (उनसे मिली हुई) चीज़ से ढाँकना, जैसे: टोपी, गुत्रा (रूमाल) अमामा (पगड़ी) हैट और इनकी मिस्ल और चीज़ें, लेकिन छत्री, तम्बू, बस-कार का साया लेना जाईज़ है, इसी तरह सिर पर सामान उठाना जाईज़ है जब उसका मकसद सिर को ढाँकना न हो।
  7. (खास तौर से ख़वातीन के लिए) निक़ाब (यानि  वह कपड़ा जो खास तौर से चेहरे पर बाँधने के लिए तैयार किया जाता है और उसमें आँखों के लिए सुराख बना रहता है।) और दस्ताने पहनना। अगर औरत पराये मर्दों के सामने है तो चेहरे और दोनों हाथों को निक़ाब और दस्ताने के अलावा किसी दूसरी चीज़ से छुपा लेगी, जैसे कि दुपट्टा चेहरे पर डाल ले, और दोनों हाथों को हिजाब (अबाया) के अन्दर दाखिल कर ले।
  8. निकाह करना-करवाना
  9. जिमा (हमबिस्तरी) करना।
  10. शहवत के साथ गले मिलना (बीवी से बोसा व किनार करना)
  11. मुस्ताजानि (हस्तमैथुन के द्वारा या वैसे ही वीर्य-पात) करना।

5. एहराम की हालत में ममनूअ कामों को करने वाले की तीन हालतें हैं:

  1. वह ममनूअ (मना किया हुआ काम) को बिना किसी उज़्र के (अकारण) कर बैठे; तो ऐसी हालत में वह गुनहगार है और उसके ऊपर फिदीया वाजिब है।
  2. वह मना किया हुआ काम को किसी ज़रूरत की वजह से करे, जैसे के किसी बीमारी की वजह से सिर के बाल मुँडाना। तो ऐसी हालत में मना किया हुआ  काम को करना जाईज़ है, लेकिन उसके ऊपर फिदिया वाजिब है।
  3. वह मना किये हुए काम को इस हाल में करे कि वह नींद या भूल-चूक, या लाइल्मी, या जब्र के कारण मअ्ज़ूर हो। ऐसी हालत में उस पर कोई गुनाह नहीं और न ही उस पर फिदिया वाजिब है।

6. फिदिया

• आम ममनूअ अमल का फिदिया:

ममनूअ (मना किया हुआ काम) अगर बाल काटना, या नाखून बनाना, या खुशबु इस्तेमाल करना, या शहवत के साथ बोसा व किनार (गले मिलना) करना, या मर्द का सिले हुए कपड़े पहनना या अपना सिर धाँकना, या ख़वातीन का निकाब या दस्ताने पहनना हो; तो इन सब में अक्सर उलमा के नजदीक फिदिया वाजिब है, और यह फिदिया तीन चीज़े हैं, एहराम की हालत में मना किये हुये काम को करने वाला इन में से किसी एक पर अमल कर लेगा:

  1. एक बकरी ज़ब्ह करना (और उसे फक़ीरों में बाँट देना, उस में से कुछ भी न खाना।)
  2. छह मिस्कीनों को खाना खिलाना, हर मिस्कीन के लिए लगभग आधा साॅअ् गल्ला होना चाहिए (आधा साॅअ लगभग सवा एक किलो (1.25 कि0ग्रा0) होता है।)
  3. तीन दिन रोज़ा रखना।

• बाज़ संगीन ममनूअ अमल का फिदिया:

बाज़ ममनूअ अमल (मन किये हुए काम) जिसमे कफ़्फ़ारे की सुरते हाल मुख्तलिफ है।

  1. निकाह करना (करवाना) : यह एहराम की हालत में हराम है, और इस पर कोई फिदिया नहीं है।
  2. शिकार मारना : यह हराम है, और यदि जान-बूझ कर शिकार किया है तो इस में बदला वाजिब है। (बहरहाल आजकल यह बहुत ही कम होता है, शिकार का बदला ज़िक्र नहीं किया गया है।)
  3. जिमा (हमबिस्तरी) करनाः यानि मियाँ बीवी का आपसी ताल्लुक बनाना (यह सब से बड़ा ममनूअ काम है) यदि जान-बूझ कर पहले तहल्लुल से पूर्व जिमा करता है तो उस पर पाँच चीज़ें लागु होती हैं:
    (1). गुनाह। (2). हज्ज का फासिद होना। (3). उस हज्ज को पूरा करना फ़र्ज़ है। (4). अगले साल उस हज्ज की कज़ा करना ज़रूरी है। (5). फिदिया का वाजिब होना; और वह एक ऊँट या गाय है जिसे क़ज़ा में ज़ब्ह किया जाए गा।

7. हज्ज के मनासिक के तीन किस्मे है :

तमत्तुअ्, क़िरान और इफ्राद। उनमें सबसे अफ़ज़ल तमत्तुअ् है; क्योंकि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इसका हुक्म फ़रमाया है।

  1. तमत्तुअ्ः यह है कि हज्ज के महीने में उमराह की नीयत से एहराम बाँधे, और उम्रा से फारिग होने के बाद यौमुत्तर्वियह को (8 ज़ुलहिज्जा के दिन) हज्ज की नीयत से एहराम बाँधे। (हज्ज के महीने: शव्वाल, ज़ुल-क़अ्दह, और ज़ुलहिज्जा के 10 दिन हैं)
  2. इफ्राद: सिर्फ हज्ज की नीयत से एहराम बाँधना; फिर मक्कह पहुँच कर तवाफे-क़ुदूम करना, और तवाफे-क़ुदूम के बाद हज्ज की सई करना भी जाईज़ है।
  3. क़िरान: हज्ज और उम्रा का एक साथ एहराम बाँधना।

हज्जे क़िरान करने वाले का काम हज्जे-इफ्राद करने वाले ही के बराबर है, महज दो बातों में ही फर्क है:

  1. नीयत: इफ्राद करने वाला सिर्फ हज्ज की नीयत करता है, जबकि क़िरान करने वाला हज्ज और उमराह दोनों की नीयत करता है।
  2. हद्य्य (क़ुरबानी का जानवर): क़िरान करने वाले पर क़ुरबानी फ़र्ज़ है, और इफ्राद करने वाले पर क़ुरबानी नहीं है।

8. यौमूत्तर्वियह (8 जलु हिज्जा)

ज़ुल-हिज्जा के आठवें दिन को यौमुत्तर्वियह कहते हैं, यह नाम इस लिए पड़ा क्योंकि इस दिन लोग इसके बाद आने वाले दिनों के लिए पानी जमा करते थे।

यौमुत्तर्वियह (8 जुलहिज्जा के दिन) के काम:

  1. हज्जे-तमत्तुअ् करने वाले के लिए मस्नून है कि इस दिन अपने उस स्थान से जहाँ वह ठहरा हुआ है हज्ज का एहराम बांधे, चुनाँचे वह गुस्ल करे और अपने बदन में खुश्बू लगाए, और सिले हुए कपड़े उतार कर सफेद रंग की एक चादर और तहबंद पहन ले।

    जहाँ तक ख़वातीन का मुआमला है तो वह नहा-धोकर जो भी कपड़े चाहे पहन ले, लेकिन उस से जीनत जाहिर न होता हो, और चेहरे पर नक़ाब न लगाए और न ही हाथ में दस्ताने पहने।
  2. फिर आप ‘‘लब्बैका हज्जा’’ कहें, और अगर किसी रूकावट के पेश आ जाने का डर हो तो शर्त लगाना मस्नून है, चुनाँचे आप कहें: “इन हबा-सनी हाबिसुन-फ-महिल्ली हैसो हबस्-तनी“(यदि मुझे कोई रूकावट पेश आ गई तो मैं वहीं हलाल हो जाऊँ जहाँ तू मुझे रोकदे।)फिर आप तल्बियह कहें: “लब्बैका, अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैका ला शरीका लका लब्बैक, इन्नल-हम्दा वन्ने-मता लका वल-मुल्क, ला शरीका लक” (अर्थात: मैं हाज़िर (उपस्थित) हूँ, ऐ अल्लाह मैं हाज़िर हूँ .. मैं हाज़िर हूँ, तेरा कोई शरीक (साझी) नहीं, मैं हाज़िर हूँ .. निःसंदेह हर तरह की प्रशंसा, सभी नेमतें, और सभी संप्रभुता तेरी ही है। तेरा कोई शरीक नहीं।)और आप कसरत के साथ बुलंद आवाज़ में तल्बियह कहते रहें यहाँ तक कि 10 ज़ुल-हिज्जा को (क़ुरबानी के दिन) जमरतुल अक़्बा को कंकरी मार दें।
  3. आप के लिए इस रात को मिना में बिताना सुन्नत है।
  4. आप के लिए सुन्नत है कि मिना में जुहर, अस्र, मग्रिब, इशा और अरफा के दिन की फ़र्ज़ की नमाज़ बिना एकत्र किए हुए कस्र के साथ पढ़ें।हाजी को चाहिए कि अपना खाली समय ऐसी चीज़ों में बिताए जो लाभप्रद हों, उदाहरण के तौर पर दुरूस में हाज़िर होना, क़ुर्आन की तिलावत करना, हज्ज के मनासिक पढ़ना …आदि।

9. अरफा का दिन (9 जिल-हिज्जा)

  1. जब अरफा के दिन (9 ज़ुल-हिज्जा को) सूरज निकल आए, तो हाजी तल्बियह या तक्बीर कहते हुए, मिना से अरफा के लिए रवाना हो, जैसा कि सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के अमल से साबित है। जबकि वो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ थे: तल्बिया पुकारने वाला तल्बिया कहता था और उस पर कोई ऐतराज़ नहीं किया जाता था, और तक्बीर कहने वाला तक्बीर कहता था। और उस पर भी कोई ऐतराज़ नही करता था।जब सूरज ढल जाए तो एक अज़ान और दो इक़ामत के साथ जुहर और अस्र की नमाज़ क़स्र करके एक साथ पढ़ें, और नमाज़ से पहले इमाम ऐसा खुत्बा दे जो उस जगह (हालात, माहौल, मुआशरे) के मुनासिब हों।
  2. फिर हाजी नमाज़ के बाद ज़िक्र, दुआ, और अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल से गिड़गिड़ाने में मशगूल हो जाए, अपने दोनों हाथों को उठा कर क़िब्ला की ओर मुँह कर के सूरज डूबने तक दुआ करता रहे; जैसा कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने किया।

हाजी के लिए मुनासिब यह है कि वह इस फ़रीज़े में कोताही से काम न ले; उसे चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा दुआ करे, और उस में इल्हाह (खुशामद ) से काम ले, और अल्लाह तआला से सच्ची तौबा करे।

मेरे हाजी भाई! आप की खिदमत में अरफा के दिन की फज़ीलत पर दलालत करने वाली कुछ हदीसें :

(१) आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: “हज्ज अरफा में ठहरने का नाम है।[सहीह हदीस; रावी – अहमद और असहाबुस्सुनन]

(२) और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: ‘‘अरफा के दिन से बढ़ कर कोई और दिन नहीं है जिस में अल्लाह तआला अपने बन्दों को सब से ज्यादा जहन्नम से आज़ाद करता है, (उस दिन) वह क़रीब होता है फिर फरिश्तों के सामने उन पर फक्र करते हुए कहता है: ये लोग क्या चाहते हैं?’’ [मुस्लिम]

(३) आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: ‘मैं ने और दीगर पैग़म्बरों ने अरफा की शाम जो सबसे अफ़ज़ल बात कही वह यह है: “अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं, वह अकेला है उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए बादशाही और उसी के लिए सभी तारीफे है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।’’ [सहीह हदीस; रावी – इमाम मालिक]

• तंबीहात (चेतावनियाँ):

  1. हाजी पर फ़र्ज़ है कि वह इस बात को जाँच कर ले कि वह अरफा की हुदूद में (सीमा के भीतर) है, अरफा के चारों ओर लगे हुए बड़े-बड़े बोर्डाें (खम्भों) से हुदूद का पता लगाया जा सकता है।
  2. मस्जिदे नमिरह का पूरा हिस्सा अरफा में नहीं है; बल्कि उसका कुछ हिस्सा (पिछला हिस्सा) अरफा में है, और उसका कुछ हिस्सा (यानि उसका अगला हिस्सा) अरफा के बाहर है।
  3. कुछ लोग यह मानते हैं कि अरफा की पहाड़ी की कोई फज़ीलत है; यह बात सहीह नहीं है।
  4. कुछ हाजी जल्दबाज़ी करते हुए सूरज डूबने से पहले ही अरफा से मुज़दलिफा की ओर रवाना हो जाते हैं, यह गलत है। बल्कि दुरुस्त तो यह है कि वह सूरज डूबने तक अरफा में ठहरा रहे।

10. मुज़दलिफा में रात बिताना

जब अरफा के दिन सूरज डूब जाए तो हाजी इतमिनान और सुकून के साथ अरफा से मुज़दलिफा की ओर रवाना हो और लोगों के लिए भीड़ और रूकावट न पैदा करे। मुज़दलिफह पहुँच कर एक अज़ान और दो इक़ामत के साथ मगरिब और इशा की नमाज़ कस़्र कर के एक साथ पढ़े।

• इशा की नमाज़ को उसके वक्त से ताख़ीर करना हराम है, और उसका वक्त आधी रात है, जैसाकि नबी-ऐ-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फर्मान है: “इशा का समय आधी रात तक है।” (मुस्लिम)
लिहाजा जब इशा की नमाज़ का वक्त निकल जाने का डर हो तो किसी भी जगह पर मग्रिब और इशा की नमाज़ पढ़ ले, चाहे अरफा ही में क्यों न हों।

• फिर मुज़दलिफह में फज़र तक रात बिताए, फज़र की नमाज़ पहले वक्त पर पढ़े, फिर अगर हो सके तो मश्अरे हराम (मुज़दलिफह में एक पहाड़ी है) के पास जाए, या फिर पूरा मुज़दलिफा ठहरने की जगह है, क़िब्ला की ओर मुँह करके अल्लाह की हम्द व सना बयां करे, उसकी बड़ाई और वह्दानियत बयान करे और दुआ करे। जब सुब्ह अच्छी तरह रौशन हो जाए तो सूरज निकलने से पहले हाजी तल्बियह कहते हुए मिना के लिए रवाना हो जाए, और कसरत से तल्बियह कहता रहे यहाँ तक कि जमरतुल-अक़्बह को कंकरी मार दे।

• कमजोरों और औरतो के लिए रात के आखरी हिस्से में मिना के लिए रवाना होना जाईज़ है; जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) की हदीस है कि उन्हों ने कहा: “मुझे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सामान के साथ रात के आखरी हिस्से में मुज़दलिफह से भेजा” [मुस्लिम]  और अस्मा बिन्त अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) चाँद डूबने के बाद मुज़दलिफह से कूच करती थीं। और चाँद लगभग दो-तिहाई रात बीतने के बाद डूबता है।

• तंबीहात (चेतावनियाँ):

  1. पहली: कुछ लोग यह एतिक़द रखते हैं कि मुज़दलिफह पहुँचते ही जमरात को मारने के लिए कंकरियाँ चुनी जाएं गीं; यह एतिक़ाद सहीह नहीं है, इसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नहीं किया है। कंकरियाँ किसी भी जगह से चुनी जा सकती हैं।
  2. दूसरी: कुछ लोग रात के 12 बजे को आधी रात समझते हैं, हालांकि यह गलत है, बल्कि सहीह बात यह है कि रात के सारे घन्टों के अर्ध को आधी रात कहते हैं। आप इस गणित विधि के हवाले से आधी रात के बारे में जान सकते है: (रात के सम्पूर्ण घन्टे / 2 + सूरज डूबने का समय = आधी रात)

    जैसे के अगर सूरज 6 बजे डूबता है, और फज्र 5 बजे निकलती है, तो आधी रात साढ़े ग्यारह बजे रात को होगी। (रात के सम्पूर्ण घन्टे / 2 + सूरज डूबने का समय 6 = 11½)बजे)
  3. तीसरी: इस रात में सख्त मुखालफात (अवैद्ध कामों) में से एक यह है कि: बहुत से हाजी फज्र की नमाज़ उसका समय होने से पहले ही पढ़ लेते हैं, और अगर नमाज़ को उसका समय होने से पहले पढ़ लिया जाए तो नमाज खालिस नहीं होती है।
  4. चौथी: हाजी पर फ़र्ज़ है कि वह इस बात को वाजेह कर ले कि वह मुज़दलिफह की हुदूद के अंदर है, मुज़दलिफह के चारों ओर लगे हुए

    बड़े-बड़े बोर्डाें (खम्भों) से हुदूद का पता लगाया जा सकता है।

11. यौमुन्नह्र (क़ुरबानी का दिन: 10 जिल-हिज्जा)

• यौमुन्नह्र के काम:

  1. जमरतुल अक़्बा को कंकरी मारना।
  2. (क़िरान और तमत्तुअ करने वाले का) क़ुरबानी करना।
  3. सिर के बाल मुँड़ाना या काटना। और मुँड़ाना अफ़ज़ल है।
  4. तवाफे इफाज़ह और हज्ज की सई करना।

• जरुरी बाते:

  1. ऊपर बताई हुई तरतीब ही सुन्नत है। अगर इस तरतीब पर अमल न हो सके, तो कोई हर्ज़ नहीं है, जैसे कोई आदमी सिर के बाल मुँड़ाने से पहले तवाफ कर ले, या कंकरी मारने से पहले बाल मुँड़ा ले, या तवाफ से पहले सई कर ले, या इसी तरह कोई और काम आगे या पीछे कर दे।
  2. जमरतुल अक़्बह को लगातार सात कंकरियाँ मारें, हर कंकरी मारने के समय अपना हाथ उठाएं और तकबीर कहें, सुन्नत यह है कि (कंकरी मारते समय) जमरह की ओर मुँह करें और मक्कह को अपने बाएं और मिना को अपने दाहिने कर लें।
  3. ताक़तवर लोगों के लिए जमरतुल अक़्बह को कंकरी मारने का समय सूरज डूबने के बाद शुरू होता है; इस की दलील इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस है कि आप ने फरमाया: अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मुज़दलिफा की रात हम बनी अब्दुल मुत्तलिब के बच्चों को गधों पर आगे भेज दिया और हमारी रानों पर थपथपाते हुए कहने लगे: “ऐ मेरे बेटो! जमरह को कंकरी न मारना यहाँ तक कि सूरज निकल आए।” (इसे अबू दाऊद ने सहीह सनद के साथ रिवायत किया है।)

    • जहाँ तक औरतों और कमज़ोरों की बात है तो उनके लिए रात के आखरी हिस्से में मिना पहुँचते ही कंकरी मारना जाईज़ है, इसकी दलील अस्मा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस है कि: ‘‘वह मुज़दलिफह की रात मुज़दलिफह में उतरीं और खड़ी हो कर नमाज़ पढ़ने लगीं, चुनाँचे उन्हों ने एक घन्टा नमाज़ पढ़ी फिर कहा: ऐ मेरे बेटे ! (इससे मुराद उनके गुलाम अब्दुल्लाह हैं) क्या चाँद गायब हो गया? मैं ने कहा: नहीं। फिर उन्हों ने एक घन्टा नमाज़ पढ़ी फिर कहा: क्या चाँद ग़ायब हो गया? मैं ने कहा: हाँ, उन्हों ने कहा: तो कूच करो, चुनाँचे हम ने कूच किया और चल पड़े यहाँ तक कि उन्हों ने जमरह को कंकरी मारी, फिर वापस आईं और अपने डेरे पर फज्र की नमाज़ पढ़ी, तो मैं ने कहा: हे, मैं समझता हूँ कि हम ने रात के समय ही कंकरी मार दी है। उन्हों ने कहाः “ऐ मेरे बेटे! अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने औरतों के लिए इजाजत दी है।” (बुख़ारी व मुस्लिम )
  4. जमरतुल अक़्बह को कंकरी मारने का समय सूरज ढलने तक है। अगर सूरज ढलने से पहले कंकरी मारने में कोई परेशानी है तो सूरज ढलने के बाद भी कंकरी मार सकते हैं चाहे रात में ही क्यों न हो।
  5. सुन्नत यह है कि कु़रबानी करने, सिर के बाल मुँड़ाने, तवाफ और सई करने में जल्दी करें, अगर उसे यौमुन्नह्र से विलम्ब कर दिया तो कोई हरज नहीं है।
  6. हज्जे तमत्तुअ् और क़िरान करने वाले पर क़ुरबानी करना अनिवार्य है, हज्जे इफ्राद करने वाले पर कु़रबानी नहीं है। जो आदमी क़ुरबानी न कर पाए तो उसके ऊपर तीन दिन हज्ज के दिनों में और सात दिन अपने घर लौटन के बाद रोज़ा रखना लाज़िम है।
  7. खाना-ऐ-काबा का तवाफ सात चक्कर है, लेकिन इसमें रमल (कन्धा उचकार छोटे-छोटे क़दमों के साथ तेज़ी से चलना) और इजि़्तबाअ् (दाहिना कन्धा खुला रखना) नहीं है, फिर सुन्नत यह है कि यदि आसानी हो तो मक़ामे इब्राहीम के पीछे दो रक़्अत नमाज़ पढ़े, वर्ना मस्जिद में किसी भी जगह पर पढ़ सकते है।
  8. सफा और मरवा के बीच सई (दौड़ना) सात चक्कर है, और उसका तरीक़ा वही है जो उम्रा की सई में दौड़ा जाता है। क़िरान और इफ्राद करने वालों के लिए पहली सई काफी है, अगर वे दोनों तवाफे क़ुदूम के साथ सई कर चुके हों।
  9. तक़्सीर में पूरे सिर के बालों को कटवाना ज़रूरी है, और औरत अपने सिर के बालों को जमा करके अंगुली के पोर के बराबर काट ले गी, अगर उसके बाल अलग अलग लम्बाई के हैं तो वह हर श्रेणी से बाल काटे गी।
  10. जब आदमी जमरतुल अक़्बह को कंकरी मार दे और सिर के बाल को मुँड़ा या कटवा ले तो उसे पहला तहल्लुल हासिल हो गया (यानी औरत के सिवा एहराम की हालत में जो चीज़ें भी ममनूअ थीं वह जाईज़ हो गईं )। और उसके लिए तवाफ से पहले सफाई-सुथराई करना और खुश्बू लगाना सुन्नत है।

    और जब कंकरी मार दिया, सिर का बाल मुँड़ा लिया या कटवा लिया, तवाफ और सई कर ली, तो उसे दूसरा तहल्लुल हासिल हो गया (यानी उसके लिए सभी चीज़ें जाईज़ हो गयीं यहाँ तक कि औरतें भी।)

12. अय्यामुत्तश्रीक़ (11,12,13 ज़ुलहिज्जा)

१. पहला: अय्यामुत्तश्रीक़ की रातों को मिना में बिताना वाजिब है, और वह यह हैं: ज़ुल-हिज्जा की ग्यारहवीं रात, बारहवीं रात (जल्दी करने वाले के लिए ) और तेरहवीं रात (देर करने वाले के लिए )।

२. दूसरा: अय्यामुत्तश्रीक़ में जमरात को कंकरी मारना वाजिब है, कंकरी मारने का तरीक़ा:

अय्यामुत्तश्रीक़ के हर दिन सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मारें, हर जमरह को लगातार सात कंकरियाँ मारें, और हर कंकरी के साथ तक्बीर (अल्लाहु अक्बर) कहें; इस तरह हर दिन मारी जाने वाली कंकरियों की कुल तादाद 21 होगी। (कंकरी का आकार चने से थोड़ा बड़ा होना चाहिए )।

पहले जमरह से कंकरी मारने की इब्तेदा करें गे जो मस्जिदे खैफ़ से क़रीब है, फिर अपने दाएं आगे बढ़ कर क़िबला की ओर मुँह करके खड़े हो जाएं और लम्बी देर तक खड़े रहें और दोनों हाथों को उठा कर दुआ करें। फिर मध्यस्थित जमरह को कंकरी मारें, फिर बाएँ ओर हो जाएं और क़िबला की ओर मुँह करके खड़े हो जाएं और लम्बी देर तक खड़े रहें और दोनों हाथों को उठा कर दुआ करें। फिर जमरतुल अक़्बह को कंकरी मारें, चुनाँचे उसकी ओर मुँह करके मक्कह को अपने बाएं और मिना को अपने दाहिने कर लें, और (कंकरी मारने के बाद) इसके पास न ठहरें। फिर इसी तरह बारहवीं तारीख और तेरहवीं तारीख को कंकरी मारें।

• तंबीहात (चेतावनियाँ):

  1.  कंकरियों को धोना गलत है; क्योंकि यह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) या आप के सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से साबित नहीं है।
  2. कंकरी के हौज़ में गिरने का एतिबार होता है, हौज़ के बीच में खड़े हुए खम्बे को लगने का एतिबार नहीं है।
  3. कंकरी मारने का समय सूरज ढलने से आरम्भ होता है और सूरज डूबने तक रहता है, आवश्यकता पड़ने पर रात को कंकरी मारने में कोई हरज की बात नहीं है; क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है: “चरवाहा रात को कंकरी मारे और दिन में चराए।” (यह हदीस हसन है, देखिए: सिलसिला सहीहा हदीस न. 2477)
  4. कंकरी मारने में किसी को वकील (प्रतिनिधित्व) बनाना जाईज़ नहीं है मगर असमर्थता के समय, या बुढ़ापा, या बीमारी, या कमसिनी आदि के कारण नुक़सान के डर से। ऐसी हालत में वह (वकील) सर्वप्रथम अपनी ओर से पहले जमरह को सात कंकरियाँ मारे, फिर अपने मुवक्किल की ओर से कंकरी मारे, फिर मध्यस्थित जमरह और जमरतुल अक़्बह को भी इसी प्रकार कंकरी मारे।

    • अल्बत्ता आजकल कुछ लोगों का वकील बनाने में विस्तार से काम लेना गलत है, और जिस व्यक्ति को चाहे वह मर्द हों या औरतें, भीड़-भाड़ का डर हो तो उसके ऊपर लाज़िम है कि वह ऐसे समय कंकरी मारने के लिए जाए जिस में भीड़-भाड़ न हो, जैसे रात के समय।
  5. तीनों जमरात को कंकरी मारने में तरतीब का ख्याल करना ज़रूरी है; पहले छोटा जमरह, फिर मध्यस्थित जमरह और फिर जमरतुल अक़्बह को कंकरी मारें।
  6. कुछ लोगों का जमरात के पास गाली-गलोज देना, जूते-चप्पल, छतरी, बड़े पत्थर आदि से मारना और यह एतिक़ाद रखना कि शैतान खम्बे में बंधा हुआ है, गलत है।
  7. मिना में रात का अक्सर हिस्सा बिताने से मिना में रात गुज़ारने का वाजिब पूरा हो जाता है, जैसे के अगर सारी रात 11 घन्टे की होती है,

    तो एक ही साथ या अलग-अलग साढ़े पाँच घन्टे से अधिक मिना में रहना अनिवार्य है।
  8. (जल्दी करने वाले के लिए) ज़ुल-हिज्जा की 12वीं तारीख को कंकरी मारने के बाद मिना से रवाना होना जाईज़ है, तथा वह सूरज डूबने से पहले निकले गा; यदि सूरज डूब गया और वह अभी तक मिना ही में है तो उसके लिए रात गुज़ारना और अगले दिन कंकरी मारना अनिवार्य है; परन्तु यदि वह रवाना होने के लिए तैयार था और भीड़-भाड़ आदि के कारण मिना ही में सूरज डूब गया; तो उसके लिए कूच करना जाईज़ है और उसके ऊपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है।

13. ज़ुलहिज्जा की 12वीं तारीख

१. जब आप ज़ुल-हिज्जा की 12वीं तारीख को जमरात को कंकरी मार चुकें, तो यदि आप जल्दी करना चाहें तो सूरज डूबने से पहले मिना से निकल जाएं, और यदि आप देर करना चाहें और यही अफ़ज़ल है तो ज़ुल-हिज्जा की तेरहवीं रात मिना में बिताएं, और सूरज ढलने के बाद और डूबने से पहले तीनों जमरात को कंकरी मारें; क्येांकि अय्यामें-तश्रीक़ सूरज डूबने से ख़त्म हो जाता है।

२. अगर ज़ुल-हिज्जा की 12वीं तारीख को (अय्यामे-तश्रीक़ के दूसरे दिन) सूरज डूब जाए और आप मिना में हों तो उस रात को मिना में बिताना और अगले दिन कंकरी मारना फ़र्ज़ है, परन्तु अगर आप निकलने के लिए तैयार हों लेकिन जैसे के भीड़ के कारण सूरज डूब जाए और आप अभी मिना ही में हैं; तो आप के लिए निकलना जाईज़ है और आप के ऊपर कोई चीज़ फ़र्ज़ नहीं है।

३. मक्काह से सफर करने के वक्त आप पर लाज़िम है कि सात चक्कर तवाफे विदाअ् करें, और इसके बाद सुन्नत यह है कि आप मक़ामे इब्राहीम के पीछे दो रक्अत नमाज़ पढ़ें।

४. हैज़ और निफास (माहवारी और प्रसव) वाली औरतों पर तवाफे विदाअ् नहीं है, चुनांचे इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि उन्हों ने कहा: “लोगों को इस बात का हुक्म दिया गया है कि उनका आखरी काम खाना-ऐ-काबा का तवाफ हो, लेकिन हैज़ वाली औरत से माफ कर दिया गया है।” [बुखारी व मुस्लिम]

इसी पर आपका हज्ज मुकम्मल हो जाता हैं।

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