जानिए- क्यों मनाई जाती ही क़ुरबानी ईद ? (क़ुरबानी की हिक़मत)

“कह दो कि मेरी नमाज़ मेरी क़ुरबानी ‘यानि’ मेरा जीना मेरा मरना अल्लाह के लिए है जो सब आलमों का रब है” – (कुरआन 6:162)
*बकरा ईद का असल नाम “ईदुल-अज़हा” है, मुसलमानों में साल में दो ही त्यौहार मजहबी तौर पर मनाए जाते हैं एक “ईदुल फ़ित्र” और दूसरा “ईदुल अज़हा”,..
– ईदुल फ़ित्र जहाँ रमज़ान के पूरा होने पर मनाई जाती है वहीं वह कुरआन के नाज़िल होने के शुरू होने की ख़ुशी भी अपने अन्दर रखती है.
– ऐसे ही ईदुल अज़हा जहाँ हज के पूरा होने पर मनाई जाती है,.. वहीं इन्ही दिनों में कुरआन 23 साल में नाज़िल हो कर पूरा हुआ था, और दीन के मुकम्मल होने का ऐलान कर दिया गया था. (सूरेह मायदा 3)

*ईदुल अज़हा असल में हज से जुड़ी हुई है,. कुर्बानी हज का अहम एक हिस्सा है, पूरी दुनियां के मुसलमान तो हर साल हज नहीं कर सकते इस लिए ईदुल अज़हा के ज़रये वो हज से जुड़ते हैं,.. उन्ही की तरह क़ुरबानी करके अल्लाह के लिए क़ुरबानी के ज़ज्बे का इज़हार करते हैं और हाजी की तरह ही हज के दिनों में नमाज़ के बाद तकबीर पढ़ते और बाल वगैरह के काटने से परहेज़ करते हैं.
हज इसलाम में एक अहम इबादत है यह इस्लाम की पांच बुन्यादों में से एक है,

हज की हिकमत जानने के लिए यह पोस्ट भी पढ़ें. › हज की हिकमत

*क़ुरबानी का लफ्ज़ “क़ुर्ब” से बना है जिसका मतलब होता है ‘करीब होना’. यानि ईदुल अज़हा को अपने जानवर को ज़िबह करने का मकसद अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करना होता है, यानि अल्लाह से अपनी नजदीकियों को बढ़ाना.

– ईद की क़ुरबानी के बारे में उलेमा में इख्तिलाफ है कुछ इसे वाजिब कहते हैं और कुछ इसे सुन्नत कहते हैं.
लेकिन यह बात दर्जनों हदीसों से साबित है कि बिना हज के मदीने में अल्लाह के रसूल (स) पाबन्दी से क़ुरबानी किया करते थे और सहाबा भी करते थे,..
*मिसाल के लिए देखये:
♥ अब्दुल्लाह बिन उमर बयान करते हैं कि “नबी (स) दस साल मदीने में रहे और हर साल क़ुरबानी किया करते थे,..” – (मुसनद अहमद 4935, सुन्न तिर्मज़ी 1501)

♥ अल्लाह के रसूल (स) ने फ़रमाया: “जिसने भी ईद की नमाज़ के बाद जानवर ज़िबह किया उसकी क़ुरबानी हो गई और उसने मुसलमानों की सुन्नत पर अमल कर लिया..” – (सही बुखारी 5545)

♥ हज़रत अनस (र) फरमाते हैं कि “अल्लाह के रसूल (स) दो मैंढो की क़ुरबानी किया करते थे और मैं भी दो मैंढो की ही क़ुरबानी किया करता था,..” – (सही बुखारी 5553)

*वैसे तो इसलाम में कुर्बानी का ज़िक्र आदम (अ) के ज़माने से मिलता है, लेकिन इसलाम में बुनयादी तौर पर कुर्बानी हज़रत इब्राहीम (अ) के ज़माने से है जब उन्होंने अपने बेटे को कुर्बान करने की कोशिश की तो अल्लाह ने उनके बेटे के बदले एक जानवर की कुर्बानी ली तब से यह अपनी जान की कुर्बानी के निशान के तौर पर हर साल दी जाती है ,..

*क़ुरबानी में कई हिकमते हैं लेकिन इस का सबसे अहम् फलसफा यह है कि अल्लाह बन्दे के लिए सबसे बढ़ कर है.
इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि इसलाम में क़ुरबानी एक इबादत की हेसियत रखती है और जैसा की आप जानते हैं कि इबादतें जितनी भी हैं वो सब बन्दे का अल्लाह से ताल्लुक का इज़हार होती हैं. जैसे बदन से बंदगी का इज़हार नमाज़ में होता है और माल से इबादत करने का इज़हार ज़कात और सदके से होता है, ठीक ऐसे ही क़ुरबानी जान से बंदगी करने का इज़हार है.

– क़ुरबानी में अपने जानवर की जान को अल्लाह के नाम ज़िबह करके असलन बंदा इस जज़्बे का इज़हार कर रहा होता है कि मेरी जान भी अल्लाह की दी हुई है और जिस तरह आज मैं अपने जानवर की जान अल्लाह के लिए दे रहा हूँ अगर अल्लाह का हुक्म हुआ तो अपनी जान भी मैं देने के लिए तैयार हूँ. यही वह जज़्बा है जो क़ुरबानी की असल रूह है अगर हमारे अन्दर अपने जानवर की क़ुरबानी के साथ यह जज़्बा नहीं है तो यह असल क़ुरबानी नहीं है फिर यह ऐसे ही है जैसे रोज़ लोग अपने खाने के लिए जानवर ज़िबह करते हैं.

*पहले ज़माने में अपने जानवरों को दो ही वजह से ज़िबह किया जाता था, एक उसका गोश्त खाने के लिए और दूसरा कुछ मजहबों में अपने देवताओं की मूर्ती को जानवर का खून देने का रिवाज था, उससे यह समझा जाता था कि यह देवता खून पीते हैं और उससे खुश होते हैं ,..
– लेकिन क़ुरबानी में यह दोनों वजह सिरे से पाई ही नहीं जाती, क़ुरबानी के पीछे जो जज़्बा होता है वह यही है कि मेरी जान मेरे लिए नहीं अल्लाह के लिए है, यही जज़्बा क़ुरबानी का मकसद है और यही जज़्बा अल्लाह को मतलूब है,..
चुनाचे कुरआन में फ़रमाया – “अल्लाह के पास ना तुम्हारी कुर्बानियों का गोश्त पहुँचता है और ना उनका खून, अल्लाह को सिर्फ तुम्हारा तक़वा पहुँचता है,…” – (सूरेह हज: 37)

*क़ुरबानी इस नेमत का शुक्र भी है कि अल्लाह ने जानवरों को हमारे काबू में कर दिया है, हम तो शायद इसका अहसास ऐसे नहीं कर सकते लेकिन हमारे पूर्वज जानवरों ही के सहारे पले बढ़े हैं ,.. कई जानवर के हमसे ज़्यादा ताक़तवर होने के बावजूद अल्लाह ने उन्हें हमारे काबू में ऐसे किया कि बिना किसी मजदूरी के वह हमारे लिए काम करते रहे, हमने उन्हें खूंटे से बंधा, उन्हें ख़रीदा बेंचा, उनसे खेतों में मुश्किल काम लिए, उन पर सवारी की और भारी सामान ढोया और बिना कीमत दिए उन से दूध लिया ,.. यह सब कुछ हमारे लिए सिर्फ इस लिए मुमकिन हुआ क्यों कि अल्लाह ने उन्हें हमारे काबू में कर रखा है ,..

– क़ुरबानी इसका भी शुक्र अदा करना है कि उसमे आप अपने जानवर को अल्लाह के लिए कुर्बान करते हैं. इसी लिए कुरआन में इरशाद है:
♥ अल-कुरान: “और हमने हर उम्मत के लिए क़ुरबानी मुक़र्रर की है ताकि अल्लाह ने उनको जो चौपाए बख्शे हैं उन पर वो (ज़िबह करते हुए) उसका नाम लें. पस तुम्हारा मअबूद एक ही मअबूद है इसलिए तुम अपने आप को उसी के हवाले कर दो, और खुश खबरी दो उन लोगों को जिनके दिल अल्लाह के आगे झुके हुए हैं ,..” – (सूरेह हज 34)

♥ अल-कुरान: “अल्लाह ने जानवरों को (इसलिए) यूँ तुम्हारे क़ाबू में कर दिया है ताकि जिस तरह अल्लाह ने तुम्हें बनाया है उसी तरह उसकी बड़ाई करो और नेक लोगों को (आने वाली ज़िन्दगी की) खुश खबरी दो,..” – (सूरेह हज 37)

*एक अहम हिकमत क़ुरबानी की यह भी है कि इसके ज़रिये हज़रत इब्राहीम (अ) और उनके परिवार की तौहीद के लिए की जाने वाली महनते, मशक्कतें और कुरबानियों को याद किया जाए,.. उस लम्हे को ख़ास कर याद किया जाए जब हज़रत इब्राहीम (अ) को ख्वाब में हुक्म दिया गया कि वह अपने बेटे हज़रत इस्माइल (अ) को अल्लाह के लिए कुर्बान करें, तो उन्होंने इस हुक्म पर अमल करने की ठानी और फिर अपने बेटे हज़रत इस्माइल (अ) से मश्वरा किया तो उन्होंने भी ख़ुशी से अल्लाह पर कुर्बान होने की इच्छा ज़ाहिर की,..
– इस घटना में जहाँ एक तरफ हज़रत इब्राहीम (अ) के सब्र, वफादारी और अल्लाह ही का होने की तालीम है क्यों कि एक बाप के लिए अपने बच्चे की गर्दन पर छूरी चलाना खुद को मार डालने से कहीं ज़्यादा मुश्किल काम है, वहीं उनके बेटे ने भी अल्लाह के आगे झुकने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, कुरआन में उन बाप बेटों की बात चीत कुछ इस तरह नक़ल हुई है –
(….इब्राहीम ने कहा – “ऐ मेरे बेटे मैं ख्वाब में तुम्हे कुरबान करते हुए देखता हूँ तो तुम बताओ कि इस बारे में तुम्हारी क्या राय है ?..”
बेटे ने जवाब दिया – “अब्बू जान आप को जो हुक्म दिया जा रहा है उसे ज़रूर पूरा कीजये, अगर अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वालों में पाएँगे,..” – (सूरेह साफ्फात १०२)

– सच है कि यह जवाब इब्राहीम के बेटे का ही हो सकता था. इसमें हज़रत इस्माइल (अ) का कमाल यह ही नहीं कि कुरबान होने के लिए तैयार हो गए बल्कि कमाल यह भी है कि अपनी अच्छाई को अल्लाह की तरफ मंसूब किया कि ”अगर अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वालों में पाएँगे”

*इसी हवाले से एक और हिकमत इस हदीस में बयान हुई है –
अल्लाह के रसूल (स) से सहाबा ने पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल (स) यह कुरबानियां क्या हैं ?
आप (स) ने जवाब दिया कि तुम्हारे बाप इब्राहीम का तरीका,..” – (मुसनद अहमद 18797, इब्ने माजा 3127)

इस हदीस से क़ुरबानी की हिकमत समझ में आती है, वो है हज़रत इब्राहीम (अ) के तरीके को ज़ाहिरी तौर पर अंजाम दे कर उसको अमली तौर से अपनी ज़िन्दगी में शामिल करना ,..

*इब्राहीम सिर्फ एक नाम नहीं है बल्कि इब्राहीम एक सिंबल है तौहीद पर ईमान का,
– इब्राहीम एक सिंबल है सच्चाई को अकली बुन्यादों पर पा लेने का,
– इब्राहीम एक सिंबल है सच्चाई के लिए कुरबानियों का,
– इब्राहीम एक सिंबल है अपनी और अपने परिवार की पूरी ज़िन्दगी अल्लाह के हवाले कर देने का.

*हम जानते हैं हज़रत इब्राहीम (अ) ने तौहीद के मामले में अपने बड़ों से अपने बाप दादाओं के दीन से कोई समझोता नहीं किया,
– उन्होंने अल्लाह के बारे में सच के सिवा कोई बात ज़रा क़ुबूल नहीं की, हज़रत इब्राहीम (अ) वो हैं जिन्होंने आज़माइश के इम्तिहान को 100% से पास किया, जिनके बारे में कुरआन ने फ़रमाया –
“और जब इब्राहीम को उनके रब ने कई बातों से आज़माया तो उन्होंने उन्हें आखरी दर्जे में पूरा कर दिखाया…” – (सूरेह बक्राह १२४)

इसी लिए अल्लाह ने फ़रमाया –
✦ “सलाम हो इब्राहीम पर,..” – (सूरेह साफ्फात १०९)
“बेशक वो हमारे मोमिन बन्दों में से था,..” – (सूरेह साफ्फात १११)
“बेशक इब्राहीम ‘अपनी जगह’ एक अलग उम्मत थे, अल्लाह के फर्माबरदार, सब बातिल खुदाओं से कट कर सिर्फ एक अल्लाह के होने वाले थे और वो अल्लाह के साथ किसी को शरीक करने वाले हरगिज़ नहीं थे,..” – (सूरेह नहल १२०)

*लिहाज़ा सिर्फ अपने एक जानवर को कुर्बान कर लेने से हम इब्राहीम के नक़्शे कदम पर नहीं कहलाए जा सकते, उसके लिए तो हमें ”हनीफ” होना पड़ेगा और हनीफ कहते हैं जो सिर्फ एक अल्लाह का हो जाए, उसकी नाराज़गी से डरे, उस से सबसे बढ़ कर मुहब्बत करे,..
कुरआन ने फ़रमाया – “बेशक सब लोगों में इब्राहीम से करीब वो लोग हैं जो उनकी पैरवी करते हैं, और यह नबी (हज़रत मुहम्मद स.) हैं और वो लोग जो ईमान लाए (यानि सहाबा) और अल्लाह मोमिनों का साथी है,..” – (सूरेह आले इमरान ६८)

– तो एक तरफ क़ुरबानी के यह अज़ीम मकसद और हिकमतें हैं और दूसरी तरफ ईदुल अज़हा को हमारा रवय्या…. आगे हमे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं,.. हम में से हर एक खुद अपने गिरेंबान में झांक कर देख सकता है कि क्या वाकई ईदुल अज़हा को मेरे दिल की कैफयत वही होती है जो क़ुरबानी का मकसद है, या हम क़ुरबानी सिर्फ खाने और दिखाने के लिए करते हैं ?

जान दी……. दी हुई उसी की थी.
हक़ तो यह है कि हक़ अदा ना हुआ.

– (मुशर्रफ अहमद)

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Comments (9)
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  • Sheruddin

    Assalamwalekum pls 1 baat clear karen theek h Allah ki rah me hamne koi janwer kurbaan ker diya …to hamne kurbaan to Allah k liye kiya …ab ham uske gost ko khate kyon h …..theek h hamari dharmik manyata h ki hum kurbaani karen isme us jaanwer ki kya khata h jise jibah kiya jaata h …koi bhi Khuda kisi jaanwer ki marne k liye nahi kah sakta..

    • musharraf ahmad

      वालैकुम अस्सलाम
      भाई क्या आप ने यह पूरी पोस्ट पढ़ी है ? अगर नहीं पढ़ी तो बराय महरबानी एक बार ध्यान से पढ़ लीजये उसके बाद मैं आप के हर सवाल का जवाब देने के लिए इंशा अल्लाह हाज़िर हूँ.

    • Mustafa Allabakhsh Bademgol

      Bhai aap ka sawaal bahoot achha hai
      Uska jawab suniye
      1.khuda nahi balke Allah ek hai .
      Ye isliye k aap Ne kaha ki koi khuda kisi Janwar Ko marne ki nahi kahega.
      2.gosth khani ka Jahan tak baat hai Allah ne Quraan me farmaya ki tumhara gossth is muje zaroorat nahi hai .aur isliye hai hum kurbaani k Janwar ki teen parts karte hain.
      1.garib 2.rishtedaar 3. Apneliye. Allah ka ki Hissa kidar hai . Isliye ye ek aazmaish hai zo Allah aap ko azmana chahta hai.
      Is par aap marzi chaho to karo aap ke liye bhehtar hai koi zor zabadastti nahi hai mere bhai
      La ikra fiddeen.
      Deen m koi zabadastti nahi hai
      Agar aap ko kuch samajh m nahi aaya to muje is pe mail send karo :-bademgholm@gmail.com

  • Sheruddin

    KOI BHI KHUDA KISI JEEV KO MARNE K LIYE NAHI KEH SAKTA.

    • haidar

      are sheruddin bhai puri dunya janwar kat ti ha khane ke liye to hum musalman kat nhi sakte khuda ke liye uska gosht na sirf humlog khate ha balki taksim v krte ha garibo me iski wajah se jin gharibo ko kavi gosht nhi nasib hota ,o iska jaika le sakta ha .
      lekin kurbani ,agar ap upar thik se padhe ho ,ibrahim [Alaihis slam] KI Sunnat ha .r hum musalman is sunnat pe amal krte ha .
      is sunnat pe amal karke hum yah paigam dete ha ki hum Ibrahim [A.S] ki rab ki ibadat krrte ha uske sath kisi ko sharik nhi krte.
      r agar tum ye mante ho ki khuda kisi jiv ko marne ko ni keh sakta to tum sans v mat lo kyu ki tmhare sans lene se kayi jiv micro organism tmhare andar chale jate ha r mar v jate ha ,r sabji v mat khao .kyu ki inme v jan hote ha ye chij samajh agar tum science padhe hoge ,agr nhi padhe ho to padh lo ..
      agr mere kisi bat se hurt hua ho to maf krna mera maksad tmhara dil dukhana nhi tha .

    • Saddam khan

      Bhai jeev to kaddu lauki me bhi hai use kyo khate ho jeev to ped me bhi hai uski lakdi ka darwaja bed kyo istemal karte ho agar inme jeev nahi to koi paudha kat do phal sabji kaise viksit ho jayenge.

  • Furqan ahmad

    AAP is wapside par bhot ache baaton Bata rahe h

  • Arhan

    लेकिन अल्लाह ने तो इब्राहीम अस की सबसे करीबी चीज मांगी थी और हम जानवर को कुर्बान् करते है वो भी खरीद कर तो वो हमारी करीबी चीज कैसे हो गई ?

  • Bilal Raza

    Assalamualaikum wa rehmetullahi wa barqatohu.
    Jab tak maine jo ilm hasil kiya hai tab tak muje aisa lag raha hai ke kurbani apno ki hoti hai. Sab se pehle to ek saal ya do saal ke liye ek janvar ko bade pyar se pale, itna pyar se ke wo janwar aapki family ka ek sadasya ban jaye, uske prati aap ke dil me pyar bhavna ho, jab wo bhuka ho tab use khana khilaye, use charane le jaye, jab wo bimar ho tab uski tabiyat ka dhyan rakhe or jab aap ko usse ek family member jaisa lagav ho jaye tab use Allah ki raah me kurban kare. Ab is waqt us par chura ghumane me aap ke haath kaapenge. Lekin jo momin hoga wo achi tarah janta hoga ke ye sunnat hai. Yeh kurbani karna bhi to ek momin ki pehchan hi hai. Eid aane par paise se janwar ko kharid kar kurban karna isme koi lagav hota hai ya nahi ye muje nahi pata. Lekin aaj kal ye duniyabi chakkar ne, jaise ki jyadatar corporates, institutes etc ne paise ko hi hamari sab se jyada pyari cheez bana di hai or hum sochte hai ke Eid ki khushi me hum hamari pyari cheez ‘paise’ ko kharch kar ke janwar kharid te hai or use kurban karte hai or sochte hai ke hum ne kurbani kar di. Kya sahi me ye kurbani hai? Kuch log kehte hai ke aaj kal ki bhag daud wali zindagi me yahi sahi hai lekin me puchta hu ki aaj kal ki zindagi ko bhag daud wali bhi to hum ne hi banayi hai. Lekin agar dekhne jaye to Allah ne zindagi badi khubsurat or assan si banayi hai jise hum log badsurat or mushkil si bana te jaa rahe hai.
    Agar is post me hum se koi galti huee ho to mafi chahte hai.
    Beshak Allah behtar jannewala hai.


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