ताजियों का इस्लाम से नहीं कोई रिश्ता , जानिए ताजियों के शुरूआत की हकीकत

✦ मुहर्रम क्या है ?

मुहर्रम कोई त्योहार नहीं है, यह सिर्फ इस्लामी हिजरी सन् का पहला महीना है। पूरी इस्लामी दुनिया में मुहर्रम की नौ और दस तारीख को मुसलमान रोजे रखते हैं और मस्जिदों-घरों में इबादत की जाती है। क्यूंकि ये तारीख इस्लामी इतिहास कि बहुत खास तारीख है….. रहा सवाल भारत में ताजियादारी का तो यह एक शुद्ध भारतीय परंपरा है, जिसका इस्लाम से कोई ताल्लुक़ नहीं है। .. तजिया की शुरुआत बरसों पहले तैमूर लंग बादशाह ने की थी, जिसका ताल्लुक ‍शीआ संप्रदाय से था। तब से भारत के शीआ और कुछ क्षेत्रों में हिन्दू भी ताजियों (इमाम हुसैन की कब्र की प्रतिकृति, जो इराक के कर्बला नामक स्थान पर है) की परंपरा को मानते या मनाते आ रहे हैं।

✦ भारत में ताजिए का इतिहास:

भारत में ताजिए और बादशाह तैमूर लंग का गहरा रिश्ता है। तैमूर बरला वंश का तुर्की योद्धा था और विश्व विजय उसका सपना था। सन् 1336 को समरकंद के नजदीक केश गांव ट्रांस ऑक्सानिया (अब उज्बेकिस्तान) में जन्मे तैमूर को चंगेज खां के पुत्र चुगताई ने प्रशिक्षण दिया। सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में ही वह चुगताई तुर्कों का सरदार बन गया। फारस, अफगानिस्तान, मेसोपोटामिया और रूस के कुछ भागों को जीतते हुए तैमूर भारत (1398) पहुंचा। उसके साथ 98000 सैनिक भी भारत आए। दिल्ली में मेहमूद तुगलक से युद्ध कर अपना ठिकाना बनाया और यहीं उसने स्वयं को सम्राट घोषित किया। तैमूर लंग तुर्की शब्द है, जिसका अर्थ तैमूर लंगड़ा होता है।

वह दाएं हाथ और दाए पांव से पंगु था। तैमूर लंग शीआ संप्रदाय से था और मुहर्रम माह में हर साल इराक जरूर जाता था, लेकिन बीमारी के कारण एक साल नहीं जा पाया। वह हृदय रोगी था, इसलिए हकीमों, वैद्यों ने उसे सफर के लिए मना किया था। बादशाह सलामत को खुश करने के लिए दरबारियों ने ऐसा करना चाहा, जिससे तैमूर खुश हो जाए। उस जमाने के कलाकारों को इकट्ठा कर उन्हें इराक के कर्बला में बने इमाम हुसैन के रोजे (कब्र) की प्रतिकृति बनाने का आदेश दिया। कुछ कलाकारों ने बांस की किमचियों की मदद से ‘कब्र’ या इमाम हुसैन की यादगार का ढांचा तैयार किया। इसे तरह-तरह के फूलों से सजाया गया। इसी को ताजिया नाम दिया गया।

इस ताजिए को पहली बार 801 हिजरी में तैमूर लंग के महल परिसर में रखा गया। तैमूर के ताजिए की धूम बहुत जल्द पूरे देश में मच गई। देशभर से राजे-रजवाड़े और श्रद्धालु जनता इन ताजियों की जियारत (दर्शन) के लिए पहुंचने लगे। तैमूर लंग को खुश करने के लिए देश की अन्य रियासतों में भी इस परंपरा की सख्ती के साथ शुरुआत हो गई। खासतौर पर दिल्ली के आसपास के जो शीआ संप्रदाय के नवाब थे, उन्होंने तुरंत इस परंपरा पर अमल शुरू कर दिया तब से लेकर आज तक इस अनूठी परंपरा को भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और बर्मा (म्यांमार) में मनाया जा रहा है। जबकि खुद तैमूर लंग के देश उज्बेकिस्तान या कजाकिस्तान में या शीआ बहुल देश ईरान में ताजियों की परंपरा का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। 68 वर्षीय तैमूर अपनी शुरू की गई ताजियों की परंपरा को ज्यादा देख नहीं पाया और गंभीर बीमारी में मुब्तिला होने के कारण 1404 में समरकंद लौट गया। बीमारी के बावजूद उसने चीन अभियान की तैयारियां शुरू कीं, लेकिन 19 फरवरी 1405 को ओटरार चिमकेंट के पास (अब शिमकेंट, कजाकिस्तान) में तैमूर का इंतकाल (निधन) हो गया।

लेकिन तैमूर के जाने के बाद भी भारत में यह परंपरा जारी रही। तुगलक-तैमूर वंश के बाद मुगलों ने भी इस परंपरा को जारी रखा। मुगल बादशाह हुमायूं ने सन् नौ हिजरी 962 में बैरम खां से 46 तौला के जमुर्रद (पन्ना/ हरित मणि) का बना ताजिया मंगवाया था। कुल मिलकर ताज़िया का इस्लाम से कोई ताल्लुक़ ही नही है….लेकिन हमारे भाई बहन जो न इल्म है और इस काम को सवाब समझ कर करते है उन्हें हक़ीक़त बताना भी हमारा ही काम है.

“ उन्होनें बिद्दत खुद इजात की हमने इसकी इजाजत नही दी ” - (कुरान: ५७:२७)
“ हर गुमराही कि चीज यानी बिद्दत जहन्नम में ले जाने वाली है ” - (हदीस: अबू दाऊद, तिरमिज़ी, इब्नेमाजा)

– – – – – – – –

“कहदो गमे हुसैन मनाने वालो से ,
मोमिन कभी शहीद का मातम नही करते ,

हे इश्क अपनी जां से ज्यादा आले रसूल से ,
यूं सरे आम उनका तमाशा नही करते,

रोए वो जो मुनकिर है सहादते हुसैन के
हम जिंदा वो जावेद का मातम नही करते “
– शोएब सिद्दीकी।

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Comments (17)
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  • Mohammed Hanif

    Gud Joke Bro
    I love Taziyadari N i Love PANJATAN e Paak

    • Mohammad Sohail Siddiqui

      Its not a joke Mr. Hanif, its a reality which illiterate Muslims don’t have knowledge about, if you like to follow you are free to do whatever you understand, but you will never ever near to Jannat as Allah Subhanutaala says in Quran, that He can Forgive anything except SHIRK, taziadari is not only Biddat but also Shirk.

      • S.m.ali

        Shirk kya hota hai
        Taziyedari ko shirk kahne se kya tatparye hai

        • Md. Bismillah

          इस्लाम को जानने का कोशिश किजीए।
          शिर्क क्या है? बिद्अत क्या है?
          सब जान जाएगे।

      • M I Rahman

        mohammad sohail siddique aapko pata hai shirk aur biddat kya hai. nahi pata hai to janye fir bat kijye.

  • Samar Singh

    Sahi kha tumne…
    Qatil kabhi maqtool ka matam nahi krte..

  • AMEER FATMA

    SACH HAI KI “QATIL KABHI MAQTOOL KA MATAM NAHI KARTE” TO BHAI SAHAB AAP KE HISAAB SE TO “BAQRA EID” BHI SHIRK AUR BIDAT HUA KYUKI USKA TAALLUQ QURBANI SE HAI.MERE HISAAB SE AAP KI HISTORY THODI SI WEEK HAI AAP APNI HISTORY STRONG KRIYE AUR WAHSHIYO KI SMAJH ME MUHARRAM NAHI AA SAKTA.AKHIR JAHANNAM KA PET KAISE BHAREGA WO BHI TO ZARURI HAI.

    • WALMIK PATIL

      AL HAMDU LILLAH RABBUL AALMEE……WAH BAHUT KHUB KAHA

    • Jannat Fatima

      Exactly salamat rahiye

  • Laikur Rahman

    yeh story hakiqat hai yeh mujhe maloom hai

  • Azmat Parween

    Mjhe bahut khusi hui is jaankari se
    Log namaj k wakt akhadebme maojood rahte h.Beemar logon k raste me rukawat bante h aur mjhe pura yakeen h hamara majhab kabhi aise kam ki izazat nhi dega

  • Ajaj Ahmad

    Tajiya Islam ka hissa to Nahi lekin Ye issk Ki bat

    • mohd abdullah

      bhai jo kuch quraan me kaha jaye use hame maan na hai…. Log namaj k wakt akhadebme maojood rahte h.Beemar logon k raste me rukawat bante h aur mjhe pura yakeen h hamara majhab kabhi aise kam ki izazat nhi dega

  • Ajaj Ahmad

    Sahid kabhi Mara Nahi karte wo apni gharo me aaram farma rahe he

  • Rijwan

    Pahle tareekhe Islam padho mere bhai

  • Mohammad Sahib Ali

    MashaAllah

  • Arbaz alam

    Jo khud ko musalman kahte wah Islam se hat kar kam kar dete hai jo unko jahanum me lekar jayega. Jo shaheedo ke matam katre hai wah quran samaj kar nahi padate


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