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ग़ज़वा-ए-उहुद में मुसलमानों की आज़माइश

ग़ज़वा-ए-उहुद में मुसलमानों ने बड़ी बहादुरी से मुशरिकीने मक्का का मुकाबला किया, जिस में पहले फतह हुई, मगर बाद में एक चूक की वजह से नाकामी का सामना करना पड़ा।

जंग शुरू होने से पहले रसूलुल्लाह (ﷺ) ने पचास तीरअन्दाजों की एक जमात को पहाड़ की घाटी पर जहाँ से दुश्मनों के हमले का खतरा था, मुकर्रर कर दिया और यह ताकीद फरमाई के “जंग में फतह हो या शिकश्त” तुम अपनी जगह से हरगिज न हटना।

जब मुसलमानों को शुरू में फतह हुई, तो काफिरों को भागता हुआ देख कर यह लोग भी अपनी जगह से यह समझ कर हट गए के अब जंग खत्म हो चुकी, क्यों न हम भी माले गनीमत जमा करने में अपने भाइयों की मदद करें।

उन के अमीर हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर (र.अ) ने बार बार रोकने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने फतह की खुशी में बात न सुनी और पहाड़ से नीचे उतर आए।

हजरत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ) जो उस वक्त मुसलमान नहीं हुए थे और कुफ्फार की तरफ से लड़ रहे थे, जब उस जगह को खाली देखा, तो पीछे से हमला कर दिया।

इधर मुसलमान बेफिक्र थे, बिल आख़िर भागते हुए मुशरिकीन पलट कर मुसलमानों पर टूट पड़े, अचानक हमला होने की वजह से कुफ्फार के बीच में आ गए, जिस की वजह से ७० मुसलमान शहीद हुए, आप (ﷺ) का सर मुबारक जख्मी और एक मुबारक दाँत भी शहीद हो गया

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