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जंगे ओहद

जंगे बद्र की शिकस्त से कुरैशे मक्का के हौसले तो पस्त हो गए थे, मगर उन में ग़म व गुस्से की आग भड़क रही थी, उस आग ने उन को एक दिन भी चैन से बैठ ने न दिया।

एक साल तो उन्होंने किसी तरह गुजारा, लेकिन सन ३ हिजरी में अबू सुफियान ने मुकम्मल तय्यारी के साथ तीन हजार का लश्कर ले कर मदीना के बाहर उहुद पहाड़ के पास पड़ाव डाला, उस के साथ तीन हजार ऊँट, दो सौ घोड़े और सात सौ आदमी जिरह पहने हुए थे।

रसूलुल्लाह (ﷺ) शव्वाल सन ३ हिजरी में नमाज़े जमा अदा कर के एक हजार मुसलमानों को ले कर उहद की तरफ रवाना हुए, मगर ऐन वक्त पर मुनाफिक़ों ने धोका दे दिया और अब्दुल्लाह बिन उबइ अपने तीन सौ आदमियों को ले कर वापस हो गया।

अब मुसलमानों की तादाद सिर्फ सात सौ रह गई, उहुद के मक़ाम पर लड़ाई शुरू हुई और दोनों जमातें एक दूसरे पर हमला आवर हुईं, इस जंग में मुसलमानों को पहले फतह हुई मगर एक चूक की वजह से जंग का पासा पलट गया।

To Be Continued …

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