काबिल और हाबील » Qasas ul Anbiya: Part 3

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कुरआन मजीद ने हज़रत आदम अलैहि सलाम के इन दोनों बैटों का नाम ज़िक्र नहीं किया सिर्फ़ “आदम के दो बेटे” कहकर मुज्मल छोड़ दिया है, अलबत्ता तौरात में उनके नाम बयान किए गए हैं। कुछ रिवायतों में इन दोनों भाइयों में अपनी शादियों से मुत्ताल्लिक् जबरदस्त इख्तिलाफ़ का जिक्र किया गया है। इस मामले को ख़त्म करने के लिए हज़रत आदम अलैहि सलाम ने यह फैसला फ़रमाया कि दोनों अपनी-अपनी क़ुरबानी अल्लाह के हुज़ूर में पेश करें। जिसकी कुर्बानी मंजूर हो जाए, वही अपने इरादे के पूरा कर लेने का हक़दार है।

क़ाबिल और हाबिल की नज़्र

जैसा कि तौरात से मालूम होता है, उस ज़माने में कुर्बानी के कुबूल होने का यह इलहामी तरीक़ा था कि नज्र व क़ुरबानी की चीज़ किसी बुलन्द जगह पर रख दी जाती और आसमान से आग ज़ाहिर होकर उसको जला देती थी।

इस क्रानून के मुताबिक हाबील ने अपने रेवड में से एक बेहतरीन दुंबा अल्लाह को नज्र किया और काबील ने अपनी खेती के ग़ल्ले में से रद्दी किस्म का ग़ल्ला क़ुरबानी के लिए पेश किया। दोनों की अच्छी और बुरी नीयतों का अन्दाजा इसी अमल से हो गया। इसीलिए दस्तूर के मुताबिक़ आग ने आ कर हाबील की नज्र को जला दिया और इस तरह क़ुरबानी क़ुबूल होने का शरफ़ उसके हिस्से में आया। काबील अपनी इस तौहीन को किसी तरह बर्दाश्त न कर सका और उसने गैज़ व ग़ज़ब में आकर हाबील से कहा कि मैं तुझको क़त्ल किए बगैर न छोड़ंगा, ताकि तू अपनी मुराद को न पहुंच सके।

हाबील ने जवाब दियाः मैं तो किसी तरह तुझ पर हाथ न उठाऊंगा, बाक़ी तेरी जो मर्जी आए, वह कर। रहा क़ुरबानी का मामला, सो अल्लाह के यहां नेक नीयत ही की नज्र कुबूल हो सकती है। वहां बद-नीयत की न धमकी काम आ सकती है और न बेवजह ग़म व गुस्सा और इस पर काबिल ने गुस्से से बहुत ज़्यादा भड़क कर अपने भाई हाबील को मार डाला।

कुरआन पाक में न शादी से मुताल्लिक़ इख्तिलाफ़ का ज़िक्र है और न इन दोनों के नामों का ज़िक्र है, सिर्फ़ क़ुरबानी (नज़र) का ज़िक्र है और इस रिवायत से ज़्यादा हाबील की लाश के दफ़न से मुताल्लिक़ यह इज़ाफ़ा है।

कत्ल के बाद क़ाबील हैरान था कि इस लाश का क्या करें? अभी तक आदम की नस्ल मौत से दो-चार नहीं हुई थी और इसीलिए हज़रत आदम अलैहि सलाम ने मुर्दे के बारे में अल्लाह का कोई हुक्म नहीं सुनाया था। यकायक उसने देखा कि एक कौवे ने ज़मीन कुरेद-कुरेद कर गढ़ा खोदा। काबील इसे देखकर चेता कि मुझे भी अपने भाई के लिए इसी तरह गढ़ा खोदना चाहिए और कुछ रिवायतों में है कि कौवे ने दूसरे मुर्दे कौवे को उस गढ़े में छुपा दिया।

काबील ने यह देखा तो अपनी नाकारा जिंदगी पर बेहद अफ़सोस किया और कहने लगा कि में इस जानवर से भी गया गुज़रा हो गया कि अपने इस जुर्म को छुपाने की भी अह्लियत नहीं रखता। शरमिंदगी और अफ़सोस से सर झुका लिया और फिर उसी तरह अपने भाई की लाश को मिट्टी के हवाले कर दिया। इस वाकिये के बयान के बाद क़ुरआन पाक में आता है कि:

इंसी वजह से लिखा हमने बनी इसराईल पर कि जो कोई क़त्ल करे एक जान को बीला एवज जान के, या फ़साद करने की गरज़ से तो गोया उसने कत्ल कर डाला उन सब लोगों को और जिसने ज़िंदा रखा एक जान को तो गोया जिंदा कर दिया सब लोगों को।’ [सुरा माइदा 5:32]

इमाम अहमद ने अपनी मुस्नद में हज़रत अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद र.अ से एक रिवायत की है:

“अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्‍लम ने फ़रमाया कि दुनिया में जब भी कोई जुल्म से क़त्ल होता है तो उसका गुनाह हज़रत आदम अलैहि सलाम के पहले बटे (काबिल) की गरदन पर ज़रूर होता है, इसलिए कि वह पहला आदमी है, जिसने जालिमाना क़त्ल की शुरूआत की और यह नापाक सुन्नत जारी की।

इबरत की जगह

सूर: माइदा की जिक्र की गई आयत और ऊपर लिखी हदीस हम पर यह हक़ीक़त जाहिर करती है कि इंसान को अपनी ज़िंदगी में हरगिज़ किसी गुनाह की ईजाद नही करनी चाहिए, क्योंकि कायनात में जो आदमी भी आगे इस ‘बिदअत’ (नए काम) का इक्रदाम करेगा, तो बिदअत की बुनियाद रखने वाला भी बराबर उस गुनाह का हिस्सेदार बनता रहेगा और ईजाद करने वाला होने की वजह से हमेशा वाली ज़िल्लत और घाटे का हक़दार ठहरेगा। [नऊज़ुबिल्‍लाहि मिन ज़ालिक]

(हजरत आदम अलैहि सलाम के इन दो बेटों का जिक्र सूराः माइदा में किया गया है।)

नोट: मुसन्निफ़ (लेखक) की तर्तीब के मुताबिक़ हज़रत आदम अलैहि सलाम के तज्किरे के बाद हज़रत नूह अलैहि सलाम का जिक्र किया जाता है।

To be continued …

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