Valentine’s Day : वेलेंटाइन्स डे की वास्तविकता और उसके विषय में इस्लामी दृष्टि कोण

हर प्रकार की प्रशंसा सर्व जगत के पालनहार अल्लाह तआला के लिए योग्य है,
तथा अल्लाह की कृपा एंव शांती अवतरित हो अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद पर,
तथा आप के साथियों, आप की संतान और आप के मानने वालों पर। 

वैलेंटाइन डे की शुरुआत कैसे हुई?

हर वर्ष १४, फरवरी को पूरे विश्व में बड़ी धूम-धाम से वेलेंटाइन्स डे मनाया जाता है,
किन्तु इस पर्व की वास्तविकता क्या है? और इस्लामिक दृष्टिकोण से एक मुसलमान के लिए इस में भाग लेना या इसे मनाना कैसा है? इस लेख में इन्हीं तत्वों को स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि
एक मुसलमान अपने धर्म के विषय में सावधानी रहे और ऐसे कार्यों में न पड़ जो उसके धर्म के लिए घातक सिद्ध हों। 

इसका इतिहासिक पृष्ठ भूमि यह है कि संत वेलेंटाइन तीसरी शताब्दी ईसवी के अन्त में
रूमानी राजा कलाडीस के शासन-अधीन रहता था।

किसी अवज्ञा के कारण राजा ने सन्त को जेल में
डाल दिया। जेल में जेल के एक चौकीदार की बेटी से
उसकी जान पहचान हो गई और वह उस पर मोहित हो गया।
यहाँ तक कि उस लड़की ने ईसाई धर्म
स्वीकार कर लिया और उस के साथ उस के ४६ रिश्तेदार भी ईसाई हो गये।

वह लड़की एक लाल गुलाब का फूल लेकर उस से मिलने के लिए आती थी।
जब राजा ने उस का यह मामला देखा तो उसे फाँसी देने का आदेश जारी कर दिया।

सन्त को जब यह पता चला तो उस ने सोचा कि उसके जीवन का अन्तिम क्षण अपनी प्रेमिका के साथ बीते,
चुनांचे उसने उस के पास एक कार्ड भेजा जिस पर लिखा हुआ था : “शुद्धहृदय वेलेन्टाइन की ओर से “
फिर उसे १४ फरवरी २७० ई. को फाँसी दे दी गई।

इस के बाद यूरोप के बहुत सारे गाँवों में हर वर्ष
इस दिन लड़कों की ओर से लड़कियों को कार्ड भेजने की प्रथा चल पड़ी।

एक समय काल के पश्चात पादरियों ने उसे इस प्रकार से बदल दियाः “सन्त वेलेन्टाइन की ओर से “

उन्हों ने ऐसा इस लिए किया ताकि
सन्त वेलेन्टाइन और उस की प्रेमिका की यादगार को सदा के लिए जीवित कर दें।

आज पूरी दुनिया में इस दिन को युवा लड़के
और लड़कियाँ बड़े हर्ष व उल्लास से मनाते हैं, इस अवसर पर वेलेन्टाइन कार्ड भेज जाते हैं,

विशेष रूप से लाल गुलाब के फूल पेश किये जाते हैं, वेलेन्टाइन-डे की बधाई दी जाती है,
अनेक प्रकार के उपहार, तुह्फे और यादगार निशानियाँ भेंट की जाती हैं।

इस प्रकार यह त्योहार युवक लड़को और
लड़कियों के बीच बे-हयाई, अश्लीलता और
दुराचार फैलाने और उन्हें प्रोत्साहन देने का माध्यम बन गया है।

इस्लाम में वैलेंटाइन डे मनाना कैसा ?

दुर्भाग्य से मुस्लिम समाज भी इस से सुरक्षित नहीं रहा। जबकि दरअसल यह रूमानियों का एक मूर्ति पूजन-श्रद्धा है

जिस में अल्लाह को छोड़ कर एक मूर्ति की पूजा
होती हैं जिसे उनके निकट प्रेम का देवता समझा जाता है।

जिसे बाद के समय में ईसाईयों ने अपने
धर्म के अन्दर सन्त वेलेन्टाइन पर चस्पां कर के एक धार्मिक पर्व के रूप में मनाना आरम्भ कर दिया,

अब तो उसे पाप ने भी ईसाई पर्व के रूप में प्रमाणित कर दिया है।

अतः किसी मुसलमान के लिए इस को मनाना,
या किसी को इस की बधाई देना, या वेलेन्टाइन कार्ड भेजना, या उपहार आदि भेंट करना,
या इस में किसी भी प्रकार का सहयोग करना अवैध और पाप है।

क्योंकि इस्लाम से इसका कोई भी संबंध नहीं है,
बल्कि यह इसाईयों के त्योहारों और रीतियों में से है
और इस्लाम ने अपने मानने वालों को अन्य कौमों की रीतियों को अपनाने और धर्म के विषय में उनका अनुकरण करने से सख्ती से रोका है।

अल्लाह के शत्रुओं के अनुरूप बनने से सावधान करते हुए पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः

” जिस ने किसी कौम की मुशाबहत (अनुरूपता) अपनाई वह उन्हीं में से है।”

[ अबू दाऊद ]

हाफिज़ इब्ने कसीर रहिमहुल्लाह फरमाते हैं:

“ इस हदीस से पता चला कि गैरमुस्लिमों के कथनों, कर्मों, वस्त्रों, त्योहारों, उपासनाओं
और इन के अतिरिक्त अन्य वह बातें जिन्हें हमारी शरीअत ने हमारे लिए वैध घोषित नहीं किया है,
उनमें उनकी मुशाबहत (एक रूपता) अपनाने पर चेतावनी दी गई है और सख्ती के साथ उस से रोका गया है…”
(तफ़्सीर इब्ने कसीर १/३२९)

तथा वेलेंटाइन्स-डे मनाने से दुराचार, अश्लीलता और बेहयाई फैलती है, जो अल्लाह के निकट एक बड़ा पाप है।

अल्लाह तआला का फर्मान है: 

“जो लोग मुसलमानों में बेहयाई (अश्लीलता) फैलाने के इच्छुक रहते हैं
उनके लिए दुनिया और आखिरत (लोक औश्र पंलोक) में कष्टदायक अज़ाब है।”

[सूरह नूर: १६

इस आयत में हर उस व्यक्ति के लिए गंभीर वईद और
भयानक चेतावनी है जो मुस्लिम समाज में अश्लीलता के फैलाने का इच्छुक है,

तो फिर भला बतलाईए कि उस आदमी का हाल होगा जो स्वयं अश्लीलता फैलाता, या उसको प्रोत्साहन देता, या उसका निरीक्षक और अभिभावक है?

वर्तमान समय के धर्म-शास्त्रियों और ज्ञानियों ने इसके हराम और निषिध होने का फत्वा दिया है और
मुसलमानों को इस से दूर रहने और इस से बचाव करने की सुझाव दिया है।

इन में मुख्य रूप से सऊदी अरब की इफ्ता एंव वैज्ञानिक अनुसन्धान की स्थायी समिति है।
(देखियेः २३ ११/१४२० हिज्री का फत्वा नंबरः २१२०३)

इन्हीं में से सुप्रसिद्ध ज्ञानी शैख मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह हैं, जिनका इस बारे में
५/११/१४२० हिज्री को अपने हाथों से लिखा हुवा फत्वा मौजूद है।
(देखियेः इब्ने उसैमीन फतावा संग्रह १६/१६६-२००)

अल्लाह तआला से प्रार्थना है कि समस्त मुसलमानों को उचित रूप से इस्लाम धर्म को समझने की
तौफीक प्रदान करे और उन्हे हर प्रकार की बिदअतों और धर्म के विषय में अन्य क़ौमों का अनुकरण
करने से सुरक्षित रखे। आमीन

लेखक : अताउर्रहमान ज़ियाउल्लाह
atazia75@gmail.com

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