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Shab e Barat : क्या सहीह हदीसों में शबे बराअत का ज़िक्र आया है?

शबे बअरात की स्पेशल पोस्ट

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क्या सहीह हदीसों में शबे बराअत का ज़िक्र आया है?

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✍🏻तहरीर-अब्दुल अजी़ज़ बिन दाऊद (गुवाहाटी असम)

📞8011782463/8486523045

आऊजूबिल्लाही मिनश्शैतान निर्रजीम
बिस्मिल्लाहीर्रहमान निर्रहीम

हमारे प्यारे नबी(ﷺ) की किसी एक भी सहीह हदीष में शबे बराअत का ज़िक्र नहीं आया, जिन रिवायतों में शबे बराअत का ज़िक्र है उनमें कुछ तो सख्त ज़ईफ और ज्यादातर मौज़ूअ है। यहाँ पर कुछ ऐसी रिवायतों का तहक़ीक़ी जायज़ा लेंगे –

तीर्मीजी शरीफ की ये हदीस बड़ी मशहूर है और शबे बारात का बयान तो इस हदीस के बगैर अधुरा है –

हदीस-1

حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مَنِيعٍ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ، أَخْبَرَنَا الْحَجَّاجُ بْنُ أَرْطَاةَ، عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ:‏‏‏‏ فَقَدْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَيْلَةً، ‏‏‏‏‏‏فَخَرَجْتُ فَإِذَا هُوَ بِالْبَقِيعِ، ‏‏‏‏‏‏فَقَالَ:‏‏‏‏ أَكُنْتِ تَخَافِينَ أَنْ يَحِيفَ اللَّهُ عَلَيْكِ وَرَسُولُهُ ؟ قُلْتُ:‏‏‏‏ يَا رَسُولَ اللَّهِ، ‏‏‏‏‏‏إِنِّي ظَنَنْتُ أَنَّكَ أَتَيْتَ بَعْضَ نِسَائِكَ، ‏‏‏‏‏‏فَقَالَ:‏‏‏‏ إِنَّ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ يَنْزِلُ لَيْلَةَ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ إِلَى السَّمَاءِ الدُّنْيَا، ‏‏‏‏‏‏فَيَغْفِرُ لِأَكْثَرَ مِنْ عَدَدِ شَعْرِ غَنَمِ كَلْبٍ . وَفِي الْبَاب عَنْ أَبِي بَكرٍ الصِّدِّيقِ. قَالَ أَبُو عِيسَى:‏‏‏‏ حَدِيثُ عَائِشَةَ لَا نَعْرِفُهُ إِلَّا مِنْ هَذَا الْوَجْهِ مِنْ حَدِيثِ الْحَجَّاجِ، ‏‏‏‏‏‏وسَمِعْت مُحَمَّدًا يُضَعِّفُ هَذَا الْحَدِيثَ، ‏‏‏‏‏‏وقَالَ يَحْيَى بْنُ أَبِي كَثِيرٍ:‏‏‏‏ لَمْ يَسْمَعْ مِنْ عُرْوَةَ، ‏‏‏‏‏‏وَالْحَجَّاجُ بْنُ أَرْطَاةَ، ‏‏‏‏‏‏لَمْ يَسْمَعْ مِنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ.

“सैय्यदा आयशा रदियल्लाहु अन्हा कहती है कि मैने एक रात रसूलुल्लाह (ﷺ) को गायब पाया तो मैं आप की तलाश में बाहर निकली तो क्या देखती हूँ कि आप बक़ी कब्रस्तान में हैं, आप(ﷺ)ने फरमाया क्या तुम डर रही थी कि अल्लाह और उस के रसूल तुम पर जुल्म करेंगे? मैने अर्ज़ किया अल्लाह के रसूल(ﷺ)! मेरा गुमान था कि आप अपनी किसी और बीवी के यहां गए होंगे।
आप(ﷺ)ने फरमाया अल्लाह तआला पन्द्रवीं शाअबान की रात आसमान दुनिया पर नुजूल फरमाता है और बनू कल्ब की बकरियों के बालों से ज़ियादा तादाद में लोगों की मग़फ़िरत फरमाता है।

इमाम तिर्मीजी रहीहुल्लाह फरमाते है- “इस बाब में हजरत अबुबक्र सिद्दीक़ रदीयल्लाहु अन्हु से भी रिवायत आई हैं, आयशा रदीयल्लाहु अन्हा की हदीष को हम हज्जाज की रिवायत से जानते है, मेंनें इमाम मुहम्मद इस्माईल बुखारी को इस हदीस को जईफ कहते हुए सुना है फिर फरमाते है कि यह्या बिन कसीर का उरवा से सुनना साबित नहीं और हज्जाज बिन अरताह का यह्या बिन अबी कसीर से सुनना साबित नहीं (यानी इस हदीष की सनद में दो जगह इंकेता है)”

📚जामेय तिर्मिज़ी हदीष नंबर-739,
– इब्ने माजा,हदीष नंबर-1389,
– मुस्नद अहमद-6/238,
– शोअबुल ईमान लिल बैहकी-3824,
– मिश्कात हदीष नंबर-1299(ज़ईफ़)

🔍तहक़ीक़ी जायजा़

जैसा कि इस हदीष के बारे में खुद इमाम तिर्मीज़ी रहीमहुल्लाह ने बता दिया है कि यह हदीष इन दो वजह से ज़ईफ है👇

1 इमाम तिर्मीज़ी कहते है कि इमाम बुखारी (जो इमाम तिर्मीज़ी के उस्ताद है वो) इस हदीष को ज़ईफ कहते है।

2 इसकी सनद मे दो जगह इंकता है पहला तबे ताबई यहया बिन कसीर की मुलाकात ताबई उरवा से सबित नहीं जो हजरत आयशा रदीयल्लाहु अन्हा के भांजे है दूसरी हज्जाज बिन अरताह की मुलाकात तबे ताबई यहया बिन कसीर से साबित नहीं है लिहाजा यह रिवायत मुंकते है।यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि उसूले मुहद्दीसीन में “मुंकते” हदीस की शदीद जरह होती है लिहाजा इस हदीष में थोड़ा नहीं बल्कि बहुत ज्यादा जौअफ है।

3 हज्जाज बिन अरताह और यहया बिन कसीर दोनों रावी, जम्हूर अईम्मा मुहद्दीषीन के नज़दीक मुदल्लीस है।
📚अल जरह व तअदील-3/273,तारीखुल बगदाद-8/225

नोट: नबी(ﷺ) का बक़ी कब्रस्तान जाने और वहां, अहले कुबूर के लिए अल्लाह से दुआए मग़्फिरत करने का जि़क्र सहीह हदीषों में आया है लेकीन उसमें शबे बारात का बिल्कुल भी जि़क्र नहीं है (देखिए- सहीह मुस्लिम हदीष नंबर-2256(974), सुनन निसाई हदीष नंबर-2036,3973,3974 वगैरह)

हदीस नंबर-2

وَعَنْ عَائِشَةَ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «هَل تدرين مَا هَذِه اللَّيْل؟» يَعْنِي لَيْلَةَ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ قَالَتْ: مَا فِيهَا يَا رَسُولَ اللَّهِ فَقَالَ: «فِيهَا أَنْ يُكْتَبَ كلُّ مَوْلُودٍ مِنْ بَنِي آدَمَ فِي هَذِهِ السَّنَةِ وَفِيهَا أَنْ يُكْتَبَ كُلُّ هَالِكٍ مِنْ بَنِي آدَمَ فِي هَذِهِ السَّنَةِ وَفِيهَا تُرْفَعُ أَعْمَالُهُمْ وَفِيهَا تَنْزِلُ أَرْزَاقُهُمْ» . فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا مِنْ أَحَدٍ يَدْخُلُ الْجَنَّةَ إِلَّا بِرَحْمَةِ اللَّهِ تَعَالَى؟ فَقَالَ: «مَا مِنْ أحد يدْخل الْجنَّة إِلَّا برحمة الله تَعَالَى» . ثَلَاثًا. قُلْتُ: وَلَا أَنْتَ يَا رَسُولَ اللَّهِ؟ فَوَضَعَ يَدَهُ عَلَى هَامَتِهِ فَقَالَ: «وَلَا أَنَا إِلَّا أَنْ يَتَغَمَّدَنِيَ اللَّهُ بِرَحْمَتِهِ» . يَقُولُهَا ثَلَاثَ مَرَّاتٍ. رَوَاهُ الْبَيْهَقِيُّ فِي الدَّعْوَات الْكَبِير

“सैय्यदा आयशा रदीयल्लाहु अन्हा बयान करती है कि आप(ﷺ)ने फरमाया, “आप जानती है कि निस्फ शाअबान की रात क्या वाकेय होता है?” मेंने अर्ज किया, “अल्लाह के रसूल! उसमें क्या वाकेय होता है?” आप(ﷺ)ने फरमाया- “इस साल पैदा होने वाले और इस साल फौत होने वाले हर शख्स का नाम इस रात लिख दिया जाता है इस रात उनके आमाल ऊपर चढ़ते है और इस रात उनका रिज्क़ नाज़िल किया जाता है।”मेंने अर्ज किया -“अल्लाह के रसूल! अल्लाह की रहमत के बगैर कोई भी शख्स जन्नत में नहीं जायेगा?” आप(ﷺ)ने तीन मर्तबा फरमाया-“अल्लाह की रहमत के बगैर कोई जन्नत में नहीं जायेगा” मेंने अर्ज किया- “अल्लाह के रसूल! आप भी नहीं?” आप(ﷺ)ने अपने सर पर हाथ रखकर फरमाया-“मै भी नहीं, जब तक अल्लाह अपनी तरफ से मुझे ढाँप न ले”।
📚शोअबुल ईमान लिल इमाम बैहकी हदीष नंबर-3835,
– मिश्कात शरीफ हदीष नंबर-1305(ज़ईफ़)

🔍 तहक़ीक़ी जायजा़

यह रिवायत इन वजह से ज़ईफ़ और मुंकते है👇

1 इसकी सनद में इब्ने हारीस है जिनकी सैय्यदा आयशा रदीयल्लाहु अन्हा से मुलाकात साबित नहीं है लिहाजा यह रिवायत मुंकते है।

2 दुसरे तरीक में इब्ने कसीर अल अबदी जईफ रावी है।

3 यह हदीष कुरआन की सुरह दुखान की आयत नं-4 से टकराती है क्योंकि उनमें अल्लाह तआला ने बिल्कुल वाजेह फरमा दिया है कि हर काम के फैसले शबे क़द्र में किये जाते है।

अब एक मुसलमान का यह काम नहीं कि वह एक ज़ईफ़ हदीस को क़ुरआन के खिलाफ बतौर दलील पेश करे। इमाम इब्ने कसीर रहीमहुल्लाह फरमाते है कि “ऐसी हदीषों से कुरआनी दलीलो का मुकाबला नहीं किया जा सकता” (देखिए तफ्सीर इब्ने कसीर सुरह दुखान आयत नंबर -4 की तफ़्सीर में)

हदीस नंबर-3

وَعَنْ أَبِي مُوسَى الْأَشْعَرِيِّ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «إِنَّ اللَّهَ تَعَالَى لَيَطَّلِعُ فِي لَيْلَةِ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ فَيَغْفِرُ لِجَمِيعِ خَلْقِهِ إِلَّا لِمُشْرِكٍ أَوْ مُشَاحِنٍ» . رَوَاهُ ابْن مَاجَه

“सैय्यदना अबु मुसा अशअरी रदीयल्लाहु अन्हु रिवायत करते है कि रसूलुल्लाह(ﷺ) ने फरमाया -“अल्लाह तआला निस्फ शाअबान की रात अपने बंदो पर खुसुसी तौर पर मुतवज्जह होते हैं और मुशरीक और कीना रखने वालों के सिवा अपनी तमाम मख्लूक को बख्श देते है”
📚सुनन इब्ने माजा हदीष नंबर-1390,
– शोअबुल ईमान-2/21,
– हिलयतुल औलिया-5/191,
– मुअज़्ज़मुल कबीर लित् तिब्रानी-20/109,
– मिश्कात शरीफ हदीष नंबर-1306(ज़ईफ़)

🔍तहक़ीक़ी ज़ायजा

ये हदीस दो सनदों से मरवी है और इन वजहों से ज़ईफ़ है

1 पहली सनद में इब्ने लहिया ज़ईफ़ रावी है
📚अल जरह व तअदील-5/672, मिज़ानुल ऐतदाल-2/475,तक़रीबुत् तहज़ीब-1/444

2 ज़ुबैर बिन मुस्लिम, अब्दुर्रहमान और जह्हाक बिन ऐमन मजहूल(लापता) रावी है।
📚तक़रीबुत् तहज़ीब-1996,3950,2965

3 वलीद बिन मुस्लिम मुदल्लीस है अन से रिवायत करते है और समाअ की तसरीह मौजूद नहीं है।
नोट याद रहे कि मुदल्लीस रावी की अन वाली रिवायत समाआ की तसरीह किये बगैर फिक्ह हंनफी के दोनों तक़लीदी गिरोह(देवबंदी और बरेलवी)के नज़दीक भी नाकाबिले कुबूल होती है।चुनाँचे सरफराज खान सफदर देवबंदी लिखते है कि “मुदल्लीस रावी अन से रिवायत करे तो वो हुज्जत नहीं यह कि वो तहदीस करे या इसका कोई सका मताबेह हो”(खजाईने सुनन जिल्द-1सफ़ा-1)
इसी तरह अहमद रजा खान साहब बरेलवी कहते है कि “और मुदल्लीस जमहूर मुहद्दीसीन के मजहब से मरदूद न मुसनद (फतावा रिज्वीया-5/266)

लिहाजा यह हदीष अहमद रजा खान साहब बरेलवो के नज़दीक भी ज़ईफ़ है।

हदीस नंबर-4

وَعَنْ عَلِيٍّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: إِذَا كَانَتْ لَيْلَةُ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ فَقُومُوا لَيْلَهَا وَصُومُوا يَوْمَهَا فَإِنَّ اللَّهَ تَعَالَى يَنْزِلُ فِيهَا لِغُرُوبِ الشَّمْسِ إِلَى السَّمَاءِ الدُّنْيَا فَيَقُولُ: أَلَا مِنْ مُسْتَغْفِرٍ فَأَغْفِرَ لَهُ؟ أَلَا مُسْتَرْزِقٌ فَأَرْزُقَهُ؟ أَلَا مُبْتَلًى فَأُعَافِيَهُ؟ أَلَا كَذَا أَلَا كَذَا حَتَّى يطلع الْفجْر . رَوَاهُ ابْن مَاجَه

“सैय्यदना अली रदीयल्लाहु अन्हु फरमाते है कि रसूलुल्लाह(ﷺ)ने फरमाया- “जब निस्फ शाअबान की रात हो तो तुम उस रात क़याम करो और उस दिन का रोज़ा रखो क्योंकि इस रात सूरज गुरूब होते ही अल्लाह तआला आसमाने दुनिया पर नुज़ूल फरमाकर पुछता है “सुन लो! कोई मग़्फिरत का तलबगार है ताकि मैं उसे बख्श दुँ सुन लो!कोई रिज्क़ का तलबगार है ताकि मैं उसे रिज्क़ अता फरमाउँ सुन लो!कोई आफियत चाहता है ताकि मैं उसे आफियत अता फरमाउँ सुन लो इन चीज़ों का कोई तलबगार है?” यह सिलसिला फज्र तक जारी रहता है।”

📚सुनन इब्ने माजा हदीष नंबर-1388,
– शोअबुल ईमान-3836,
– अल मौजूआतुल कबीर ला इब्ने जौजी-2/127,
– मज्मुअ ज़वाईद-10/113
– मिश्कात शरीफ हदीष नंबर-1308(मौज़ूअ)

🔍तहक़ीक़ी जा़यजा

यह रिवायत इन वजह से मौज़ूअ यानी गढी हुई के दर्जे में आती है👇
1 इसकी सनद में इब्ने अबी सबुरा है जिसके बारे में हाफिज़ इब्ने हज़र अस्कलानी रहीमहुल्लाह कहते है कि उलेमा ज़िरह व तअदील ने इसको रिवायते गढ़ने वाला कहा है
📚तक़रीबुत् तहजी़ब-1/410

2 इमाम बुखारी और अल्लामा ज़हबी रहीमहुल्लाह ने ज़ईफ़ कहा है
📚मिजानुल एतदाल-4/510

3 इमाम नव्वी रहीमहुल्लाह ने ज़ईफ़ कहा है
📚खुलासतुल अहकाम-1/617

4 इमाम अहमद बिन हंबल और इमाम यह्या इब्ने मुईन रहीमहुल्लाह ने इसे हदीषें गढ़ने वाला कहा है।
📚अल जरह व तअदील-7/306

लिहाजा यह रिवायत मंघड़त है और इस तरह की रिवायत को सही समझना गोया आप(ﷺ) पर झूठ बाँधना है। अब अगर कोई इस तरह की रिवायत को दलील बनाता है तो वो अपना अंजाम भी देख ले –
“रसूलुल्लाह(ﷺ)ने फरमाया- जिसने जानबूझकर मुझ पर झूठ बाँधा वह अपना ठिकाना जहन्नुम में बना ले।
📚(मुत्तफकुन अलैह)सहीह बुखारी हदीष-110,सहीह मुस्लिम (मुकदमा) हदीष-4

नोट- अल्लाह तआला का “रात के आखिरी पहर से फज्र तक पहले आसमान पर(अपनी शान के मुताबिक़) नुज़ूल फ़रमाना और ऐलान करना” यह हर रात में होता है-

दलील:

“रसूलुल्लाह(ﷺ)ने फरमाया-हमारा रब बुलंद, बरकत वाला है, हर रात उस वक्त आसमाने दुनिया पर नुज़ूल फ़रमाते है जब रात का आखिरी तिहाई हिस्सा रह जाता है, (अल्लाह अपने बंदो से) पुछता है! कोई मुझसे दुआ करने वाला है कि मैं उसकी दुआ क़ुबूल करूँ, कोई मुझसे माँगने वाला है कि उसे मैं अता करूँ, कोई मग़्फिरत तलब करने वाला है कि मैं उसकी मग़्फिरत करूँ”
मुस्लिम शरीफ की रिवायत में इतना ईजाफ़ा है कि- “यह सिलसिला चलता रहता है यहाँ तक कि फज़र की रौशनी हो जाती है”
📚सहीह बुखारी हदीष-1145,
– सहीह मुस्लिम हदीष-758

इस सहीह हदीस से मालूम होता है कि अल्लाह की तरफ़ से यह ऐलान हर रात में होता है (अलहम्दुल्लिलाह) लेकिन इसको सिर्फ़ शबे बराअत की रात के साथ खास कर देना गोया साल की बाकि तमाम रातों से लोगों को महरूम करने की कोशिश है।

इन हदीसों के अलावा शबे बअरात की फज़िलत , इस रात की खास नमाज़े और इस दिन के रोज़े के बारे में बहुत सारी रिवायते पेश की जाती उनमें अक्सर मंघड़त और झूठी होती है। अलबत्ता जो शख्स अय्यामें बैज यानी हर महीने के तीन रोजे रखता हो उसके तहत शाअबान में भी 13,14,15 तारीख के रोज़े रख ले तो इसमें कोई हर्ज नहीं इसलिए की यह अमल सुन्नत से साबित है-

दलील

“रसूलुल्लाह(ﷺ) ने फरमाया हर महीने के तीन रोजे बेहतरीन रोजे है”
📚सुनन निसाई हदीष-2413(सहीह)

लेकीन खास शबे बराअत का रोज़ा सुन्नत समझकर सवाब की नियत से रखना बिद्अत है।

हज़रत अल्लामा मुबारकपुरी रहीमहुल्लाह फरमाते कि 15 शाअबान के रोज़े के बारे में कोई मरफ़ूअ ,सही,हसन हदीष या ऐसी ज़ईफ़ हदीस जिसका ज़ौअफ मामूली हो,मरवी नहीं है. (मिरआत अल मफातीह-4/344)

♦ इल्जामी जवाब

इसलिए मेरे मोहतरम भाईयो जिद् छोड़े और लौट आये कुरआन और सहीह हदीस की तरफ।

🤲आखिर में अल्लाह तआला से दुआ है कि वह ज़ईफ़ और झूठी हदीसो की बुनियाद पर बिद्अती अमल से करने से हम सबकी हिफाज़त फरमाये और सहीह हदीषों की बुनियाद पर नबी(ﷺ)की प्यारी सुन्नतों पर अमल की तौफीक़ अता फरमाये आमीन
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नोट 👇
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📜 लिखने वाला
🤲तालिबे दुआ
👤आपका दीनी भाई
अब्दुल अज़ीज़ (गुवाहाटी)

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