सिरतून नबी (ﷺ) सीरीज | Part 14

सिरतून नबी (ﷺ) सीरीज | Part 14

Seerat un Nabi (ﷺ) Series: Part 14

दिल दहला देने वाला जुल्म

कुफ्फ़ारे कुरैश ने जो अहदनामा तैयार कर के काबे के दरवाजे पर लटकाया था, उस में बातें तो बहुत कुछ लिखी थीं, लेकिन जिक्र करने लायक कुछ ही बातें थीं। एक तो यह कि जब तक मुसलमान इस्लाम से फिरें नहीं और बुतपरस्ती न अपनाएं, बाईकाट बराबर जारी रहेगा। 

दूसरे जो लोग हुजूर (ﷺ) के पास रहेंगे या उन का साथ देंगे, जैसे अबू तालिब वगैरह, उन का भी बाईकाट बराबर जारी रहेगा। कबीला बनु हाशिम से, अबू लहब को छोड़ कर, मेल-जोल, शादी-ब्याह और लेन-देन वगैरह सब उस वक्त तक बन्द रहेंगे, जब तक अबू तालिब मुहम्मद (ﷺ) का साथ न छोड़ दें। ये और इसी किस्म के बहुत से कायदे उस में दर्ज थे।

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काबे के दरवाजे पर अहदनामा लटकाये जाने से तमाम कबीलों ने उस अहदनामे का एहतिराम करना शुरू कर दिया। इस बाईकाट की बुनियाद पर आम ख्याल यही पाया जाने लगा कि अब मुसलमानों के दिमाग ठीक हो जाएंगे, वे टूटेंगे, इस्लाम छोड़ देंगे, इसलिए फ़ित्ना हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। 

दुनिया की तारीख में इस किस्म के बाईकाट की मिसाल इससे पहले नहीं मिलती कि खुद वतन वालों ने किसी गिरोह के लिए ज़बरदस्त बाईकाट किया हो कि लोग दाने-दाने को मुहताज हो जाएं।

दर्रा अगरचे लम्बा-चौड़ा न था, पर इस में दिलचस्पी का कोई सामान न था, न ज़रूरत न जिंदगी की कोई चीज़ पैदा होती थी। मुसलमान निहायत तंगी से मजबूरी की हालत में अपनी जिंदगी के दिन काट रहे थे, चूंकि खाने-पीने का सामान काफ़ी था, यह मालूम न था कि बाईकाट कब तक रहेगा, इसलिए खाने-पीने में बड़ी एहतियात करते थे।

मुसलमानों के साथ बच्चे भी थे, औरतें, बूढ़े और जवान भी थे। नवजवान तो भूख और प्यास बर्दाश्त कर सकते थे, पर बूढ़े और बच्चे न कर सकते थे। मजबूरी सब कुछ करा देती है। बेचारे बर्दाश्त कर रहे थे। या बर्दाश्त करने की

आदत डाल रहे थे। 

सन् ०७ नबवी के मुहर्रम के महीने से यह बाईकाट शुरू हुआ था। अब जिलहिज्जा आ गया था, गोयां पूरा एक साल बाईकाट जारी रहा।

मूसलमान भूख और प्यास की शिद्दत से निढाल और बे-हाल हो रहे थे। जो सामान ले आये थे, वह खत्म हो गये थे और सामान कौन लाता और किस तरह से लाता। मजबूरी से मुसलमान पेड़ के पत्ते खा कर दिन काट रहे थे कि जिलहिज्जा के महीने में हज होता है। 

हज के दिनों में हर आदमी पर से पाबन्दियां उठा दी जाती थीं, इसलिए मुसलमानों पर से पाबन्दियां उठा ली गयीं। घेराव उठा लिया गया। मुसलमान दर्रे से बाहर निकले इस हाल में कि तन पर फटे-पुराने कपड़े थे, भूख से कमजोर और निढाल थे, चलते हुए लड़खड़ाते थे। जालिम से जालिम आदमी भी इस हालत को देखकर रहम खा सकता था, मगर कुफ्फारे मक्का के दिल में रहम नाम की कोई चीज जैसे बाक़ी न रह गयी हो। वे जरा भी न पसीजे।

मुसलमानों ने सबसे पहले खानाकाबा में जाकर नमाज पढ़ी। तवाफ़ किया, हज से फ़ारिग हो कर बाजारों में खरीद व फरोख्त के लिए गये।

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अबू जहल साथ गया। बावजूदे कि आज हज का दिन था, कोई मनाही न थी, लेकिन वह आज भी लोगों को मुसलमानों के हाथ चीजें बेचने से मना कर रहा था।

तमाम कुफ्फार अबू जहल की तरह जालिम न थे, ज्यादातर लोगों ने मुसलमानों की हालत पर रहम खा कर उन के हाथ सामान बेचा। 

शाम तक मुसलमान जितना सामान ले सकते थे ले आए और इस के बाद फिर दर्रे में चले गए और पाबन्दी लग गयी। जब तक मुसलमानों के पास खाने-पीने का सामान रहा, एहतियात से थोड़ा-थोड़ा खाते रहे, पर जब खाने-पीने का सामान खत्म होने लगा, तो फिर फ़ाकों की नौबत आ गयी। 

मुसलमान खुद कम खाते, बच्चों को अच्छी तरह खिलाते, मगर अच्छी तरह क्या खिलाते, सिर्फ एक वक्त थोड़ा सा सत्तू घोल कर पिलाते थे। रात और दिन में सत्तू के कुछ घूंट का सहारा लेते, कुछ ही घंटों बाद फिर भूख लग जाती। खाने के लिए बच्चे चिल्लाते, जिद करते, रोते लेकिन खाना कहां था जो दिया जाता। उन्हें बहलाया जाता  सुबह कहते कि शाम को खाना मिलेगा, बच्चे शाम के इन्तिजार में चुप हो जाते, मगर जब शाम हो जाती, खाना न मिलता, भूख ज्यादा लगती तो फिर रो कर खाना मांगते थे। उन के रोने से हर मुसलमान का दिल मुतास्सिर होता था, मगर कर क्या सकते थे ? खाना कहां से लाते ? कैसे उन को खिलाते ? तमाम बच्चे सूख कर कांटा हो गये थे।

कुरैश की जालिमाना पाबन्दी से मुसलमानों की जिंदगी अजीरन हो गयी थी। वे हुजूर (ﷺ) से लड़ाई की इजाजत मांगते थे और आप इजाजब न देते थे। बगैर हुजूर (ﷺ) की इजाजत के वे काम न करते थे। सब्र व इस्तिकलाल से वे सख्तियां बर्दाश्त कर रहे थे।

सन् ०८ नबवी का साल सख्त गुजरा, फिर हज का जमाना आया और मुसलमानों के ऊपर से निगरानी उठा ली गयी। मुसलमान दर्रे से बाहर आए। इस बार वे ज्यादा कमजोर और निढाल थे।

कुफ्फारे मक्का ने उन की यह हातल देखी, तो वे हंसे और उन में से अक्सर लोगों ने कहा, मुसलमानो! क्यों इतनी सख्तियां बर्दाश्त कर रहे हो? यह क्या जिंदगी है? न खाने को रोटी है, न पहनने को कपड़ा, अफ़सोस है ऐसी जिंदगी पर। तुम हमारे भाई हो हम को तुम्हारी हालत देख कर अफ़सोस होता है। मुहम्मद (ﷺ) का साथ छोड़ दो। अपने बाप-दादा का मजहब अपना लो। तुम्हारे लिए जिंदगी की जरूरतें पूरी कर दी जाएंगी।

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मुसलमानों ने जवाब दिया, हम ने खुदा को पा लिया है, उस का मजहब अपनाया है। तुम हम पर चाहे जितना जुल्म करो, खाना न दो, पानी न दो, जब तक जी चाहे, बाईकाट किये रहो, हम इस्लाम का रास्ता न छोड़ेंगे।

कुफ्फारे मक्का को यह जवाब बहुत नागवार गुजरा और उन्होंने कहा, अगर तुम मरना ही चाहते हो, तो सिसक-सिसक कर मरो, हम कर ही क्या सकते हैं ?

मुसलमानों ने हज किया। हज से फ़ारिग़ होने के बाद बाजार से कुछ सामान वगैरह खरीदा और फिर वह दर्रे में चले आए, फिर पहरा कायम कर दिया गया।

इस बार पिछले वर्षों के मुकाबले में ज्यादा सख्ती की गयी। दिन गुजरने लगे। सन् ०९ नबवी शुरू हो गया। यह साल मुसलमानों पर बहुत सख्त गुजरा। 

खाने-पीने को सामान बहुत जल्द खत्म हो गया और फ़ाकों पर नौबत आ पहुंची। मर्द और औरतें तो फ़ाक़ा करते-करते घास और पेड़ों के पत्ते और छाल वगैरह जो मिल गयी थी, खा लेते थे, पर बच्चे ये चीजें न खाते थे, वे रोते थे, सत्तू के एक घूट के लिए खजूर के एक दाने के लिए तरसते थे। 

भूख से बेताब हो कर बेहोश हो जाते थे। उन्हें मौत से करीब और जिन्दगी से दूर देख कर मां-बाप के कलेजे मुंह को आते थे, पर सब्र की सिल सीने पर रख कर खुदा की रहमत का इंतिजार कर रहे थे। 

मुसलमानों ने अपने चमड़े के मोजों को पानी में भिगो कर नर्म किया फिर भून कर कर बच्चों को खिला दिया, यहां तक कि चमड़े के मोजे भी खत्म हो गये, और बच्चे भूख से बेताब हो गये, लेकिन मुसलमान बेचारे करते भी तो क्या करते।

अकील उम्र में सबसे छोटा बच्चा था। भूख ने उस को इतना कमजोर कर दिया था कि उठ न सकता था। हर वक्त पत्थर की चट्टान पर पड़ा रहता था। मां-बाप और उस की इस हालत को देखते, लेकिन वे करते ही क्या।

अकील पर ग़फ़लत तारी हो गयी। मां का कलेजा प्यारे बेटे को गाफ़िल देख कर टुकड़े-टुकड़े हुआ जा रहा था। अक़ील बीमार न था, बल्कि भूख की ज्यादती ने उसे मौत के किनारे पहुंचा दिया था।

अकील ने आंख खोली, हसरत भरी नजरों से मां को देखा। मां तड़प गयी। उस ने अपने जिगर के टुकड़े को गोद में ले कर सीने से लगाया, मुंह चूमा और बोली, बेटा अकील ! क्या तुम मुझे दगा दे जाओगे ? 

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ऐ अल्लाह ! मेरे बच्चे को बचा ले, आह, मेरा बच्चा भूख से दम तोड़ रहा है। लोगो! मैं कैसे जब्त करूं? दर्दमन्द मां ने यह कहते ही बे-अख्तियार रोना शुरू कर दिया। जो लोग उसके पास बैठे थे, उन के भी आंसू जारी हो गये।

अकील ने अपनी मां के गले में बांहें डाल कर निहायत कमजोर आवाज़ में कहा, मां… “भूख”….”रोटी”

अक़ील बेहोश हो गया। मां के भी आंसू जारी हो गये। उस ने सिसकियां भरते हुए कहा, आह, क्या चीज़ खाने को दूँ? हाय मेरे बच्चे ! कैसे मैं तुझे बचाऊं ? अल्लाह ! रहम कर मेरे बच्चे पर, मैं अपने बच्चे को भूख से तड़प-तड़प कर मरते हुए कैसे देखू ?

पास ही अकील का बाप भी बच्चो की हालत देख कर रो रहा था।

अकील की हालत बद से बदतर हो गयी, आंखें बन्द होने लगीं। माँ-बाप तड़प गये यह देख कर कि अकील का आखिरी वक्त आ गया है। मां जब्त न कर सकी, अपना सर पत्थर पर दे मारा, खुन का दरिया बह निकला। दूसरी औरतों ने लपककर उसे संभाला। अकील का बाप अपनी बीवी की हालत पर जब्त न कर सक। फूट-फूट कर रोने लगा।

तमाम औरतों और बच्चों पर इस का बेहद असर हुआ। सब जोर जोर से रोने लगे। रोने की आवाज दर्रे में गुंज कर बाहर निकली। संगदिल पहरेदार रोने की आवाज सुन कर खुश हो गये। उन्होंने कहा, अब ये लोग मरने लगे हैं, यक़ीनन कोई मर गया है, जो ये लोग रो रहे हैं। यकीन है कि अब ये सब बाप-दादा के मजहब में आ जाएंगे या भूख प्यास से मर जाएंगे। अकील और उस की मां की हालत चिन्ता में डालने वाली बनती जा रही थी। 

यह हाल देख देखकर अबू तालिब से रहा न गया। वह उठ कर हुजूर (ﷺ) के पास पहुंचे। 

हुजूर (ﷺ) सज्दे में पड़े हुए थे। कुछ देर बाद जब आप (ﷺ) ने सज्दे से सर उठाया, तो अबू तालिब ने कहा, मेरे प्यारे भतीजे ! अब हालात बहुत खराब हो गये हैं, सब्र का दामन हाथ से छूटने वाला है। बच्चे भूख के मरने वाले हैं। मैं कुरैश से जा कर रहम की दरख्वास्त करता हूं। 

आप (ﷺ) ने फरमाया, चचा ! मुझे अल्लाह ने खबर दी है कि जो जालिमाना अहदनामा लिखवाया गया था, उसे कीड़े ने खा लिया है। जिस जगह अल्लाह का नाम लिखा है, वही बचा है। थोड़ा और रुक जाइये, अल्लाह यकीनन मदद करेगा।

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अबू तालिब ने कहा, अच्छा! और मैं थोड़ी देर इन्तिजार करूंगा। 

हुजूर (ﷺ) ने फरमाया, आओ, अकील को देखें। मैं ने उस के लिए दुआ की है। दोनों उठ कर चले। जब वे अकील के पास पहंचे, तो वह गफलत में था। हुजूर (ﷺ) बैठ गये। आप ने उसे अपनी गोद में उठा लिया। ठीक उसी वक्त हजरत खदीजा (र.अ) एक हाथ में कुछ दूध और दूसरे हाथ में कुछ खाना लिए हुए आयीं। उन्हों ने फ़रमाया, मेरे भतीजे हकीम ने यह सामान मेरे लिए भेजा है। यह थोड़ा-थोड़ा कर के सब बच्चों को खिला दो।

हुजूर (ﷺ) ने दूध लेकर अकील के हलक में टपकाया। कुछ ही देर बाद उस ने आंखें खोलीं। हुजुर (ﷺ) ने प्याला उस के होंठों से लगा दिया। उस ने बड़ी बे-सब्री से दूध पियां और कुछ ही घूंट में तमाम प्याला खाली कर दिया।

अबू तालिब ने हजरत खदीजा (र.अ) का खाना तमाम बच्चों में बांट दिया।

अक़ील की हालत सुधर गयी। मां-बाप की जान में जान आयी। तमाम मुसलमान बहुत खुश हुए। अब हुजूर (ﷺ) ने अबू तालिब से कहा कि आज बाईकाट खत्म हो जाएगा।

अबू तालिब उठ कर रवाना हुए।

दर्रे से रिहाई

जिस वक्त अकील की हालत बहुत ज्यादा खराब हो गयी थी, मां-बाप और दूसरे मुसलमानों ने ऊंची आवाज से रोना शुरू कर दिया था और उन के रोने की आवाज से संगदिल पहरेदारों को खुशी हुई थी, वे समझे थे कि अब मुसलमान भूख-प्यास से मरने लगे हैं, उसी वक्त हिशाम महजूमी दर्रे के करीब से गुजर रहा था। उस ने भी मुसलमानों के रोने की आवाज सुनी थी। हिंशाम महजूमी एक रहमदिल इंसान था। उसे मुसलमान और हाशिम कबीले पर किये गये जुल्म पसन्द न थे। उस ने पहरे दारों से पूछा कि यह दर्रे से रोने की कैसी आवाज आ रही है?

एक पहरेदार ने हंस कर कहा, इन बेवकूफों के पास गल्ला खत्म हो गया है। शायद कोई बच्चा भूख से तंग आ कर मर गया है। 

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हिशाम को पहरेदार की संगदिली पर गुस्सा आया। उस ने कहा, जालिम वहशी ! तू इस लिए हंस रहा है कि कोई मुसलमान बच्चा भूखा मर रहा है।

वह फ़ौरन लौटा। उस ने इरादा किया कि आज वह काबे के दरवाजे पर जा कर इस जालिमाना अहदनामा को फाड़ डालेगा, जिस ने मुसलमानों का जीना दुश्वार कर दिया है।

लेकिन यह काम आसान न था। अहदनामे को फाड़ डालने का मतलब था तमाम कबीलों से लड़ाई मोल लेना। इस के बाद वह अपनी नर्मी की वजह से मुसलमानों पर किये जा रहे जुल्म को बरदाश्त न कर सका, वह अहदनामा को फाड़ कर तमाम कबीलों से मुकाबला करने पर तैयार हो गया।

हिशाम तेजी से खाना काबा की तरफ रवाना हुआ। अभी वह थोड़ी दूर ही गया था कि जुबैर बिन उम्मया सामने से नजर आया।

जुबैर अब्दुल मुत्तलिब का नाती था। हिशाम ने उसे रोकते हुए कहा जुबैर ! क्या यह इंसाफ़ है कि तुम खाओ-पियो और हर किस्म के लुत्फ उठाओ और तुम्हारे नाना और तुम्हारे खानदान वालों और मुसलमानों के छोटे-छोटे बच्चों को एक-एक दाना नसीब न हो और वे भूख से एड़ियां रगड़-रगड़ कर मर जाएं।

हिशाम ! तुम नहीं जानते हो मेरे दिल पर कुरैश के जालिमाना कैद व बन्द और मजलूम मुसलमानों की मुसीबतों का गहरा असर पड़ता है। बार-बार मेरे दिल में आया कि इस जालिमाना अदनामा को फाड़ कर फेंक दूं, जिस से मुसलमानों पर जुल्म हो रहा है, लेकिन मुझे इल्म है कि अदनामा के चाक करते ही तमाम कबीले मुझ पर टूट पड़ेगे और मेरा कबीला तमाम कबीलों का मुकाबला न कर पायेगा, इसलिए खामोश हूँ। अगर तूम मेरा साथ दो, तो मैं अभी अहदनामा फाड़ दूँ। जुबैर ने कहा। 

सुनो जुबैर ! हिशाम बोला, मैं इस वक्त शोबे अबी तालिब से आ रहा हूं। मुसलमान रो रहे हैं, शायद उन का कोई बच्चा भूखा मर रहा है। मुझ से यह बात देखी नहीं जाती, मैं तुम्हारे साथ हूं। आओ, हम दोनों मिल कर अहदनामा फाड़ दें।

चलो, जुबैर ने कहा। दोनों चले। जब बाजार के कोने पर पहुंचे, तो उन को मुत-अम बिन अदी और अबुल बस्तरी मिले। मुत-अम ने पूछा, कहां जा रहे हो ? जुबैर और हिशाम तुम दुखी क्यों दिखाई दे रहे हो?

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हिशाम ने बताया, मुसलमानों के बच्चे भूख से बिलक-बिलक कर रो रहे हैं और जान दे रहे हैं। फाक़ा के मारे हुए मां-बाप अपनी औलाद को मौत के मुंह में देख कर खून के आंसू रो रहे हैं। अबुल बख्तरी ! क्या तुम अपने बच्चों को फाका कर के मरता हआ देख सकते हो ?

नहीं, नहीं देख सकते ! 

क्या हम इतनी सख्तियां बरदाश्त कर सकते हैं, जितनी तीन साल की मुद्दत में मासूम मुसलमानों ने बरदाश्त की ? हिशाम ने पूछा।

कभी नहीं कर सकते। अबुल बस्तरी ने जवाब दिया। मुसलमानों पर जुल्म व सितम की इंतिहा हो चुकी है। हिशाम ! क्या हम इंसान नहीं, जानवर हैं, वहशी जानवर?

नहीं, हम इंसान हैं, मुहक्जब इंसान!

फिर यह कहां की इंसानियत है कि हम अपने कबीले वालों को भूखा मार दें। आखिर मुसलमान भी तो इंसान ही हैं। साल भर से तंग दर्रे में पड़े मुसीबतों को झेल रहे हैं। अब हमें उन का बाईकाट खत्म कर देना चाहिए।

बेशक हमें इंसानियत को शर्म दिलाने वाले इस अहदनामे को फाड़ डालना चाहिए अबुल बस्तरी ने कहा।

हिशाम खुश हो गया और उस ने कहा, आओ, अब हम चार हो जाएगे। अब जालिम और बेरहम कुरैशियों को हमारे मुकाबले की जुर्रत न हो सकेगी।

बेहतर यह है कि हम हथियारबन्द होकर चलें ताकि क़बीले समझ लें कि हर तरह से हम तैयार हैं, मुतइम ने कहा। 

अगर हम से कोई जरा भी बोलेगा, तो खून की नदियां बह जाएंगी। सब ने इस राय को पसन्द किया।

सब अपने-अपने घरों की ओर चले गये और थोड़ी ही देर में हथियार बंद हो कर आ गये। जब वह खाना काबा के करीब पहुंचे, तो जमआ बिन अस्वद हथियार लगाये नेजा हाथ में लिए खड़े थे। 

जमआ ने उन लोगों को दूर से देखते ही कहा, अपने माबूदों की कसम ! मैं तुम चारों में से किसी से नहीं डरता। क्या तुम इसलिए हथियारबंद होकर आ रहे हो कि मैं इस जालिमाना अहदनामाँ को चाक न कर सकू, जिस ने गरीब मजलूम मुसलमानों पर जुल्म व सितम के पहाड़ तोड़ रहे हैं। वहशी इंसानो ! आज, मैं इस अदनामा को चाक किये बगैर न रह सकूँगा। 

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पहुंचने पर जुबेर ने कहा, जमआ हम इस इरादे से आए हैं, मुसलमानों की तीन साल की सख्तियों ने हमें उन की मदद पर तैयार किया है।

जमआ ने खुश हो कर कहा, तब तो आओ, हम सब मिलकर इस नेक काम को अंजाम दें। चुनांचे ये सब खाना काबा की तरफ रवाना हुए। 

मज्लूम और सताये हुए मुसलमानों के हमदर्द जब खाना काबा में पहुंचे, तो उन्हों ने देखा कि बहुत से बुतपरस्त अपने खुदाओं के सामने सज्दे में पड़े हैं, उन में अबू जहल, अबू सुफ़ियान, उत्बा, वाइल सहमी वगैरह सभी मौजूद थे। 

इन लोगों ने पहले खाना काबा का तवाफ़ किया, फिर एक जगह खड़े हो गये। चूंकि ये लोग कुफ्फ़ार से डरते थे, इसलिए किसी को पहले बोलने की हिम्मत न हुई। देर तक मश्विरा करते रहे कि शुरूआत कैसे करें।

जुबैर ने कहा, शुरूआत में करता हूं, तुम मेरा साथ देना। सब ने इस बात का इकरार किया।

जुबैर ने ऊंची आवाज में कहा, ऐ मक्का वालो! यह कौन सी इंसानियत व शराफ़त है कि हम, हमारे गुलाम, हमारे जानवर पेट भर कर खाएं और बनू हाशिम के गरीब मुसलमानों और उन के मासूम बच्चों को खाना-पीना नसीब न हो। यह ऐसा जुल्म है जो किसी कौम ने अपने वतनी भाइयों पर न किया होगा। होशियार हो जाओ। आज मैं इस जालिमाना अहदनामे को चाक करता हूँ। जिस ने हमारी शराफ़त पर दाग लगा दिया है।

अबू जहल घबरा कर उठा, झल्ला कर बोला, खबरदार, जो अहदनामा को हाथ लगाया। जो भी इसे छुएगा उसका सर कलम कर दिया जायेगा।

तब तक जमआ  बोल पड़ा, वह कौन मौत का प्यारा है, जो हमारे सामने आएगा, अगर कोई है, तो हमारे मुकाबले में आए।

अबू सूफ़ियान बढ़ा और उस ने कहा, मैं हूँ। क्या कोई मेरे सामने इस अहदनामे को छूने की जुर्रत कर सकता है।

अबुल बस्तरी ने तलवार खींच कर कहा, अबू सुफ़ियान बकवास बन्द करो, वरना इस तलवार की धार से जवाब दिया जाएगा। क्या तुम्हारे पत्थर दिल पर अब तक कोई असर नहीं हुआ कि तीन साल से मुसलमान सख्तियां बरदाश्त कर रहे है, जुल्म सह रहे हैं, भूक प्यास बर्दाश कर रहे हैं। अगर तुम को एक समय भी खाना न मिले तो बताओ क्या हालत होगी?

जो लोग हमारे माबूदों के खिलाफ जहर उगलते हैं, हमारे बाप-दादा के धर्म को बुरा कहते हैं, हमारे बुजुर्गों को बेवकूफ़ कहते हैं, उन्हें भूख और प्यांस की तकलीफ़ उठा-उठा कर मरने दो। अबू सूफियान ने कहा।

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सख्तियों की और जुल्म की एक इंतिहा होती है, हिशाम ने कहा, गरीब व मज्लूम बेयार व मददगार मुसलमानों ने बहुत कुछ सितम उठाये, बेहद सख्तियां झेली, लेकिन अब भूख और प्यास से तड़प-तड़प कर मरने के लिए उन्हें शोबे अबी तालिब में नहीं छोड़ा जा सकता। हिशाम ने कहा।

अबू जहल बोल पड़ा, मगर हिशाम ! अहदनामे में लिखा हुआ है कि जब तक मुसलमान अपने बाप-दादा के धर्म में दाखिल न होंगे, बाईकाट बराबर जारी रहेगा और इस अहदनामे पर कौम के तमाम बड़ों के दस्तखत है। 

बेदर्द जालिमों ने धोखे से इस पर दस्तखत कराये हैं। जमाअ ने कहा।

अबू सुफ़ियान को गुस्सा आ गया। बोला, तुम बकवास कर रहे हो। सब ने खूब सोच-समझ कर दस्तखत किये हैं।

हम उस वक्त भी दस्तखत करने को तैयार न थे, जुबैर ने कहा, मगर हम को बताया गया था कि इस से मुसलमानों की तंबीह मक्सूद है, मगर वाकिआत बता रहे हैं कि तुम सब उन को मौत के घाट उतार देना चाहते हो। यह बहुत बड़ा जुल्म और नाइंसाफी है। 

क्या जुबैर ! तुम यह चाहते हो कि अहदनामा की खिलाफवर्जी कर के लड़ाई-झगड़े की आग भड़कायी जाए ? अबू जहल ने सवाल किया। 

जुबैर ने जोश में आकर कहा, अगर तुम न मानोगे, तो ऐसा ही किया जाएगा।

अबू सुफ़ियान गरजा, अगर यह बात है तो क्यों न हम तुम्हारा ही खात्मा कर दें? 

हिशाम भी जोश में भर उठा। उसने घूर कर अबू सुफ़ियान को देखते हुए कहा, तुम्हारा यह फैसला हो गया है, तो तलवार निकालो और मैदान में आ जाओ। 

यह कहते ही हिशाम ने तलवार खिंच ली।

अबू सूफ़ियान की भी तलवार चमक उठी। 

करीब था कि खाना काबा में लड़ाई शुरू हो ही जाए, अबू तालिब आ गये। उन्होंने लड़ने की वजह मालूम की और दोनों के बीच में खड़े हो गये और दोनों को हाथ के इशारे से तलवारें झुका देने के लिए कहा।

दोनों ने तलवारें झुका दीं।

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तुम दोनों बे-फ़ायदा लड़ रहे हो, अबू तालिब ने बताया, मेरे भतीजे ने खबर दी है कि अहदनामा कीड़े ने खा लिया है। अगर वाकई ऐसा है, तो अदनामा की पाबन्दी खुद-ब-खुद खत्म हो जाती है। 

अबू जहल हंसा और उस ने कहा, यह नामुम्किन है। सौ सालो तक भी अहदनामे को कीडे नहीं खा सकते।

अबू जहल ! मैं सिर्फ इसलिए आया हूं कि अगर मेरे भतीजे की इत्तिला सही है, तो अहदनामा की पाबन्दी कुदरती तौर पर खत्म हो गयी, बाईकाट बन्द होना चाहिए। अबू तालिब ने कहा, और अगर यह खबर गलत है, तो आप बाईकाट जारी रखें, मैं शाबे अबी तालिब में रहने पर तैयार हूं।

अबू जहल ने कहा, यह मंजूर है।

बस, अहदनामा उतार लाइए। 

अबू जहल अहदनामा उतारने के लिए आगे बढ़ा। 

लोगों की भीड़ बढ़ गयी ।

अबू जहल जल्दी से अहदनामा ले आया। जब उसने उसे खोल कर देखा, तो हैरान रह गया, यह देख कर कि दीमक उस का एक-एक लफ्ज़ चाट गयी है।

अबू जहल का चेहरा उतर गया। वहां जमा भीड़ भी हैरत में पड़ गयी। कुफ्फ़ारे मक्का के हौसलों पर ओस पड़ गयी।

अबू तालिब को बोलने का मौका मिल मया, अबू जहल! मूहम्मद (ﷺ) ने ठीक ही कहा था, अहदनामे का एक लफ्ज भी बाकी नहीं रहा है, इस लिए वायदे के मुताबिक बाईकाट खत्म हो जाना चाहिए।

अबू जहल झुँझला कर बोला, तुम्हारा भतीजा जादूगर है (नउजुबिल्लाह) और जादू के जोर से उस ने अहदनामा के लफ्ज़ उड़ा दिये हैं। जब तक मुसलमान अपने बाप-दादा के धर्म में वापस न आएंगे, बाईकाट जारी रहेगा। 

अबुल बस्तरी को गुस्सा आ गया, अब जो भी इस जालिमाना अहदनामे का नाम लेगा उस की जबान काट दी जाएगी।

अबू सुफ़ियान भी भड़क उठा, यह तुम कहते हो? 

हिशाम बिगड़ गया, तुम्हारी कौम सही कहती है।

अबू सुफ़ियान बोला, तुम जिद छोड़ दो। अपनी बेजा जिद से तमाग अरब में लड़ाई की आग न भड़काओ।।

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अबू तालिब को दखल देना पड़ा, बोले

ऐ लोगो! सुनो और कान खोल कर सुनो। दबने से एक चींटी भी काट लेती है। हम तो इंसान हैं, फिर कमजोर इंसान नहीं, बल्कि हमारा दिल मजबूत है, बाजू मजबूत हैं, जिंदगी की आखिरी सांस तक लड़ सकते हैं। गनीमत जानो कि मेरा भतीजा मुहम्मद (ﷺ) बेहद नेक है, वह खूरेंजी को पसन्द नहीं करता। तमाम मुसलमानों ने उन से लड़ाई की इजाजत तलब की, मगर उन्हों ने इजाजत नहीं दी। मुसलमान उन के हुक्म की इतनी पाबन्दी करते हैं कि सख्तियां बर्दाश्त कर रहे हैं, बच्चों को भूख से एड़ियां रगड़ते हुए देख रहे हैं, लड़ मरने को जी चाहता है, लेकिन इजाजत न मिलने की वजह से मजबूरन खामोश हैं, मगर अब हालत बर्दाश्त के काबिल नहीं है। मुम्किन है मुहम्मद (ﷺ) लड़ाई की इजाजत दे दें और लड़ाई शुरू हो जाए। इसलिए अब यह मुनासिब है कि पहरा उठा कर बाईकाट बन्द करो और अगर इंकार करते हो, तो लड़ाई के लिए तैयार हो जाओ। मैं यहां से वापस जा कर मुहम्मद (ﷺ) को लड़ाई पर तैयार करूंगा।

तमाम कुफ्फ़ार ने अबू तालिव की बातों को ध्यान से सुना, मश्विरा किया और आखिर में यही तै पाया कि अहदनामा दीमक ने चाट लिया है, तो अब उस को पाबन्दी नहीं की जा सकती। 

चुनांचे फ़ौरन एलान कर दिया गया कि मुसलमानों का बाईकाट खत्म हो गया। 

मुसलमानों ने इस खुशखबरी को सुना तो खुश होकर अल्लाहु अक्बर का नारा लगाया और तीन साल के लम्बे बाईकाट से उन्हें निजात मिली और वे खुशी-खुशी अपने-अपने घरों को लौट आए।

To be continued …

इंशाअल्लाह अगले पार्ट में हम मेराज का तफ्सील में जिक्र करेंगे।
आप हज़रात से इल्तेजा है इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करे और अपनी राय भी दे … 

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