6 रजब | सिर्फ़ 5 मिनट का मदरसा

6 रजब | सिर्फ़ 5 मिनट का मदरसा

6 Rajab | Sirf Panch Minute ka Madarsa

1. इस्लामी तारीख

दौरे फारुकी के अहेम कारनामे

हजरत उमर (र.अ) ने अपने दौरे खिलाफ़त में बड़े बड़े कारनामे अंजाम दिये, उन्होंने बा ज़ाबता तरीके पर बैतुलमाल का निज़ाम कायम किया। मुलकी पैमाइश का इन्तेज़ाम किया, मरदुम शुमारी कराई, जेलखाना कायम किया, फौज के लिये दफ़्तरी निजाम बनाए, रातों को गश्त कर के रिआया के हाल से बा खबर रहने का तरीका निकाला। बेरोज़गार लोगों के लिये वज़ीफे मुकर्रर किये, जगा जगा नहरे खुदवाई। नमाजे तरावीह को जमात के साथ पढ़ने का ऐहतमाम करवाया।

इस्लाम से पहले दरिया ऐ नील हर साल सूख जाता था, मिस्र वालों का अकीदा था, के एक कुंवारी लड़की की बली के बगैर दर्याए नील जारी नहीं होता। जब मुसलमानों ने मिस्र फतह किया और उस की खबर गवर्नर हज़रत अम्र बिन आस (र.अ) को हुई, तो उन्होंने फ़र्माया के इस्लाम में यह हरगिज़ नहीं हो सकता, फिर उन्होंने हज़रत उमर (र.अ) को इसकी इत्तिला दी।

हजरत उमर ने दर्या ए नील के नाम यह खत लिखा:
“ऐ दर्या ए नील अगर तू अपनी मर्जी से चलता है तो मत चल. और अगर तुझे अल्लाह वाहिदे कहहार चलाता हैं तो हम उससे ही सवाल करते हैं के वह तुझे चला दे।”

चुनान्चे यह पर्चा दर्याए नील में डाल दिया गया, दूसरे ही दिन दर्याए नील पानी से भर गया। उस दिन से आज तक दर्याए नील मुसलसल जारी है।

इसके अलावा भी आपकी बहुत सारी खिदमात और कारनामे तारीख के सफहात में महफूज़ हैं।


2. हुजूर (ﷺ) का मुअजिजा

घी में बरकत

उम्मे मालिक (र.अ) का दस्तूर था के वह आप (ﷺ) की खिदमत में हमेशा एक बरतन में घी हदिया भेजा करती थीं, जब उन के बच्चे सालन मांगते और घर में न होता तो वह उस बरतन को जिसमें आपकी खिदमत में घी भेजती थीं, उठा लाती, और उस में से बनने जरूरत घी निकल आता।

एक दिन उन्होंने उस बरतन को बिल्कुल खाली कर लिया, तो घी निकलना खत्म हो गया, फिर आप (ﷺ) की खिदमत में आईं, तो आप (ﷺ) ने फर्माया : अगर तुम ने उस को खाली न किया होता तो हमेशा उस में से घी निकलता रहता।

📕 मुस्लिम: ५९४५, अनजाबिर (र.अ)


3. एक फ़र्ज़ के बारे में

हज की फ़र्जियत

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

“ऐ लोगो ! तुम पर हज फ़र्ज़ कर दिया गया है, लिहाजा उस को अदा करो।”

📕 मुस्लिम: ३२५७, अन अबी हुरैरह (र.अ)


4. एक सुन्नत के बारे में

मजलिस से उठने की दुआ

रसूलुल्लाह (ﷺ) जब किसी मजलिस से उठते तो फ़र्माते:

तर्जमा : ऐ अल्लाह ! तेरी जात पाक है और काबिले तारीफ है मैं गवाही देता हूँ के तेरे सिवा कोई माबूद नहीं तुझ से ही मग़फ़िरत का तलबगार हुँ और तौबा करता हूँ।

📕 अबू दाऊद: ४८५९


5. एक अहेम अमल की फजीलत

मुसलमान भाई के लिए दुआ करना

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

“जब कोई मुसलमान अपने मुसलमान भाई के लिए पीठ पीछे दुआ करता है, तो फरिश्ते कहते हैं के आमीन (अल्लाह तआला) तुम्हें भी यही चीज़ अता फर्मा दे।”

📕 अबू दाऊद ; १५३४, अन अबी दारदा (र.अ)


6. एक गुनाह के बारे में

कुफ्र की सज़ा जहन्नम है

कुरआन में अल्लाह फर्माता है :

“जो लोग कुफ्र करते हैं तो अल्लाह तआला के मुकाबले में उन का माल व औलाद कुछ काम नही आएगा और ऐसे लोग ही जहन्नम के इंघन होंगे।”

📕 सूरह आले इमरान : १०


7. दुनिया के बारे में

दुनिया का सामान चंद रोजा है

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

“दुनिया का सामान कुछ ही दिन रहने वाला है और उस शख्स के लिए आखिरत हर तरह से बेहतर है, जो अल्लाह तआला से डरता हो और (क्रयामत) में तुम पर जर्रा बराबर भी जुल्म नहीं किया जाएगा।”

📕 सूरह निसा: ७०


8. आखिरत के बारे में

जन्नत में पहले जाने वाले

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फर्माया :

“जो लोग सब से पहले जन्नत में जाएंगे, उन के चेहरे चौदहवीं के चाँद की तरह चमकते होंगे, न थूकेंगे, न नाक सिंकेंगे, न पेशाब व पाखाना करेंगे. उन के बरतन और ” कंघे सोने और चाँदी के होंगे, उन की अंगेठियों में से ऊद की खुशबू फूट रही होगी, उन के मुँह से मुश्क की खुशबू आएगी, हर एक को दो ऐसी हूरें मिलेंगी, जिन के पैरों की हड्डीयों का गूदा खूबसूरती की वजह से पिंडलियों के गोश्त से साफ़ नज़र आएगा, और वह दोनों हूरें आपस में ऐसी हम खयाल में होंगी जैसे के दोनों का दिल एक हो, और सुबह व शाम वह अल्लाह की बड़ाई और उस की तारीफ़ करती होंगी।”

📕बुखारी: ३२४५ अन अनी हुरैराह (र.अ)


9. तिब्बे नब्बीसे इलाज

नजरे बद्द का इलाज

हजरत आयशा (र.अ) फर्माती हैं :

“जिस की नजर लगी हो वह वुजू करे फिर उसी पानी से वह शख्स जिस को नजर लगी है गुस्ल करे।”

📕 अबू दाऊद 3880


10. कुरआन की नसीहत

एक दूसरे को हदिया (तोहफा) दिया करो

रसूलल्लाह (ﷺ) ने फर्माया :

एक दूसरे को हदिया दिया करो, हदिया दिलों की रंजिश को दूर करता है और कोई पड़ोसन अपने पड़ोसन के हदिये को हकीर न समझे अगरचे वह बकरी के खुर का एक टुकड़ा ही क्यों न हो।”

📕 तिर्मिज़ी १५०, अन अबी हुरेराह (र.अ)


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