रिसालत – इस्लाम की दूसरी अनिर्वाय आस्था

#इस्लाम_का_परिचय : पार्ट 3

*रिसालत का अर्थ होता है के जब अल्लाह ने पृथ्वी पर मानवो को भेजा तो मानव क्या करे और क्या ना करे , कैसे जीवन व्यक्त करे इसके मार्गदर्शन के लिए इश्वर(अल्लाह) मानवो में से एक मानव को चुन लेता था फिर वो अपनी वाणी उस तक भेजता था और फिर उन्हें मार्गदर्शन बताता के उचित जीवन और मृत्यु के बाद की सफलता के लिए मानवो ने कैसे जीवन व्यत्क्त करना है …

*और ये बाते इश्वर के चुने हुए प्रेषित (messenger) लोगों को बताते थे के तुम्हारा इश्वर तुमसे क्या चाहता है ,..
– और ऐसे कई प्रेषित आये ,.. इनमें से अंतिम प्रेषित मोहम्मद (सलाल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने इसके संधर्भ में अपने वचनों(हदीस) में कहा के –
“इस संसार(विश्व) में इश्वर(अल्लाह) ने १ लाख २४ हज़ार से ज्यादा प्रेषित भेजे और हर समुदाय हर जाती और जहा मानव बसते थे वह ये आते थे और एक सत्य इश्वर अल्लाह का पैगाम लोगो को बताते थे ,..”

*और इसी के संधर्भ में कुरान के एक श्लोक में इश्वर(अल्लाह) केहता है:

के पूरी मानवता एक कुंबा(कबीला) है , और अल्लाह ने उनके अंदर प्रेषित भेजे जो आकर लोगों को शुभ सूचनाये देते अच्छे कर्म करने पर, और भयबित करते बुरे कर्मो पर डराते और चेतावनी देते बुरे कर्मो से रुकने के लिए ..” – (कुरान २:२१३)

*एक और अध्याय में अल्लाह ने कहा –

हमने हर समुदाय जहा भी इंसानियत बस्ती थी वहा नबी और प्रेषित भेजे , वो आकर लोगों को सन्देश देते के सिर्फ एक ही सत्य इश्वर की उपसना करो और उसके अतिरिक्त किसी और की उपासना ना करो” – (कुरान १६:३६)

*और क्यों ना हो ?
– अगर एक इन्सान को माँ-बाप है और वो उन्हें छोड़कर दुसरो को माँ-बाप कहे तो उसके माँ-बाप को बोहोत तकलीफ होती है ना ,..
– तो वैसे ही जिस इश्वर ने बनाया उसको छोड़कर लोग अगर दुसरो की उपासना करे तो उसको भी बुरा लगता है ..
के “मैंने इनका निर्माण किया और ये दुसरो के सामने नतमस्तक होते है”

*इसी तरह एक और अध्याय में इश्वर(अल्लाह) केहता है –

जहा कही मानवता थी वहा इश्वर(अल्लाह) ने मार्गदर्शित बताने वाले संदेष्ठा(प्रेषित, Messenger) भेजे है” – (कुरआन १३:७)

– तो हर जगह जहाँ-जहाँ मानवता रही है वह इश्वर की तरफ से प्रेषित/संदेष्ठा(Messenger) आते थे | और वो लोगों को बताते थे के विश्व के निर्माता उनसे क्या चाहता है ….|

– और ऐसे कई प्रेषित(Messenger) आये ,..
– जो पिछले प्रेषित थे इनका जो सन्देश था वो एक समुदाय और मर्यादित समय के लिए होता था लेकिन इश्वर के अंतिम प्रेषित मोहम्मद(स.) के बारे में कुरआन ये कहता है:
“यह प्रेषित सिर्फ अरबो के या मुसलमानों के ही नहीं बल्कि सारे मानवजाति के लिए मार्गदर्शक है और इनका सन्देश भी सारी मानवजाति के लिए है” .. जिसके संधर्भ में इश्वर(अल्लाह) ने कुरआन में कहा –

हे प्रेषित हमने आपको सारी मानवजाति के लिए रहमत (मार्गदर्शक) बनाकर भेजा है” – (कुरआन २१:१०७)

– तो प्रेषित मोहम्मद (स.) सारी मानवजाति के लिए रेहमत (करुणा/दया/मार्गदर्शक) थे ,.. और वो ऐसी रहमत थे के उन्होंने आकर वो सन्देश जो इश्वर(अल्लाह) का था वो पूरी मानवजाती तक पोहचा दिया ,… अगर ऐसा ना होता तो हमे कैसे पता चलता के इश्वर हमसे क्या चाहता है …. तो वो दया और करुणा थे पूरी मानवजाति के लिए |

*कुरआन के एक अध्याय में अल्लाह केहता है –

हे प्रेषित तुम मानवों से कहदो के – मै तुम सबकी तरफ इश्वर का संदेष्ठा(Messenger) बनाकर भेजा गया हु” – (क़ुराआन ७:१५८)

– तो प्रेषित मोहम्मद (स.) ना ही सिर्फ अरबो के , ना ही सिर्फ मुसलमानों के , और ना ही किसी सिमिति समुदाय के लिए बल्कि पूरी इंसानियत के लिए संदेष्ठा बनाकर भेजे गए है |

*इसी तरहा कुरआन में एक और अध्याय में अल्लाह ने कहा –

“..हमने हे प्रेषित तुमको पूरी मानवजाति को शुभ-सूचना देनेवाला और सावधान करनेवाला बनाकर भेजा किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं..” – (कुरआन ३४:२८)

*अर्थात: हे प्रेषित हमने तुम्हे पूरी मानवजाति के लिए मार्गदर्शक बनाकर भेजा है और तुम अच्छे कर्म करनेवालों को शुभ-सुचना देते हो और बुरे कर्म करनेवालों को सावधान करते हो !
– लेकिन एक अजीब बात है अक्सर मानव तुम्हारे बारे में जानते नहीं के तुम सबके लिए हो ,…
– और कितनी सच बात कही है कुरआन में अल्लाह ने..

*तो प्रेषित मोहम्मद(स.) सारे मानवजाति के लिए आदर्श है | और जब भी कोइ प्रेषित आता तो प्रेषित के साथ इशवानी (इशग्रंथ) आते , और ऐसे कुछ ग्रंथो के नाम कुरआन ने लिए ,..
*जैसे पृथ्वी पर जितने प्रेषित आये उनमे से सिर्फ २५ प्रेषितो के नाम कुरआन में लिए है ,.
जैसे के – आदम! जिनकी हम सब संतान है तो आदमी कहते है हम अपने-आपको ,..
इसी तरह नूह ,. या नोहा जिसको कहते है ,.. इब्राहीम (अब्राहम) , मूसा (मोसेस) , इसा(यशु) और प्रेषित मोहम्मद इन सबपर इश्वर की शांति और कृपा हो ,.. ये भेजे थे | उनके साथ कुछ ग्रंथ भेजे और कुरआन ने ३ ग्रंथो के नाम अपने अलावा अर्थात कुल ४ ग्रंथो के नाम लिए है ,.

१) तौरेत (तौरह) – ये वो ग्रंथ था जो प्रेषित मूसा(अलैहि सलाम) इनपर अवतरण हुआ था ,..
२) जुबुर – ये ग्रंथ प्रेषित दावूद (अलैहि सलाम) पर अवतरण हुआ था जिन्हें डेविड कहते है,..
३) इंजील (बाइबिल) – प्रेषित इसा मसी(अलैहि सलाम) पर अवतरित हुआ था ,..
४) कुरआन – ये ग्रंथ इश्वर के अंतिम संदेष्ठा प्रेषित मोहम्मद (सलाल्लाहो अलैहि वसल्लम) पर इसका अवतरण हुआ था..
– और इसका एक नाम फुरकान भी है , अर्थात कसौटी (Criteria) , फर्क करने वाली किताब ,.. अच्छे और बुरे को अलग करनेवाली किताब है ये ,.

*तो अल्लाह ने इन ४ किताबो के नाम लिए .,.. और जो पहले ग्रंथ(इशवानी) आते थे वो मर्यादित जाती और समुदाय के लिए हुआ करते थे ,.. लेकिन जैसे प्रेषित मोहम्मद (स.) सबके लिए है वैसे ही ये कुरआन भी ऐसा ग्रंथ है जो अंतिम प्रलय तक, जबतक मानवता दुनिया में रहेगी तब तक सबके लिए है ,…
– और ये दुनिया का एक ही ऐसा ग्रंथ है जो कहता है जोर-जोर से – “हे मानवों मै तुम सबके लिए हु”

*जिसके संधर्भ में कुरआन में अल्लाह ने कहा –

रमजान वो पवित्र महिना था जिसमे कुरआन का अवतरण हुआ मानवजाति के मार्गदर्शन के लिए, और इसको फुरकान बनाया (कसौटी बनाया के सच और झूठ को अलग करनेवाली किताब बनाकर)” – (कुरआन २:१८५)
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