सिरतून नबी (ﷺ) सीरीज | Part 6

Series: Seerat un Nabi (ﷺ) | Post 6

Seerat un Nabi (ﷺ) Series: Part 6

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मुसलमानो के खिलाफ मज्लिसे शूरा

जब तक हुजूर सल्ल० तन्हा रहे, उस वक्त तक न तो मक्का के कुफ्फार को कोई चिन्ता हुई और न घबराहट, बल्कि वे हुजूर सल्ल० की बातों का मजाक उड़ाते रहे, समझते रहे कि दो चार दिन तब्लीग़ करने के बाद खुद ही खामोश हो जाएंगे, लेकिन जब सुना कि आप सल्ल० की तब्लीग से बहुत से अरब मुसलमान हो चुके हैं, तो डरे, चिन्ता बढ़ने लगी और हुजूर सल्ल० के खिलाफ़ एक आम जोश पैदा हो गया। 

इस बीच हुजूर सल्ल० पर वह्य नाजिल हुई कि ‘(कह दो ऐ मुहम्मद सल्ल. ! कि) जिन चीजों को तुम पूजते हो, वे दोजख के इंधन होंगे।  

हुजूर सल्ल० ने सब को यह आयत बुलंद आवाज से कह सुनायी,

इस से वे और भड़क उठे और आप पर बेजा गुस्ताखियों की बौछार शुरू कर दी। इतना तंग किया कि हुजूर सल्ल० का घर से निकलना मुश्किल हो गया, लेकिन आप अपनी तब्लीग में बराबर लगे रहे और उस में किसी किस्म की कोई कोताही न की। 

चूंकि मुसलमानों की तायदाद में हर दिन बढ़ोतरी हो रही थी, इसलिए है हुजूर सल्ल० ने जरूरत महसूस की कि कोई ऐसा मकान तज्वीज किया जाये, जिस में दो घड़ी के लिए मुसलमान हर दिन जमा होकर कुरआन शरीफ़ पढ़ें और याद किया करें। चुनांचे अरकम का मकान जो आबादी से एक तरफ़ था, तज्वीज किया गया। 

हुजूर सल्ल० उस मकान पर तश्रीफ़ ले जाते, तमाम मुसलमान भी मक्का के कुफ्फार की नजरों से बच-बचा कर एक-एक दो-दो कर के आ जाते, हजूर सल्ल० के इर्शादात सुनते, नमाज़ पढ़ते, कुरआन शरीफ़ याद करते और खामोशी से अपने-अपने घरों को वापस हो जाते। 

अगरचे यह सब काम खामोशी से हो रहा था, भिर भी कुरेश वालों ने पता लगा ही लिया कि कौन-कौन मुसलमान हो गया है, ये लोग कहां जमा होते हैं और इन की तायदाद क्या है ? इन बातों ने उन्हें और भड़का दिया। भड़कने की एक वजह यह भी थी कि जो लोग मुसलमान हो गये थे, उन में से ज्यादा तर उन के गुलाम थे या उन के गरीब  रिश्तेदार थे।

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इस घबराहट में उन्हों ने तमाम कबीलों के सरदारों को मश्विरे के लिए बुला लिया। मज्लिसे शूरा का इज्लास शुरू हुआ। अबू जहल मीटींग का सरदार बना। अबू लहब ने खड़े हो कर कहा, भाइयो ! आज हम सब इस लिए जमा हुए हैं कि हमारे मजहब को ठेस लगायी जा रही है, हमारे मजहब को बुरा-भला कहा जा रहा है। जिन बुतों को हम और हमारे बाप-दादा पूजते आ रहे हैं, अब उन को जलील किया जा रहा है। अब आप लोग इस की रोक-थाम का उपाय सोचें।

अबू लहब के बाद अबू सुफ़ियान खड़ा हुआ और उस ने कहा, हमारे लिए कितने शर्म की बात है कि हमारे सामने हमारे माबूदों को बुरा-भला कहा जाए और हम चुप-चाप बैठे देखा करें। क्या हम इतने नामर्द, बुजदिल और बे-हिस हो गये हैं कि हमारे माबूदों को जलील किया जाए और हमारा खन न खोले। अगर हमारी बे-हिसी इस हद तक हो गयी, तो हम को जिंदा रहने का हक नहीं है, या तो जोश व गैरत से उठो, अपने बुतों की बुराई करने वालों का खात्मा कर दो या अपने हाथ से अपने गले काट कर मर जाओ। 

अबू सुफ़ियान का ताल्लुक बनू उमैया खानदान से था। बनु उमैया बनु हाशिम के मुकाबले का था। यह उमवी यह कैसे देख सकता था कि एक हाशमी का असर बढ़े। हुजूर सल्ल० हाशमी थे, इस लिए अबू सुफ़ियान ले भड़काने वाली तकरीर कर के लोगों के दिलों को गरमा दिया। हर तरफ़ से आवाजें आने लगीं, हम क्यों मरें! अपने माबूदों को

रुसंवा करने वालों का खात्मा ही क्यों न कर दिया जाए। 

हजरत उमर ने खड़े हो कर कहा, ठहरो सोच-समझ कर बातें करो। क्या तुम यह नहीं जानते कि हमारे माबूदों को झूठा करार देने वाला, बुतपरस्ती की बुराई करने वाला मुहम्मद (सल्ल०) है, जो कबीला बनी हाशिम से है। कबीला बनी हाशिम कुरैश में सब से ज्यादा इज्जतदार क़बीला है।

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तमाम कबीले इस कबीले का एहतिराम करते हैं। अगर किसी आदमी ने मुहम्मद (सल्ल०) को क़त्ल कर डाला, तो बनी हाशिम का खानदान उन का इन्तिकाम लेने के लिए ऐडी चोटी का जोर लगा देगा। हाशिमियों के साथी क़बीले उन का साथ देंगे। नतीजा यह होगा कि एक बार फिर तमाम अरब में लड़ाई की चिंगारियां भड़क उठेगी और यह कोई नहीं जानता कि इस लड़ाई का नतीजा क्या होगा, कितने खानदान बर्बाद हो। जाएंगे और कितने कबीलों का खात्मा हो जाएगा।

अबू जहल ने हजरत उमर से पूछा, तो क्या हम मुहम्मद (सल्ल०) से कुछ न कहें ? अपने माबूदों की तौहीन इसी सरगर्मी के साथ करने दी जाए?

उमर बोले, कम से कम मैं यह नहीं चाहता कि वह कत्ल कर दिये जाएं, इस से बड़े फ़ितने के पैदा होने का खतरा है, बल्कि मुनासिब यह है कि उन्हें समझाओ, उन पर सख्तियां करो, लेकिन क़त्ल न करों।

और जो लोग मुसलमान हो गये हैं, उन के साथ क्या व्यवहार किया जाए? अबू जहल ने पूछा। .. वे जिन लोगों के रिश्तेदार या गुलाम हैं, वही लोग उन पर इस कदर सख्तियां करें, वे नये धर्म से मुंह फेर कर फिर अपने माबूदों की ओर लौट आएं, उस ने मश्विरा दिया। 

वलीद बिन मुगिराह ने कहा, मश्विरा तो मुनासिब है। मैं इस तज्वीज पर इतना और बढ़ाता हूं कि जो लोग मुसलमान हो गये हैं, उन पर सब के सामने सख्तियां की जाएं, ताकि दूसरों को सबक मिले और फिर मुसलमान होने की हिम्मत न कर सकें। 

अब्बास बिन वाइल सहमी ने कहा, मेरे ख्याल में यह तज्वीज मुनासिब है। इस वक्त जो लोग मुसलमान हुए हैं, उन में ज्यादातर गुलाम और मुफ्लिस हैं। जब उन पर सख्तियां होंगी, तो वे अपने बाप-दादा के मजहब की तरफ़ लौटेंगे और चुकि लोगों को उन की हालत देख कर सबक मिलेगा, इस लिए फिर कोई नये मजहब को अख्तियार न करेगा।

सब ने इस तज्वीज की जोरदार ताईद की और सबं की राय से यही तै पाया कि मुसलमानों पर सब के सामने इतनी सख्तियां की जाएं कि वे मजबूर हो कर इस्लाम छोड़ दें और अपने बाप-दादा का मजहब पकड़ लें।

इस तज्वीज़ के बाद उत्बा बिन रबीआ ने कहा, अब उन लोगों के नाम बता दिये जाएं, जो मुसलमान हो गये हैं। 

अबू जहल ने कहा, मैं ने जहां तक हो सका, मुसलमानों की सूची तैयार कर ली है। इस में सिर्फ एक दो ही ऐसे असरदार बुजुर्ग हैं, जिन का हम कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं, वरना सब के सब हमारे काबू के हैं और हम उन पर भरपूर सख्तियां कर सकते हैं। जो नाम मुझे इस वक्त तक मालूम हो सके हैं, मैं बताता हूं। हजरत खदीजा, रजि० हजरत अबू: बक्र सिद्दीक रजि० हजरत अली रजि० हज़रत उस्मान रजि०, ये लोग कुरैश के शरीफ़ों में से हैं और इन लोगों पर सख्तियां करना मुश्किल है।

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एक बूढ़े आदमी ने खड़े हो कर कहा, इस में से एक उस्मान है, जो मेरा भतीजा है। अगर उस ने इस्लाम न छोड़ा, तो उसे मारते-मारते मार डालूंगा। 

यह बूढ़ा आदमी हजरत उस्मान बिन अफ्फान रजि० का चचा था। लोगों ने उस के जोश की तारीफ़ कर के उसे हजरत उस्मान पर सख्तियां करने के लिए उभारा। जब वह जोश व गजब से भर गया, तो अबू जहल ने सब के नाम बता दिये और यह कहा कि जासूस बाक़ी मुसलमानों का नाम जानने के लिए लगे हुए हैं, नाम मालूम होने पर सब को बता दिया जाएगा। फिर यह तै करने को कहा कि किस दिन से सख्तियां शुरू की जाएं। 

अबू सुफ़ियान ने कहा, देर करने की जरूरत नहीं है। कल से सब लोग सख्तियां शुरू कर दें और इस बढ़ते हुए फ़ित्ने को जितनी जल्द मुम्किन हो दबा दें। 

सब ने इस तज्वीज़ की ताईद की। फिर मज्लिसे शूरा खत्म हो गयी। लोग उठे और अपने-अपने घरों को रवाना हो गये।

यह वह मज्लिसे शूरा थी, जिस ने तमाम कबीलों में मुसलमानों के खिलाफ नफरत व हिकारत और जोश व गजब की लहर दौड़ा दी थी।

मुसलमानों को इस साजिश का पता न था। अगर उन्हें मालूम हो जाता, तो बिल्कुल मुम्किन था कि उन पर वे आजमाइशें न आती, जो बाद में आयीं। बहरहाल अल्लाह को यहो मंजूर था, इसलिए उन्हें मालूम न हो सका।

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इस्लाम छोड़ने के लिए नबी और सहाबा पर ज़ुल्म की इन्तेहा

चूँकि तमाम कुरैश, कुरैश के सारे कबीले और दूसरे तमाम कबीले देख रहे थे कि उन के माबूदों की, जिन की वे और उनके बाप-दादा बराबर पूजा करते चले आ रहे थे, बड़ाई और इज्जत मिट रही थी और बुतपरस्ती खतरे में पड़ती जा रही थी, इस लिए सब को गुस्सा था और बदला लेने के लिए भरे बैठे थे।

उन्हों ने तै कर लिया था कि जैसे भी मुमकिन हो, मुसलमानों को सताकर सीधे रास्ते से फेर दें, इस्लाम छोड़ने पर मजबूर करें और फिर उसे अपने बाप-दादा के धर्म में दाखिल कर लें। इस ख्याल ने उन्हें जुल्म व सितम करने पर उभार दिया।

जुबैर का चचा जिस वक्त अपने घर पहुंचा, तो बहुत गुस्से में था। 


जुबैर बिन अव्वाम रजि० पर चचा की तरफ से सख्तियां

जब हजरत जुबैर रजि० को देखा, तो लपक कर उन के बाल पकड़ कर खींचते हुए पूछा, बदबख्त, जुबैर ! क्या तुम भी मुसलमान हो गये ?

हज़रत जुबैर रजि० ने नरमी से जवाब दिया, हां चचा, मैं मुसलमान हो गया। 

चचा को बड़ा गुस्सा आया। उस ने उन के सिर के बाल इस जोर से खींचे कि हज़रत जुबैर रजि० के आंसू निकल पड़े, बोला, ऐ खानदान की नाक कटाने वाले ! तुम मुसलमान क्यों हो गये हो? 

अगरचे हज़रत जुबैर बिन अव्वाम रजि० जवान थे, ताक़तवर थे। चाहते तो चचा को उठा कर फेंक देते, लेकिन वह अपने चचा का एहतराम करते थे, अपने बुजर्ग की शान में गुस्ताखी की हिम्मत न हुई। धीरे से बोले, ऐ चचा ! इस्लाम तौहीद की तालीम देता है। मैं अपने हाथों से तराशे हुए पत्थर के खदाओं को छोड़ कर उस खुदा का परस्तार बन गया हं, जो दुनिया का पैदा करने वाला है और जिस के हुक्म के बगैर जर्रा भी हरकत नहीं कर सकता।

उन के चचा को बड़ा गुस्सा आया, उस ने कहा, सुन ! कान खोल कर सुन ! या तो तू इस्लाम छोड़ दे, वरना मैं तुझे ऐसी सख्त सजा दूँ कि लोग तेरी हालत पर अफ़सोस करेंगे।

हजरत जुबैर रजि० ने कहा, ऐ चचा ! और जो आप फ़रमा दें, दिल व जान से कुबूल करने को तैयार हूं, पर इस्लाम को छोड़ दूं, यह मुझ से न हो सकेगा।

यह सुन कर उन के चचा को तैश आ गया। उस ने कहा, तेरी ऐसी जुर्रत, अच्छा देखू, तू कैसे इस्लाम को न छोड़ेगा?

यह कहते ही बूढ़े ने हजरत जुबैर को खजूर की चटाई में लपेट दिया और ऊनी कपड़े की मशाल बना कर उसे जलाया और हजरत जुबैर रजि० की नाक में धुआं देना शुरू किया। जब तक मुम्किन हुआ, हज़रत जुबैर रजि० ने सांस रोके रखा, लेकिन कब तक रोकते, आखिर न रोक सके और दिमाग में पहुंचा। इस लिए आप को बड़ी तकलीफ़ हुई । 

अगर आप धुएं की तरफ से मुंह फेरना चाहते, तो जालिम चचा उन के सर के बाल पकड़ कर फिर धुएं की तरफ़ कर देता।

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धुएं से इतनी तकलीफ़ पहुंची कि आप पर ग़शी की हालत तारी हो गयी। उन के चचा ने उन की यह हालत देख कर आप से कहा, बदबख्त जुबैर ! अब भी कुछ नहीं बिगड़ा, तू तौबा कर, इस्लाम को छोड़ और – अपने बाप-दादा की तरफ़ मुड। 

अगरचे आप को सख्त तक्लीफ़ हो रही थी। धुएँ का जहर दिल दिमान में भर गया था, लेकिन इस्लाम का ऐसा खुमार न था, जो इस धुएं से उतर जाता। आप ने फ़रमाया, ऐ चचा! अगर आप मुझे धुआं दे कर मार भी डालेंगे, तब भी मैं इस्लाम को नहीं छोड़गा।

बूढे को उन के जवाब पर ताज्जुब भी हुआ और गुस्सा भी इस क़दर आया कि अपने हाथ अपने दांतों से काटने लगे। उस ने कहा, देखूंगाकि कब तक तू इस्लाम को नहीं छोड़ेगा ? यह कह कर उस ने धुआं और नाक के करीब कर दिया। इस धुएं से हजरत जुबैर को इतनी तक्लीफ़ हुई कि आप बेहोश हो कर गिर गये, पर जालिम चचा को बेहोश भतीजे पर भी रहम न आया। 

वह बैठ गया और बराबर धुआं देता रहा, यहां तक कि कपड़ा जल कर राख हो गया और वह भी थक गया। थक कर उस ने जुबैर को छोड़ दिया। हजरत जुबैर दुनिया और उस की तमाम चीजों से बेखबर बेहोश पड़े थे। न किसी ने उन्हें उठाया, न होश में लाने की कोशिश की। जिस वक्त हजरत जुबैर पर यह सख्ती गुजर रही थी, उस वक़्त हजरत उस्मान बिन अफ्फ़ान रजि० को उन के चचा ने बुला कर पूछा, बेटे ! क्या यह सच है कि तू भी मुसलमान हो गया है ?

उस्मान बिन अफ्फ़ान रजि० की आज़माईश

हजरत उस्मान ने जवाब दिया, हां, चचा! यह सही है। यह सुन कर उन के चचा को गुस्सा आ गया। उस ने कहा

कमबक्त ! तू अनदेखे खुदा को पूजता है। बेवकूफ़ ! अपने बापबाबा के मजहब को छोड़ कर नये मजहब का पुजारी बन गया है, या तो इस मजहब को छोड़ दे, वरना मैं तुझे क़त्ल कर दूंगा।

हज़रत उस्मान रजि० ने कहा, चचा! क्या तुम जानते हो कि जिस आदमी ने तमाम उम्र अंधेरे में गुजार दी और अब उसे रोशनी मिल गयी हो, वह रोशनी छोड़ कर फिर अंधेरे में जा पड़े। एक अक्लमंद आदमी कभी ऐसा नहीं कर सकता।

उन के चचा को इस पर गुस्सा आ गया और उस ने कहा, अच्छा, तू अँधेरे से उजाले में आ गया है, देख! यह रोशनी ही तेरी मौत का पैगाम है।

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यह कह कर उस ने हजरत उस्मान रजि० को खजूर की रस्सियों से जकड़ कर दुर्रे से बे-दरे पीटना शुरू कर दिया और इतना पीटा कि आपका बदन लहूलुहान हो गया।.

हजरत उस्मान रजि० पिटते रहे, तमाम बदन जख्मी हो गया। सख्त तक्लीफ़ हुई। आप ने तकलीफ़ बर्दाश्त करने के लिए होंठों को दांतों में  दबा लिया। आह तो आह, उफ़ तक भी न किया और इस्लाम को छोड़ने का वस्वसा तक पैदा न हुआ, आप ने अगर कहा तो सिर्फ यह कि मेरे जिस्म के टुकड़े कर डालो, लेकिन यह न होगा, हर गिज न होगा कि मैं इस्लाम को छोड़ दूं। मैं जिंदगी की आखिरी सांस तक मुसलमान रहूंगा। उन का चचा इस बात पर और भी बिगड़े और उस ने पूरी ताकत लगा कर हजरत उसमान रजि० को मारना शुरू किया। 

चमड़े का कोड़ा था, बदन के जिस हिस्से पर पड़ता था, खाल उधेड़ देता था। तमाम बदन जख्मों से चुर था और जिस्म के मुख्तलिफ़ हिस्सों से खून का फव्वारा उबल रहा था। संगदिल से संगदिल को उन की इस हाल पर रहम आ जाता। अगर रहम न आया तो उन के जालिम चचा को। वह बराबर आप को मारता रहा, यहां तक कि आप बेहोश हो कर गिर पड़े । 

चचा बोला, अब इसे ले जा कर एक कोठरी में बन्द कर दो, फिर उस को सजा दी जाएगी।

गुलामों ने हजरत उस्मान रजि० को ले जा कर एक अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया। दूसरे दिन फिर उन्हें निकाला और मारना शुरू कर दिया। आप को आप के चचा ने उस वक्त तक मारा, जब तक उस के हाथ में ताक़त रही। जब वह थक गया, तब छोड़ा।

आज तमाम मक्के में जोश था। कुफ्फार गली-गली फिर रहे थे। आज के दिन मुसलमानों पर सख्तियां होनी थीं। हर आदमी अपने-अपने मुलाजिमों की खोज-बीन में घर से बाहर निकला था।

मुसलमान कमजोर थे, बेबस थे। मक्के का बच्चा-बच्चा उन का दुश्मन था। उन्होंने ख्वाब में भी यह न सोचा था कि उन पर मक्का के वही बाशिंदे इतनी सख्तियां करेंगे। वे दरिंदगी और बरबरता का निशाना बनने लगे और उन पर इंतिहाई जुल्म व सितम किये जाने लगे।

To be continued …

इंशा अल्लाह सीरीज का अगला हिस्सा कल पोस्ट किया जायेगा …. 
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