सिरतून नबी (ﷺ) सीरीज | Part 22

सिरतून नबी (ﷺ) सीरीज | Part 22

Seerat un Nabi (ﷺ) Series: Part 22

हिजरत की दावत

हुजूर (ﷺ) ने मुसअब बिन उमैर (र.अ) को यसरब तब्लीगे इस्लाम के लिए भेजा था। हुजूर (ﷺ) को उन का बड़ा ख्याल था। जब कोई आदमी यसरब से आता, तो आप उन से मुसअब की खैरियत मालूम करते।

आप को मालूम हो गया कि यसरब में इस्लाम खूब फैल रहा है और लोग गिरोह के गिरोह इस्लाम में दाखिल हो रहे हैं। आप को इस से खुशी हुई।

यसरब में मुसलमानों की तायदाद बढ़ रही है, इस की खबर मक्के वालों को भी होती रहती थी, जिस से उन की नजरों में खतरे बढ़ते जा रहे थे।

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इस लिए अब उन के जुल्म में और बढ़ोत्तरी हो गयो थी। वे चाहते थे कि किसी तरह मुसलमान इस्लाम से फिर जाएं, लेकिन मुसलमान तमाम जुल्मों को सहते हुए भी इस्लाम से फिरने वाले न थे।

इसी कशमकश में हज का जमाना करीब आ गया और मक्का में हर तरफ से लोग जमा होने शुरू हो गये। हरमे मोहतरम और उस के बाहर का मैदान लोगों से भर गया। तवाफ़ शुरू हो गया और हज की रस्में पूरी होनी शुरू हो गयीं।

जब हुजूर (ﷺ) तवाफ़ से फ़ारिग हुए तो इत्तिफ़ाकिया असद बिन जुरारा मिल गये। मुसअब (र.अ) भी उन के साथ थे दोनों बढ़ कर हुजूर (ﷺ) के करीब आए। हुजूर (ﷺ) उन्हें देख कर बहुत खुश हुए और आप ने फौरन हजरत मुसअब से पूछा बताओ मुसअब ! तुम्हारी तब्लीग़ का क्या नतीजा रहा?

मुसअब (र.अ) ने कहा, अल्लाह के फज्ल व करम से बड़ी कामियाबी रही औस और खज़रज के लगभग सभी लोग मुसलमान हो गये हैं।

हुजूर (ﷺ) यह सुनकर बहुत खुश हुए और खुदा का शुक्र अदा किया। मुसअब (र.अ) ने कहा, तमाम लोग आप के दीदार का बेहद इश्तियाक रखते है। 

मैं खुद उन से मिलना चाहता हूं, आप (ﷺ) ने कहा।

असद बिन जुरारा (र.अ) ने कहा, हुजूर (ﷺ) ! हम आप से तंहाई में और इत्मीनान से मिलना चाहते हैं।

आप (ﷺ) ने फ़रमाया, तुम और तुम्हारे कुछ साथी रात को उक्बा की घाटी में आ जाएं। मैं भी वहां आ जाऊंगा और उसी जगह बैठ कर इत्मीनान से बातें करेंगे।

फिर कहा, अब तुम जाओ, मुसअब ! तुम भी जाओ असद अब फिर साथ ही आना।

दोनों सलाम कर के वापस हुए।

मगरिब की नमाज के बाद हुजूर (ﷺ) उक़्बा की पहाड़ी के लिए निकले। रास्ते में हजरत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब मिल गये। अब्बास अगरचे मुसलमान नहीं थे, लेकिन मुसलमानों के हमदर्द जरूर थे। पूछा आप रात के वक्त कहां जा रहे हैं?

आप (ﷺ) ने फ़रमाया, मैं एक काम से उक्बा की घाटियों में जा रहा हूं। आप चाहें, तो चलें।

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चलूँगा, अब्बास ने कहा, मुझे कौम की तरफ़ से डर है कि कहीं वह आप को नुक्सान न पहुंचाए।

अंदेशा न करो, खुदा मेरा हिमायती और मददगार है।

दोनों चले और चल कर उक्बा की घाटी में पहुंचे। यहां यसरब के बहुत से मुसलमान पहले से मौजूद थे। सलाम और मुसाफ़ा के बाद आप (ﷺ) एक पत्थर पर बैठ गये। आप के सामने तमाम लोग अदब से बैठ गये।

असद बिन जुरारा (र.अ) ने कहा- हुजूर (ﷺ) पर मेरे मां-बाप क़ुर्बान हों। आप ही की बदौलत गुमराही के अंधेरे से निकल कर ईमान के उजाले में आए हैं। हम को यसरब वालों ने वकील बना कर आप की खिदमत में भेजा है कि हम आप को यसरब चलने की दावत दें। यकीन है कि आप (ﷺ) हमारी दरख्वास्त कुबूल फ़रमाएंगे।

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, मुझे यसरब वालों से गायबाना मुहब्बत है। मुझे उन से मिलने का बेहद शौक है। अल्लाह जैसे ही चाहेगा कि यसरब पहुंचू, तो मैं यसरब पहुंचने में कोई कोताही न करूंगा।

यसरबी यह सुन कर बहुत खुश हुए।

हजरत अब्बास बीच में बोल पड़े,
हे यसरब वालो! तुम नहीं जानते कि हजरत मुहम्मद के यसरब जाने से तुम्हारे लिए क्या-क्या मुसीबतें खड़ी: हो जाएंगी। पूरा अरब तुम्हारे खिलाफ़ हो जाएगा, सारे कबीले तुम से लड़ने लगेंगे। हर कबीला तुम्हारा दुश्मन हो जाएगा, तुम किस-किस का मुकाबला करोगे? और किस-किस से मुहम्मद को बचाओगे? अगर तुम यह सब कुछ कर सकते हो, तो ठीक है, वरना खामोश हो जाओ और मुहम्मद (ﷺ) को वहां ले जाने का नाम न लो।

बरा बिन मारूर (र.अ) ने कहा,
ऐ हाशमी नवजवान ! मैं ने और मेरे साथियों ने आप की बात सुन ली। हम खूब जानते हैं कि हुजूर (ﷺ) के यसरब ले जाने पर हमारे ऊपर कितनी जिम्मेदारियां आ जाएंगी, और हमें क्या-क्या मुसीबतें बरदाश्त करनी पड़ेंगी और किन-किन लोगों से लड़ना पड़ेगा? हम ने इन तमाम बातों को सोच कर और हर पहलू पर नजर रख कर ही यह फैसला किया है। हम उस वक्त तक हुजूर (ﷺ) की हिफाजत करेंगे, जब तक कि एक भी मुसलमान यसरब में जिंदा रहेगा। यह किसी की हिम्मत नहीं कि हमारी जिंदगी में भी हुजूर (ﷺ) का बाल बेका कर सके।

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हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, ऐ यसरब के मुसलमानो! चचा अब्बास ने जो कुछ फ़रमाया है, मुझे लगता है कि ये तमाम बातें होने वाली हैं। मेरा मक्का से यसरब को जाना मक्का वालों से जंग का ऐलान करना है। मुझे डर है कि खून की नदियां बह जाएंगी। यह ठीक है कि मझे यसरब को ही हिजरत करना है, लेकिन अल्लाह का हुक्म मिलने पर मैं खुद आऊंगा, इस तरह यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं अपनी हिफाजत करूं। बेहतर यही है कि आप मुझे दावत न दें।

साद बिन जरारा (र.अ) ने कहा, हुजुर (ﷺ) ! हम ने और तमाम यसरब वालों ने अपनी जिम्मेदारी को महसूस करते हुए हुजूर (ﷺ) को दावत दी है। हम आप को और हजरत अब्यास को यकीन दिलाते हैं कि मर जाएंगे, पर आप पर आंच न आने देंगे।

बर्रा (र.अ) ने कहा, हम तमाम जिम्मेदारियां अपने सर लेते हैं और जिंदगी की आखिरी सांस तक हुजूर (ﷺ) का साथ देने का इकरार करते हैं।

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, मैं इक़रार करता हूं कि जिंदगी भर तुम्हारे साथ रहूँगा, मेरा जीना और मरना यसरब में ही होगा। बर्रा (र.अ) ने कहा, हुजूर (ﷺ) ! हाथ बढ़ाइये। हम आप के हाथ पर रख कर इन तमाम बातों का इकरार कर के बैअत करते हैं।

हुजूर (ﷺ) ने हाथ बढ़ाया और हर यसरबी मुसलमान ने आप के हाथ पर हाथ रख कर बैअत किया। यह बैअत सन १३ नबवी में हुई।

बैअत से फ़ारिग हो कर तमाम मुसलमान खामोशी से एक-एक, दो-दो कर के बिखरने लगे। यह एहतियात इस वजह से की जा रही थी कि किसी तरह मक्का के काफ़िरों को इस बैअत का हाल मालूम न हो सके।

हिजरत का हुक्म

जब हुजूर (ﷺ) घाटी से निकले और कुछ कदम चले, तो आप को किसी के पांव की चाप सुनायी दी। आप (ﷺ) ने पीछे पलट कर देखा, तो साफ़ नजर आया कि एक भारी-भरकम जिस्म वाला अरब लम्बे-सम्बे कदम रखता हुआ आ रहा है।

हजरत अब्बास ने भी उस आने वाले को देखा। आते ही वह बोला, मुहम्मद (ﷺ) ! तुम क्या साजिश कर रहे थे?

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हुजूर सल्ल० ने उस की तरफ़ देख कर जवाब दिया, नज़र ! तुम्हें किस साजिश का गुमान है ?

यह आराबी नजर बिन हारिस था। यह सरकश भी था और इसे मुसलमानों से सख्त् नफ़रत भी थी। कुफ्र व शिकं में अबू जहल से कम न था।

उस ने कहा, मेरा ख्याल है कि तुम ने यसरब के लोगों को मक्का पर हमला करने की दावत दी है।

हुजूर (ﷺ) ने मुस्करा कर जवाब दिया, नजर! यह तुम्हारी गलत-फहमी है। यसरब  वाले क्यों मेरे कहने से मक्का पर हमलावर होंगे?

नजर बिगड़ गया, बोला, फिर क्या मश्विरा हो रहा था?

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, चूंकि मक्का वाले मुझे और मुसलमानों को सताते हैं, इसलिए मेरा इरादा यसरब को हिजरत कर जाने का है। यही मश्विरा हो रहा था।

तो क्या आप यसरब जाने का इरादा रखते हैं? नज़र ने पूछा।

हाँ नजर! आप (ﷺ) ने कहा, जब मेरी कौम मुझे सताती है, तो मेरे लिए हिजरत कर जाने के अलावा रास्ता ही क्या है? 

नजर खामोशी से चला गया।

फिर आप (ﷺ) और हजरत अब्बास भी अपने-अपने घरों को वापस चले गये।

सुबह सबेरे आप (ﷺ) अरकम के मकान पर पहुंचे। साथ में सब ने फज्र की नमाज पढ़ी। हुजूर (ﷺ) ने कुरआन तिलावत फ़रमायी। अरकम के मकान में जमा तमाम मुसलमान बड़े ध्यान से कुरआन सुनते रहे।

कुरआन की तिलावत के बाद आप (ﷺ) ने फ़रमाया, मुझे ऐसा लग रहा है कि यसरब ही अब दारुस्सलाम बनेगा। मक्का वालों का जुल्म हद से आगे निकल गया है, इसलिए अब वहीं आराम व सुकन मिलेगा। तुम में से जो लोग हिजरत कर सकते हैं या करना चाहते हैं, वे आज़ से तैयारियां शुरू कर दें, ये तैयारियां खुफ़िया तौर पर होंगी, इसलिए कि अगर कुफ्फ़ारे मक्का को मालूम हुआ तो वे रोड़ा अटकाएंगे।

फिर हिजरत के सिलसिले में कुछ हिदायतें दी गयीं और कुछ दिनों के बाद से मुसलमानों ने यसरब की तरफ़ हिजरत करना शुरू कर दिया। जो लोग सवारी की ताकत न रखते थे, वे पैदल ही चल पड़े। 

शुरू में तो कुफ्फ्रारे मक्का को हिजरत का पता न चला, लेकिन हिजरत करने वालों के मकान खाली देखे, तो उन्हें खटंक हुई। जांच शुरू हुई और जब ही मालम हो सका कि ये सब के सब यसरब की तरफ रवाना हो गये हैं।

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कुफ्फारे मक्का के दिलों में खलबली मच गयी। उन्हों ने इस खतरे को भांप लिया कि वहां मुसलमान पहुंचेंगे तो जोर पकड़ जाएंगे, मक्का और यसरब के मुसलमान जब मिलेंगे तो एक बड़ी ताक़त बन जाएंगे। इसलिए अब उन्हों ने हिजरत में रोड़े अंटकाने शुरू कर दिये।

उन्हों ने हिजरत से रोकने का हर मुम्किन तरीका अख्तियार किया।

जब मालूम होता कि कोई मुसलमान हिजरत करने वाला है, तो उस का मकान घेर लेते, उस की तमाम चीजें छीन लेते, उसे मारते-पीटते और परेशान करते। लेकिन मुसलमान नजरें बचा कर चुपके से हिजरत कर जाते और यह सिलसिला तमाम परेशानियों के बावजूद बराबर जारी रहा।

आखिरकार उन्हों ने तै कर लिया कि जो मुसलमान हिजरत करे, उसका माल-अस्बाब छीन लो, खूब मारो-पीटो। अगर वह हिजरत से रुक जाए, तो उस का माल वापस कर दो, वरना अपने काम में लाओ।

गुण्डों की खूब बन आयी। वे रास्तों में घात में बैठ गये और मुसलमानों को हिजरत से रोकने लगे।

एक दिन हजरत सुहैब रूमी (र.अ) कुछ नकदी लेकर चुपके से मक्के से बाहर निकले और यसरब की तरफ़ रवाना हुए। 

अभी वह थोड़ी दूर चले थे कि कुछ बदमाशों ने उन्हें घेर लिया और बिना कुछ कहे-सुने उन्हें मारना शुरू किया।

हजरत सुहेब (र.अ) पिट रहे थे, लात-घुसें खा रहे थे, उन्हें न कोई बचाने वाला था और न मदद करने वाला। चुपचाप हसरत से आसमान की तरफ़ देख रहे थे। बदमाशों ने अच्छी तरह मारा-पीटा; जो कुछ भी नक़द था, सब छीन लिया और उन्हें जंगल की ओर धकेल दिया गया। आप सब्र व शुक्र के साथ इसी हालत में यसरब की तरफ़ पैदल ही चल दिये।

मुसलमान सख्तियां उठा रहे थे, पर उफ्फ तक न करते थे। 

हिजरत का सिलसिला जारी रहा। हजरत हमजा, हजरत उमर, हजरत बिलाल, हजरत अबू उबैदा बिन जर्राह तमाम के तमाम हिजरत कर के चले गये, जो बाकी रह गये थे, वे छिप-छिप कर के हिज़रत करने की फ़िक में थे। 

जो भी हिजरत करता, वह हजूर (ﷺ) से इजाजत लेता। आप उस से कह देते कि यसरब वालों से कह देना कि मैं ( महम्मद (ﷺ) )  भी बहुत जल्द आने वाला हूं। 

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उम्मे सलमा (र.अ) और अबू सलमा (र.अ) का जुदा होना

एक दिन अबू सलमा (र.अ) ने हिजरत का इरादा किया। रात में वह ऊंट पर सवार हुए। अपनी बीवी उम्मे सलमा (र.अ) को सवार किया। गोद में बच्चा लिया और रवाना हो गये।

अभी आप मक्का की गलियों में थे कि कबीला बनु मुग़ीरा के एक आदमी ने आप को जाते हुए देख लिया। उस ने लपक कर ऊंट की नकेल पकड़ ली।

ऊंची आवाज से पूछा, अबू सलमा ! क्या तुम भी हिजरत कर रहे हो?

हां, मुझे भी मक्का वालों ने इतना सताया है कि हिजरत के अलावा मेरे लिए कोई रास्ता नहीं।

क्या तू अपनी बीबी उम्मे सलमा को भी ले जाना चाहता है? क्यों न ले जाऊं? यह मेरी बीवी है, इन्हें मैं साथ ही ले जाऊंगा।

अरब बिगड़ गया, बोला, हुबल की कसम ! तुम उम्मे सलमा को नहीं ले जा सकते। हमारे कबीले की बेटी है। तुम्हें उसे ले जाने का कोई हक नहीं है।

ऐ अरब ! अबू सलमा ने कहा उम्मे सलमा मेरी बीवी है, मुसलमान हो चुकी है। अपनी खुशी से मेरे साथ जा रही है, तुम इनसे पूछ सकते हो?

अरब बिगड़ गया, मैं नहीं पूछता, तुम इसे जबरदस्ती ले जा रहे हो, मैं इसे कभी न जाने दूंगा।

तुम ग़लत कहते हो, उम्मे सलमा (र.अ) ने कहा, मेरे साथ कोई जबरदस्ती नहीं हुई है, बल्कि मैं अपनी खुशी से जा रही हूं।

तेरी खुशी कोई चीज नहीं है, अरब ने झंझला कर कहा, देखू, तुझे बनु मुगीरा कबीले के लोग कैसे जाने देते हैं? यह कहते हुए उस ने आवाज़ दी, “ऐ बन मुगीरा कबीले के गैरतमन्द अरबो! देखो, तुम्हारो बेटी उम्मे सलमा को अबू सलमा जबरदस्ती ले जा रहा है।”

उस के इस चिल्लाने पर बहुत से आदमी दौड़े हए आए। इन आने वालों में कुछ बन मुगीरा के थे और कुछ कबीला बन अब्दुल असद के।

अबू सलमा (र.अ) का ताल्लुक़ कबीला बन अब्दुल असद से था। लोगों ने आते ही पूछा, क्या मामला है? अबू सलमा ! तुम कहां जा रहे हो?

अरब ने बताया यह हिजरत करने जा रहा है। उम्मे सलमा और अपने बच्चों को भी साथ ले जाना चाहता है। क्या तुम इसे जाने दोगे?

हर तरफ़ से आवाजें आयीं, कभी नहीं, हरगिज नहीं। 

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अबू सलमा ने कहा, लोगो! मैं अपनी बीवी और बच्चे को ले जा रहा हूं। जब तुम को हमारा मक्के में रहना गवारा नहीं, तो हम यहां कैसे रहें?

एक आदमी ने कहा, तुम बीवी और बच्चे को छोड़ दो और अपनी ऊंटनी हमारे हवाले कर दो। इस के बाद जहां जी चाहे जाओ।

अबू सलमा (र.अ) को अपने बच्चे और बीवी से बेहद मुहब्बत थी। वह उन की जुदाई गवारा न कर सकते थे। उन्हों ने फ़रमाया कि इतना जुल्म न करो, तूम ऊंटनी ले लो। मेरा तमाम माल और सामान ले लो, मेरी बीवी और बच्चे को मुझ से न छीनों।

एक आदमी ने गजबनाक हो कर कहा, तुम हरगिज़ अपने बच्चे और बीवी को नहीं ले जा सकते। लोगो! इन से इन दोनों को छीन लो।

फौरन लोग झपट पड़े।

कबिला बनु अब्दुल असद के एक आदमी ने बच्चे को छीन लिया और कबीला बन मुगीरा के लोगों ने उम्मे सलमा को ऊंट से उतार लिया।

जो अरब ऊंटनी की नकेल पकड़े हुए था, उस ने अबू सलमा को धक्का देकर नीचे गिरा दिया और ऊंटनी को मय सामान के जो उस पर लदा हुआ था, लेकर चल दिया।

अबू सलमा उठ कर खड़े हुए। बच्चे और बीवी की मुहब्बत ने जोश मारा। उन्हों ने बड़ी आजिजी से कहा, आह, इस कदर जुल्म न करो। उम्मे सलमा की आँखों में आंसू भर आए। उन्हों ने फ़रमाया, मुझे छोड़ दो, मैं अपने शौहर के साथ जाऊंगी।

यह कहते ही वह अबू सलमा की तरफ़ झपटीं, लेकिन लोगों ने दो कदम भी चलने न दिया और पकड़ कर खड़े हो गये।

मासूम बच्चा मां की गोद से अलग हो कर रोने लगा। वह हुमक-हुमक कर बाप की तरफ़ झुका। बेदर्द जालिमों ने उसे डपट दिया और नन्हीं सी जान रोते-रोते निढाल हो गयी।

उम्मे सलमा भी रोने लगीं। उन्हों ने अपने शौहर को खिताब करते हुए कहा, मेरे सरताज ! जाबिर व बेरहम कौम मुझे तुम से अलग कर रही है और तुम्हारे बच्चे को तुम से छीन लिया है। यह इम्तिहान का वक्त है, देखो, लड़खड़ाना मत।

अबू सलमा ने भरी हुई आवाज में कहा – मेरी प्यारी बीवी ! मैं मुसलमान हूं और मुसलमान की शान यही है कि वह किसी मुसीबत में न घबराये। खुदा मेरा इम्तिहान लेना चाहता है। 

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इन्शाअल्लाह ! मैं इस इम्तिहान में कामियाब रहूंगा। हिजरत करूंगा। अच्छा रुख्सत।

अबू सलमा इस से ज्यादा कुछ न कह सके। उन की आंखों में आंसू भर आए और आवाज भर आई। 

उम्मे सलमा ने हिचकियां लेते हुए कहा, अच्छा प्यारे शौहर अलविदाअ।

यह कहते ही जोर-जोर से रोने लगीं। बच्चा अभी तक रो रहा था। यह अफ़सोसनाक मजंर देख कर भी काफ़िरों का दिल न पसीजा।

अबू सलमा ने हैरत भरी नजरों से बच्चे और बीबी को देखा और मक्के की गलियों से निकल कर यसरब की तरफ़ चल पड़े।

To be continued …

इंशा अल्लाह सीरीज का अगला हिस्सा कल पोस्ट किया जायेगा ….
आप हज़रात से इल्तेजा है इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करे और अपनी राय भी दे … 

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