सिरतून नबी (ﷺ) सीरीज | Part 1

Seerat un Nabi (ﷺ) Series: Part 1

 ۞ बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम  ۞ 

पैग़म्बरे इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्ल. की मुबारक जिंदगी के पहलु, आपका इंकलाब और दुनिआ पर असरात ‘सीरतुन नबी’ की सीरीज में वाक़ियात की शक्ल में हम आपकी खिदमत में पेश करने की अदना सी कोशिश कर रहे है। यह सीरीज मौलाना सादिक हुसैन सरधानवी की किताब ‘आफ़ताबे आलम’ से मख़रूज है।

इस्लाम से पहले की जिंदगी कितनी भयानक थी, फिर इस्लाम की किरणें फटती हैं। रोशनी और अंधेरे की कशमकश शुरू होती है। कुफ्फारे मक्का ने जुल्म व सितम की आंधी चला दी, एक-एक मुसलमान का जीना दुश्वार कर दिया गया, तरह-तरह की साजिशें हो रही है, कत्ल की धमकियां दी जा रहीं हैं, इलजामात लगाये जा रहे हैं।

तंग आकर मुसलमानों को हब्शा की ओर हिजरत करने की इजाजत दी जाती है, लेकिन वहां भी कुफ्फार पीछा नहीं छोड़ते, परेशानी और बढ़ती है तो मदीना की ओर चले जाने की इजाजत मुसलमानों को मिल जाती है। 

हुजूर सल्ल. के कत्ल की साजिश होती है, आप अल्लाह के हुक्म से हिजरत कर जाते हैं। मदीने में इस्लामी रियासत कायम होती है, लड़ाइयां होती हैं। अलग अलग भी और कबीले के कबीले मुसलमान हो जाते हैं, इस तरह तेईस साल बीतते-बीतते पूरे अरब में इस्लाम फैल जाता है। 

ये तमाम बातें सीरत उन नबी की सीरीज में हम आपकी खिदमत में पेश करने की कोशिश रहे हैं।

पूरी सीरीज हुजूर सल्ल. के अख्लाक व किरदार की मीसाल भी पेश करता चलता है। हमदर्दी, मुहब्बत, इस्लास, खिदमत वगैरह खूबियों से भरे वाकिआत जगह-जगह मिलते हैं, जो पढ़ने वाले के दिल में इन की अहमियत बिठा देते हैं और उन्हें इस पर तैयार करते हैं कि तुम अगर अल्लाह के रसूल सल्ल० से मुहम्बत करते हो, तो तुम भी अपनी जिंदगी में इन खूबियों को अपनाओ।

आप सभी हज़रात से दरख्वास्त है के इस सीरीज के पोस्ट ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करने में हमारा तआवुन करे। 

मोहम्मद सलीम (Author)
© Ummat-e-Nabi.com


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अजीब रोशनी

रात गुजर चुकी थी। सितारे झिलमिला कर आसमान में डूब रहे थे। उजाला फैलने लगा था। दूर तक फैले हुए रेगिस्तान की ओस से भीगी हुई सफ़ेद रेत बड़ी प्यारी लग रही थी। लगता था रात का समुद्र लहरें ले रहा है।

रेगिस्तान होने की वजह से अरब में ज्यादा गर्मी भी पड़ती है। जहरीली हवा वहां चलती है, जो इंसानों को देखते-देखते जहर में घोल कर मार डालती है। सारे देश में रेत के इतने बड़े-बड़े टीले हैं कि मीलों हरियाली नहीं दिखायी देती। एक भी नदी नहीं। रेत के टीलों की भूल-भुलैयां मुसाफिरों को अपने दामन में ऐसा छिपा लेती है कि फिर उनका पता ही नहीं चलता।

अगर अर्से के बाद पता भी चलता है, तो उनकी हड्डियों का जो रेत के नीचे दबी हुई उस वक्त सामने आती हैं, जब तेज हवा रेत को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह फेंक देती है, यही वजह है कि दुनिया की सैर करने वालों को अरब के अन्दरूनी हिस्से में जाने की इजाजत नहीं होती। 

लेकिन यही रेगिस्तान जो दिन में दोजख का नमूना होता है, रात को अच्छा मालूम होने लगता है और सुबह के वक्त उसकी रौनक और बढ़ जाती है। 

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सीरीज सीरत-उन-नबी ﷺ की शुरूआत

हमारे सीरीज सीरत-उन-नबी ﷺ की शुरूआत सन् ६११ ई० से होती है। उस वक्त पूरा हिजाज और सारे अरब में बुतों और सितारों की पूजा की जाती थी। तमाम अरब का हर कबीला, कबीले का हर आदमी बुतों और सितारों का पूजारी था, लेकिन यह अजीब बात है कि वे बुतों और सितारों को पूजते हुये भी हश्र और नश्र और बदले के दिन के कायल थे। मुर्दों को दफन करते थे। कब्रों में ऊंटों को इसलिए जिबह करते थे कि उन का अकीदा था कि वे हश्र 

के दिन इस ऊंट पर सवार हो कर चले जाएंगे। वे तौहीद के कायल थे, खुदा को कायनात का पैदा करने वाला मानते थे, बुतों को अल्लाह के दरबार में शफाअत करने वाला समझ कर उनकी पूजा करते थे।.

सुबह हो चुकी थी, ठंडी हवा चल रही थी। उस वक्त मक्का के एक कोने से बहुत ही हल्की सुरीली आवाज पैदा हुई जो धीरे-धीरे बढ़ने लगी और बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ी कि मक्का शहर की गली-गली, कूचे-कूचे, घर-घर में इसकी आवाज सुनी गयी। 

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अरबों की ईद

आज अरबों की ईद थी। वे बहुत सवेरे जाग चुके थे और आवाज को सुन-सुनकर मर्द और बच्चे बैतुल हराम के तरफ़ दौड़ने लगे। मक्के की गली-कचों में हलचल शुरू हो गयी और लोगों के गिरोह के गिरोह तेजी से लपकते नजर आने लगे।

सुरीली आवाज अभी तक बुलन्द हो रही थी। बड़ी लुभावनी आवाज थी। ऐसा लग रहा था, जैसे कोई सुरीला बाजा बज रहा है। लोग शहर के चारों ओर से तेजी के साथ बैतूल हराम की ओर दौड़ रहे थे, वे चमचमाते कपड़े पहने हुए थे और पीले पटके बांधे हुए थे। वे अरबी लिवास में थे।

बैतुल हराम यानी खाना काबा बीच शहर में कायम था। यही वह हरम शरीफ़ है, जिस की बुनियाद हजरत इब्राहिम अलै. ने रखी थी। मुद्दतों तक यह एक खुदा के मानने वालों की पनाहगाह थी, अब बुतपरस्तों के कब्जे में था। अरब बड़ी तेजी से दौड़-दौड़ कर आ रहे थे। खाना काबा के चारों तरफ़ खड़े होते जा रहे थे। ‘खांना काबा की इमारत पत्थर और चूने से बनायी गयी थी, बड़ी मजबूत और शानदार इमारत, चारों तरफ़ ऊंचे-ऊंचे शानदार दरवाजे थे।

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जमजम के करीब नाइला और आसफ का बूत

खाना काबा के नीचे एक कुंआ था। कुंए की मन पत्थर की और धन कुछ छोटा था। यही कुंआ दुनिया में जमजम के नाम से मशहूर है। कुंए की मन के करीब-करीब इधर-उधर बड़े-बड़े दो बुत थे। इनमें से एक बुत किसी खुबसूरत औरत की मूर्ति थी, ऐसा लगता था, जैसे कोई परी खड़ी मुस्करा रही हो। उस बुत का नाम नाइला था। 

दूसरा बुत एक भारी भरकम इंसान की शक्ल का था। ऐसा लगता था जैसे कोई पहलवान अपने मुकाबले के आदमी को चित करके खुश हो रहा हो। उस बुत का नाम असाफ़ था। तमाम अरब इन दो बुतों का एहतराम करते रहे और इनके सामने आते ही सज्दे में गिर जाते रहे।

बाजा अभी तक सुरीली आवाज से बज रहा था, ऐसा लगता था, जैसे हरम शरीफ के अन्दर बज रहा हो। खाना काबा के तमाम दरवाजे अब तक बन्द थे। वजह यह थी कि अरब में आम तौर से और मक्के में खास तौर से कुरैश का क़बीला ही सरदार माना जाता था।

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कबीला कुरैश के सरदार जनाब अब्दुल मुत्तलिब थे। उनका इंतिकाल हो चुका था। अब्दुल मुत्तलिब के दस बेटों में से सिर्फ़ हमजा, अबू तालिब, अबू लहब और अब्बास जिंदा थे, बाकी मर चुके थे। कबीला कुरैश ने अबूतालिब को अपना सरदार मान लिया था। उनका इतना रौब था कि किसी को उनके सामने बोलने की हिम्मत न होती थी। 

बैतुल हरम की कुंजी उन्हीं के पास रहती थी, जब तक वह दरवाजा न खोलते, कोई आदमी बैतूलहराम में दाखिल न हो सकता था।

जब अरब के तमाम कबीले आ चुके, तो अबूतालिब अपने भाइयों के साथ आये, अबू तालिब ने आते ही दरवाजा खोला, पहले खुद अन्दर गये, फिर भाई और कबीले के दूसरे लोग अन्दर गये। फिर हरमे पाक के तमाम दरवाजे खोल दिये गए और अरब के तमाम क़बीले झुंड के झुंड अन्दर दाखिल हो गये।

बैतुल हराम की इमारत अन्दर से भी बहुत शानदार थी। उसके ठीक बीच में बैतुल्लाह था और बैतुल्लाह के चारों ओर काले परदे लटक रहे थे। ऊपर छत पर एक बहुत बड़ा बुत रखा हुआ था, बड़ी डरावनी शक्ल का, काले पत्थर का बना हुआ। इसका नाम हुबल था, जिसकी पूजा हर एक के लिये जरूरी थी।

बैतुल हराम में इतनी भीड़ हो गयी कि तिल धरने की जगह न रही। हर क़बीला अपने-अपने चहीते बुतों की ओर दौड़ा। वहां बूत भी सैकड़ों थे। अलग-अलग जगहों पर वे रखे हुए थे। अजीब-अजीब शक्लों के थे। काले, लाल, सफ़ेद बाजा अभी तक बज रहा था। 

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बुतों का रुस्वा होकर गिर पड़ना

अब घंटे, शंख और झांझ भी बजने लगे थे। हर बूत पत्थर के चबूतरे पर गड़ा था और हर बूत के सामने उसका पुजारी बैठा था। तमाम बुतों के सामने बहुत से लोग सज्दों में पडे हुए थे। 

अबूतालिब, अबू लहब, हमजा और अब्बास खाना काबा की छत पर चढ़कर हुबल के सामने जा पड़े थे। बुतपरस्ती का ऐसा मंजर शायद ही किसी की नजर से गुजरा हो।

अभी ये लोग सज्दे ही में पड़े हुए थे कि तेज हवा के झोंके चलने लगे। हवाएं रेत के जर्रों को उठा-उठा कर उड़ाने लगीं। अब सूरज निकल कर कुछ ऊंचाई पर जा चुका था। धूप हर चारों तरफ़ फैल गयी थी। पर आज धूप में वह तेजी, वह चमक और वह गर्मी नही, जो हर दिन होती थी, बल्कि रोज से भी ज्यादा धूप फिकी-फीकी सी लग रही थी।

लोगों ने सज्दे से सिर उठाया और ख़ामोश हाथ बांधे खड़े हो गये। अभी से लोग खडे ही हुए थे, कि हवा में और तेजी आ गयी। सभी ने घबरा कर आसमान की तरफ़ देखा। आसमान लाल अंगारा हो रहा था जैसे उसमें आग लग गयी हो और बाग के शोलों ने उसे लाल बना दिया हो। लोग हैरत और गौर से आसमान को देखने लगे। देखते ही आसमान का रंग लाल स्याही में बदलने लगा, बिल्कुल उस तरह जिस तरह आग के बाद धुएं के गोल के गोल माहौल को अंधेरा बना देते हैं। 

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इस मंजर को देखकर अरबों के हवास जाते रहे। वे एक बार फिर अपने बुतों के सामने सज्दे में गिर गये। सभी घबराये हुए थे, डरे और सहमे हुए थे।

पूजारियों ने थोडी बूलन्द आवाज से कहा, रोवो, गिडगिड़ाओ, बूतों के पुजारियों ! खूब रोओ, बुतों से इस बला को दूर करने के लिए दुआ मांगो।

रोने की एक आम आवाज़ बूलन्द हई। लोग चीखने और चिल्लाने लगे। रो-रोकर बूतों से इस बला से बचे रहने की इल्तिजाएं करने लगे।

हवा इतनी तेज हो गयी थी कि खडे हुए झटका खाकर गिरने लगे थे। सूरज जैसे छिप गया था, दिन रात में बदल चुका था। कोई चीज नजर न आती थी। हवा के तेज झोंके रेत के ढेर ला-ला कर उलट देते थे। अबूतालिब और उनके भाई, जो खाना काबा की छत पर थे, चबूतरे के नीचे पड़े हुए थे। 

अबू लहब न जाने कैसे उन से अलग हो गया। हवा ने उसे उठाया और छत से नीचे गिरा दिया। उसने खौफ़नाक चीख मारी, पर उसकी आवाज चीखों की आवाज़ में गुम होकर रह गयी।

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मक्के पर अल्लाह का कहर

मक्के पर कहरे इलाही नाजिल हो रहा था। बच्चे और बूढ़े सब के सब चीख और चिल्ला रहे थे। रो-रो कर अपने माबूदों से इल्तिजाएं कर रहे थे, पर उनके माबूद पत्थर के थे, वे कुछ सुनते ही न थे। लोगों की घबराहट बढ़ रही थी, उनके दिल कांप रहे थे। यहां तक कि वे चीख-चीख कर रोने लगे।

अल्लाह को उनकी आवाज़ पर रहम आया। तेज हवा के झोंके कम होने लगे। अंधेरा छटने लगा, उजाला बढ़ने लगा। थोड़ी ही देर में हवा थम गयी। गर्द और धूल छट गयी। सूरज चमकने लगा। अरबों की जान में जान आयी। वे उठ खड़े हुए। अभी ये लोग खड़े हुए थे कि पच्छिम की ओर से एक अजीब किस्म की रोशनी और चमक देखी। लोगों की हैरानी बढ़ गयी। इससे पहले उन्होंने ऐसी रोशनी न देखी थी और न ऐसी चमक।

अभी वे हैरान ही हो रहे थे कि एक बूढ़े ने बलन्द आवाज से कहा.. ‘ऐ शरीफ़ अरबो ! तुमने इस रोशनी और चमक को देखा । आओ, मैं तुम्हें बताऊं कि क्या बात है?’

सब लोग उस तरफ़ दौड़ पड़े। ..
बूढ़ा एक ऊंचे चबूतरे पर बैठ कर कहने लगा, सब खामोश हो जाओ, ऐसे खामोश कि मेरी कमजोर आवाज तुम में से हर आदमी सुन सके।

खामोशी के साथ खड़े सब उस बूढे को ताकने लगे।
इस बीच अबू तालिब और उनके भाई भी खाना काबा की छत से उतर कर बूढ़े के करीब आ खड़े हुए। उस वक्त बैतुल हराम में मरघट जैसी खामोशी छायी हुई थी। हर आदमी चुप-चाप खड़ा बूढ़े को देख रहा था।

अबू लहब जो खाना काबा की छत से नीचे लुढ़क गया था, उस के पांवों पर चोट आ गयी थी, वह भी लंगड़ाता हुआ चल कर अबू तालिब के पास आ खड़ा हुआ और बूढ़े को गौर भरी नजरों से देखने लगा।

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काहिन अबरश

बूढ़ा आदमी अजीब शक्ल व सूरत का इंसान था। उसका चेहरा लम्बोतरा, गाल पिचके हुये, हड्डियां उभरी हुई, माथा तंग, आंखें छोटी, अन्दर को धंसी हुई थीं। सिर के बाल सफ़ेद और लम्बे थे, जो औरतों की लटों की तरह खजूर के रेशों से गंधे दोनों ओर सीने पर पड़े थे।

दाढ़ी नाफ़ तक लम्बी थी, मोछे दाढ़ी से मिल गयी थीं, लमें इतनी बढ़ी हुई थीं। कि मुंह को ढक कर दाढ़ी से जा मिली थीं। इस शक्ल व सूरत को देखते हुए बूढ़ा किसी बन मानुष से कम नहीं लगता था।

उसके बायें हाथ में इंसानी खोपड़ी थी और दाएं हाथ में किसी इंसान के हाथ की हडडी थी। गले में हडियों की माला थी। पहनावा भी अजीब था । एक लंबा जुब्बा था, जिसका नीचे का हिस्सा ऊंट के ऊन का था। सिर से कम्बल लपेटे हुए था। उसकी छोटी-छोटी आंखें भीतर को धंसी हुई, ६ आंखें चिंगारियों की तरह चमक रही थीं। उस बूढ़े का नाम अबरश था।

बूढ़ा काहिन भी था और आराफ भी। (पीछे की बातें बताने वाले को काहिन कहते है और आगे की बातें बताने वाले को आराफ कहते हैं, ये लोग जिन्नो और शयातीन के हवाले से बात गढ़ते है) 

तमाम अरब उसे जानता था। उसे लोग पहुंचा हुआ इंसान समझते थे। उसकी बातों पर यकीन रखते थे। अबरश ने चमकती आंखों से चारों ओर देखा। हर ओर इंसान ही इंसान नजर आ रहे थे। संब खामोश खड़े थे, उसकी ओर नजरें गड़ी थीं।

अबरश ने तेज आवाज में कहा, ऐ लात व हुबल के पूजने वालो ! शायद तुम को याद होगा कि आज से पूरे चालीस साल पहले इसी तरह की रोशनी और इसी तरह की चमक एक बार पहले भी देखी जा चुकी है।

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दुनिया करवट लेने वाली है

जिस तरह आज हम-तुम सब हैरान हैं, वैसे ही उस दिन भी हए थे। मुझ से उस दिन पूछा गया था कि यह चमक और रोशनी कैसी है? उस दिन मैं चुप हो गया था, इसलिए कि मेरे इल्म ने जो बात उस दिन बतायी थी, वह मैं बयान नहीं कर सकता था और आज मैं बिना पूछे खुद ही बयान करता हूं।

लोग बड़े ध्यान से उस की बातें सुनने और विचार करने लगे।

अबरश ने कहा, देखो, मेरे हाथ में यह इंसान की खोपड़ी है और यह हाथ की हड्डी है। मैं ने इन्हें उस मैदान में पाया था, जहां बनू बक्र और बनू तग़लब जैसे जबरदस्त कबीलों की लड़ाई पूरे चालीस साल तक जारी रही। मुम्किन है कि दुनिया इस लड़ाई को जहालत का करिश्मा बताये, लेकिन अरब जानते हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि यह जिहालत की लड़ाई न थी, बल्कि खुददारी और इज्जत और नामूस की हिफाजत के लिए लड़ी गयी लड़ाई थी। 

यह सही है कि हमारे क़बीलों में एका नहीं है, वे बिखरे हुए हैं। हर गांव, कस्बे और शहर का हाकिम अलग है, मगर  हमारा एका भी मुनासिब नहीं है। जब हम एक हो जाएंगे, तो हमें एक दूसरे से दबना पड़ेगा, इस से हमारी खुद-दारी को धक्का लगेगा और यह बात हमारी रिवायतों के खिलाफ़ है। 

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अबरश तकरीर कर रहा था और लोग बड़े गौर से सुन रहे थे। उस ने आगे कहा, ऐ अरब के सपूतो! इस खोपड़ी की ओर देखो। इस खोपड़ी ने मुझे आगे की बातें बता दो हैं। दुनिया करवट लेने वाली है, एक बड़ा इन्किलाब होने वाला है। हमारे माबूदों को रुसवा किया जाने वाला है। गैरतमंद अरबो! क्या तुम अपने खुदाओं की जिल्लत पसन्द करोगे?

हर और से आवाजे आयीं, कभी नहीं, हरगिज नहीं! जिंदगी की आखिरी सांसों तक नहीं।

अबू लहब के पैर में चोट आ गयी थी, तक्लीफ़ थी। वह अच्छी तरह खड़ा न हो सकता था। हम्जा के कंधे पर हाथ रखे खड़ा था। उस ने चिल्ला कर कहा, हम अपने माबूदों को जलील करने वालों के सिर तोड़ देंगे, मर जाएंगे, पर अपने खुदाओं की जिल्लत गवारा न करेंगे।

अवरश ने कहा, यही होना चाहिए। जिन माबूदों को हम और हमारे.बाप-दादा पूजते रहे हैं, क्या हम ऐसे ही बेहिस, ऐसे जलील कमीने हो जाएंगे कि उन की जिल्लत गवारा कर लेंगे। लात व उज्जा की कसम ! हरगिज नहीं ! सच्चे माबूदों के पुजारियो। सुनो आज से चालीस साल पहले रात को ऐसी चमक और रोशनी देखी गयी थी, जैसी आज देखी है। वह रात बड़ी डरावनी थी। उस रात को हमारा माबूद हुबल मुंह के बल गिर पड़ा था, जव हम सब ने उठा कर उसे कायम किया, तो वह खड़ा न रह सका और फिर गिर पड़ा। हम ने फिर उसे खड़ा किया, लेकिन वह फिर भी न खड़ा हुआ और तीसरी बार भी गिर पड़ा। ये सब बातें आप सब लोगों को अच्छी तरह याद होंगी।

अबू लहब ने कहा, अच्छी तरह याद है। तमाम हिजाज़ और सारे अरब पर उस दिन हैबत छा गयी थी। उस रात को आसमान पर बहुत ज्यादा गैर-मामूली तौर पर सितारे टूटते हुए देखे गये थे। आसमान में अजीब किस्म की रोशनी और चमक भी देखी गयी थी। उस रात को सुबह सवेरे हमारा सब से बड़ा खुदा खुद मुंह के बल गिर पड़ा था। जब हम ने उसे उठा कर खड़ा किया, तो वह कांप कर फिर गिर पड़ा। एक दो बार नहीं, पूरे तीन बार गिरा था।

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अबरश ने कहा, मेरा मक्सद उस वाकिए को याद दिलाना था। सुनो, उस रात को सुबह सवेरे वह हस्ती वजूद में आयी, जिससे हमारे माबूद जलील व रुसवा होंगे। आज उस की उम्र पूरे चालीस साल हो गयी है। इस खोपड़ी ने मुझे यह बताया है कि अब तक वह इंसान गुमनाम था।

अब वह जाहिर होगा, बूतों के खिलाफ़ तकरीरे करेगा, बुतपरस्ती से मना करेगा, खुदापरस्ती की तलीम देगा। आओ, रोओ, खुब दिल खोल कर रोवो। हमारे माबूद भी हम से रूठ जाएंगे, दुनिया अनदेखे खुदा के सामने झुक जाएगी, कैसा होगा वह जमाना ! अवरश की आंखें भीग गयीं। मज्मे में से अक्सर लोग रोने लगे।

अबू जहल ने कहा, मुकद्द्स हबल की कसम ! मैं हर उस आदमी को क़त्ल कर डालूंगा , जो अनदेखे खुदा को सजदा करेगा।

बरश ने कहा, काश ! तुम ऐसा कर सकते । पर यह खोपड़ी कहती है कि ऐसा न कर सकोगे। देखोगे अपनी आंखों से अपने माबूद की जिल्लत!

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हम्जा ने पूछा, है उपाय उस से बचने का ?

अबरश ने कहा, है क्यों नहीं ? पहले तो आपस के झगड़े बन्द करो, तमाम कबीले एक हो जाओ, और वायदा करो कि खुदा को मानने वाले की जोरदार मुखालफत करोगे, चाहे वह कोई भी हो, किसी कबीले का हो, उस को सताने में कोताही न करोगे और कोशिश कर के उसे क़त्ल कर डालोगे।

अरब में यों तो बहुत से कबीले थे, लेकिन उन में से कुछ ही थे, जिन का ज्यादा एहतराम किया जाता था। इन में भी बनी हाशिम की सब से ज्यादा इज्जत होती थी। चूंकि खाना काबा का एहतिराम तमाम कबीले करते थे। हर कबीले का माबूद बैतुल हराम में था। काबा मक्का में था। मक्का में बनी हाशिम की हुकूमत थी, इस लिए भी यह कबीला और कबीलों से मुम्ताज माना जाता था। अब्रश को यह ख्याल हुआ था कि उन के माबूदों को जलील करने वाला अगर बनी हाशिम में से हुआ तो बनी हाशिम के दबदबे और रोब की वजह से कोई इस तरफ देख न सकेगा, इस लिए उस ने यह चाल चली कि बैतुल हराम में सब से इकरार लेना चाहा। 

अरबों की एक खास बात यह भी थी कि जो अहद व इक़रार वे कर लेते थे, उस से पीछे न हटते थे, चाहे उस में कितना ही माली और जानी नुक्सान क्यों न हो।

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तमाम अरबों ने झुक झुक कर अपने माबूदों का नाम ले कर अहद व इकरार किया कि वे अपने माबूदों को बुरा कहने वालों को कत्ल किये बिना न छोड़ेंगे, चाहे उन का ताल्लुक किसी कबीले से हो। 

सब के बाद में अबू लहब ने कहा, काहिन! तुम शायद कबीला बनी 8 हाशिम की ओर इशारा कर रहे हो। मैं वायदा करता हूं कि अगर ऐसा हमारे कबीले में होगा, तो सब से पहले मेरी तलवार उस के सर पर चमकेगी।

फिर अब्रश ने बताया, मेरा ख्याल नहीं, बल्कि मुझे खोपड़ी बता रही है कि माबूदों को बातिल करार देने वाला बनी हाशिम में से होगा। साफ़ लिखा हुवा था, ‘मुहम्मद’। सब इस नाम को देख कर हैरान रह गये।

हुजूर सल्ल. के आमद की बशारत

हजरत मुहम्मद सल्ल० अब्दुल्लाह के बेटे, अब्दुल मुत्तलिब के पोते अबू लहब, हमजा, अब्बास और अबू तालिब के भतीजे थे। मुआरखैंन के क़ौल से आप २१ अप्रैल ५७१ ई०, रबीउल अव्वल के महीने में सन् आमुलफ़ील, सोमवार के दिन, सूरज निकलने से पहले बहुत सुबह-सवेरे पैदा हुए थे।

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अब आप की उम्र ४० साल हो गयी थी। लोग जानते थे और अच्छी तरह जानते थे कि आप से ज्यादा सच्चा और अमानतदार कोई नहीं। बहुत कम बोलते, तंहाई पसन्द करते, कभी-कभी पहाड़ों पर चले जाते, कई-कई दिन वहां रहते, लेकिन अभी तक उन की ओर से कोई ऐसी बात न हुई थी, जिस से यह गुमान किया जा सकता कि वह बुतों के खिलाफ आवाज उठाने वाले हैं।

आप के वालिद का इंतिकाल आप की पैदाइश से पहले ही हो चुका था। 

जब आप छः साल के हुए, आप की वालिदा का इंतिकाल हो गया। इस तरह आप बचपन ही में बाप और मां के साए से महरूम हो गये।

मां-बाप की वफ़ात के बाद आप दादा की निगरानी में रहे। जब 8 बाठ वर्ष दो माह दस दिन के हुए, तो आप के दादा अब्दुल मुत्तलिब भी इस दुनिया से गुजर गये।

अब आप के चचा अबू तालिब आप के वली हुए। आप उनके पास रह कर चालीस साल की उम्र को पहुंचे। यों तो पूरा अरब आप के अच्छे अखलाख और बर्ताव की वजह से आप को मानता था, लेकिन सब से ज्यादा अबू तालिब आप को मानते थे।

अबू तालिब ने कहा, ‘अबरश! क्या तुम प्यारे भतीजे पर इल्जाम लगा कर कोई फितना खड़ा करना चाहते हो? हरगिज ऐसा न करो, मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता।

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अबरश ने कहा, हुजूर ! मैं मुकद्दस हुबल की कसम खा कर कहता हु कि मैं अपनी ओर से न कुछ कह रहा हूं, न कर रहा हूं। मेरा इल्म इस खोपड़ी के जरिए से, जो मुझे बता रहा है, वही कह रहा हूं।

अबू तालिब ने जोश में आकर कहा, तुम झूठे हो, तुम को हमारे खानदान से कोई दुश्मनी है। इस दुश्मनी को गैबदानी के परदे में निकाल रहे हो। .

अबरश ने नर्मी के साथ कहा, ऐ मक्का के सरदार ! मेरी यह हिम्मत नहीं है कि हजूर के खानदान पर कोई इल्जाम लगाऊँ। हुजूर के खानदान का पला हुआ हूं, नमक खा रहा हूं। मेरे दिल व दिमाग में दुश्मनी का ख्याल तक नहीं आ सकता। जरा सब्र कीजिए और देखिए, खोपड़ी क्या कहती है ?

अबू तालिब खामोश हो गये। अबरश ने खोपड़ी घुमानी शुरू की, इतनी घुमायी की वह गोल दायरा और फिर गोल दायरे से सिर्फ एक बिन्दी बनकर रह गयी। अब्रश ने कहा, देखिए, खोपड़ी एक बिन्दी बनकर ह रह गई है, पर देखिए और ध्यान से देखिए, यह बिन्दी खुदाओं को जलील करने वाले का नाम बन कर चमकेगी। 

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सब ने बिन्दी को ध्यान से देखा, बिन्दी फैलने लगी, फलते-फैलते नाम बनी और निहायत आब व ताब से चमकने लगी। सब ने देखा, ध्यान से देखा, हैरत से देखा, साफ़ और मोटे हर्फों में ‘मुहम्मद’ लिखा हुआ था। 

अब्रश ने कहा, तुम ने देख लिया, अब सुनो, अगर तुम अपने माबूदों को खुश कर लो, तो जो फितना पैदा होने वाला है, वह दब जाए। अबू लहब ने पूछा, माबूदों को खुश करने का तरीक़ा कौन-सा है ? अबरश ने कहा, यह खोपड़ी जवाब देगी।

खोपड़ी अभी तक घूम रही थी। अब नाम गायब हो गया था और सिर्फ बिन्दी ही बाकी रह गयी थी। लोग इस बिन्दी को बड़े ध्यान से देख रहे थे, बिन्दी फिर फैलनी शुरू हुई और देखते-देखते लफ्ज बन गयी। संब ने पढ़ा, चमकदार लफ़्ज़ों में लिखा था, ‘कुर्बानी’।

To be continued …

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