सिरतून नबी (ﷺ) सीरीज | Part 43

Seerat un Nabi (ﷺ) Series: Part 43

Seerat un Nabi (ﷺ) Series: Part 43

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मुनाफ़िकों की चालें

बनू मुस्तलिक़ की लड़ाई में मुसलमान जीत कर लौटने लगे तो उन्होंने नदी के पार आकर उस जगह कियाम किया। क़ैदी और गनीमत का माल उसी वक्त मुजाहिदों में बांट दिये गये।

हारिस की बेटी जुवैरिया को साबित बिन कैस ने गिरफ्तार किया था, इसलिए वह उन्हीं के हिस्से में दी गयी।

अब्दुल्लाह बिन उबई मुनाफ़िक़ को मुसलमानों की ये जीतें बड़ी नागवार गुजर रही थीं, इस लिए उस ने मुसलमानों में फूट डालने की एक नयी चाल चली। इस के लिए उस ने तमाम साथी मुनाफ़िकों को होशियार कर दिया।

दूसरे दिन तमाम मुनाफ़िक़ों ने अपने-अपने हथियार संभाले और शैतानी चालबाजियों की शुरूआत कर दी।

इनमें से कुछ भोले-भाले मुसलमानों के पास पहुंचे और इधर-उधर की बातों के बाद एक मुनाफ़िक़ बोला, सच तो यह है कि इस लड़ाई में अंसार ने बड़ी बहादुरी दिखायी। साद बिन उबादा जिस बेजिगरी से लड़े हैं और वही क्या, साबित, उत्बान, जुबेर बिन अव्वाम, अबू अय्यूब, तमाम अंसारी बड़े जोश और बहादुरी से लड़े। सच पूछो, तो यह जीत अंसार ही के दम क़दम से हुई।

तुम कहे जाओ, दूसरे मुनाफ़िक़ ने कहा, लेकिन मुहाजिर तो इस बात को नहीं मानते। वे कहते हैं कि हजरत अबू बक्र, हजरत अबू उबैदा, हजरत अब्दुर्रहमान रजि० और दूसरे मुहाजिरों की सरफ़रोशी से जीत मिली है।

भाई, अंसार हों या मुहाजिर, अंसार में से एक आदमी ने कहा, दोनों ही लड़े और दोनों की मेहनतों का यह नतीजा है।

हम सब अंसारियों का यही ख्याल है, पहले मुनाफ़िक़ ने कहा, पर अक्सर मुहाजिरों को अपनी जात और अपने तबके पर बड़ा घमंड है। वे कहते हैं कि अगर अंसार न भी होते, तो जीत यक़ीनन हमारी ही होती। यह उन का बेजा नाज़ है, दूसरे मुनाफ़िक़ ने कहा, आज वे अंसार ही की वजह से तरक्की कर रहे हैं।

क्या वे इस बात को भूल गये हैं कि जब मदीना में आये थे, तो एक वक्त के खाने का सामान भी उन के पास न था। हम ने हर तरह से उन की मदद को, अपना और अपने बच्चों का पेट काट कर उन्हें खाने-पीने को दिया, आज वे बातें बनाते हैं।

क़सम ! हमारी ही बदौलत उन्हों ने आराम पाया है। हमारी ही इन्हें फ़तह हासिल हो रही है, साथ ही हमारे दम क़दम से उन का रौब व दाब कायम हुआ है।

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खुदा की वजह से भोले-भाले अंसारियों के दिलों में मुहाजिरों की तरफ़ से कुदरत पैदा हो गयी, इन में से कुछ लोगों ने कहा, बेशक यही बात है। मुहाजिरों की ताकत न पहले थी, न अब है। जो कुछ हो रहा है, सब हमारी ही वजह से है, जिस दिन हम ने हाथ खींच लिया, मुहाजिर कुछ भी न कर सकेंगे।

यही बात है, दूसरे मुनाफ़िक़ ने कहा, मेरा ख्याल है अंसार को मुहाजिरों से कुछ दिनों के लिए नान – कोआपरेशन (असहयोग) करना चाहिये, ताकि उन पर सच्चाई खुल जाए और उन के दिमाग़ से उन की ताक़त का घमंड निकल जाए।

तुम ठीक कहते हो, एक अंसारी ने कहा, ऐसा ही करना चाहिए। मुनाफ़िक निफ़ाक़ की चिंगारी डाल कर अलग हो गये।

अंसार में इस बात का चर्चा हुआ। हर आदमी मुहाजिरों से खिंचने लगा। 

उधर मुनाफ़िक़ों की दूसरी टोली ने भी अंसार से खिंचाव पैदा हो गया।

एक फ़रीक़ दूसरे फ़रीक़ को बुरी नज़रों से देखने लगा।

मुनाफ़िक़ अपनी चालों को कामियाब होते देख कर बहुत खुश हुए। अभी यह पूरी फ़ौज सफ़र में थी। दो-तीन मंजिल चल कर ये एक नखलिस्तान में ठहरे। मुहाजिर और अंसार में इतना खिंचाव हो गया था कि वे एक दूसरे से कलाम न करते थे। रात होते ही फ़ौज ने इशा की नमाज़ पढ़ी और खाना खा कर सफ़र करने लगीं।


हज़रत आइशा रजि० पर तोहमत

इत्तिफ़ाक़ से हज़रत आइशा हाजत पूरी करने के लिए नखलिस्तान से बाहर गयी हुई थीं। वह एक टीले की आड़ में बैठी फ़ौज को कूच करते हुए देख रही थीं।

उस वक़्त तक परदे का हुक्म नाजिल हो चुका था।

हज़रत आइशा रजि० के लिए एक महिमल तैयार किया गया था। वह इस महिमल में सवार हो कर सफ़र किया करती थीं। उन्हों ने ख्याल कर लिया था कि जब महिमल ऊंट पर रखा जाएगा, तो उन की ग़ैर हाज़िरी से जाहिर हो जाएगा और उन की सवारी के मुहाफ़िज़ उन के इन्तिजार में रुक जाएंगे। 

जब हज़रत आइशा रजि० अपनी जरुरत से फ़ारिग़ होकर फौज की तरफ चल दीये, तो उन का हार झाड़ी से उलझ कर टूट गया और मोती बिखर गये।

यह हार उन की बहन का था। चूंकि पराई चीज़ थी, इसलिए वह बैठ कर मोती चुनने लगीं। चांदनी रात थी ही। इस में उन का ज्यादा वक्त लग गया। जब काफ़ी मोती मिल गये, तो वह चलीं और नखिलस्तान तशरीफ़ ले आयीं।

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आ कर देखा तो पूरी फ़ौज रवाना हो चुकी थी।

आप को बड़ी फ़िक्र हों गयी।

आप मदीने की  तरफ़ पैदल ही चल पड़ीं, इस ख्याल से कि शायद फ़ौज तक पहुंच जाएं, लेकिन एक मील चलती रहीं, इस पर भी फ़ौज का कोई निशान नजर न आया, आप को परेशानी हुई।

चूंकि आप कसरत से रोजे रखती थीं, इसलिए दुबली और कमजोर थीं। आप ज्यादा चल न सकीं और रास्ते में एक टीले पर बैठ गयीं।

आप को इस बात का बड़ा रंज हुआ कि महिमल बरदारों ने महिमल ऊंट पर रख दिया और यह न देखा कि आप उस पर सवार हैं या नहीं।

बात यह हुई थी कि हजरत आइशा रजि० हलकी-फुल्की थीं, इस लिए महिलबरदारों को यह मालूम ही न हुआ कि आप उस में मौजूद हैं या नहीं। उन्हों ने उठा कर महिमल ऊंट पर कस दिया और फ़ौज के साथ चल पड़े।

हज़रत आइशा रज़ि० थोड़ी देर टीले पर बैठी रहीं, जब बैठे-बैठे नींद आने लगी, तो आप वहीं पर लेट गयीं और सो गयीं।

जब आंख खुली तो सुना कोई कह रहा था –

‘इन्नालिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन० हाय यह उम्मुल मोमिनीन कैसे मर गयीं? हुजूर (ﷺ) उन की लाश कैसे छोड़ गये?

हजरत आइशा इस आवाज को सुन कर घबरा गयीं। जल्दी से उठीं और चेहरे को आंचल से छिपा लिया। उन्हों ने देख लिया था, सफ़वान बिन मुअत्तल ऊंट की महार पकड़े सामने खड़े हैं।

सफ़वान बिन मुअत्तल के सुपुर्द यह खिदमत थी कि वह फ़ौज की कियामगाह से सुबह के वक्त चलते थे और पड़ाव का खूब जायजा लेते थे कि कहीं किसी की कोई चीज पड़ी तो नहीं रह गई है। अगर किसी की कोई चीज रह जाती, तो वह उठा कर उसके मालिक तक पहुंचा दिया करते थे।

आज भी वह सुबह होने के बाद कियामगाह का जायजा ले कर चले आ रहे थे। उन्हों ने उम्मुल मोमिनीन को उस वक़्त देखा था या उस वक्त से जानते थे, जबकि परदे का हुक्म नाज़िल न हुआ था और जब उम्मुल मोमिनीन परदा न किया करती थीं।

उन्हों ने हजरत आइशा रजि० को सोता देख कर यह ख्याल किया था कि शायद आप का इंतिकाल हो गया है, इसी लिए उन्हों ने इन्ना लिल्लाह पढ़ी थी, जिसे सुन कर उम्मुल मोमिनीन की आंख खुल गयी थी। 

हजरत आइशा रजि० को उठ कर बैठते देखकर सफ़वान बिन मुअसल को बड़ी खुशी हुई। उन्हों ने फ़रमाया, अलंहम्दु लिल्लाह !

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उन्हों ने फ़ौरन ऊंट बिठाया और उम्मुल मोमिनीन को सवार होने के लिए कहा।

उम्मुल मोमिनीन ने उन से कोई बात न की, वह चुपचाप उठीं और ऊंट पर जा कर बैठ गयीं।

सफ़वान ने ऊंट की महार पकड़ी और पैदल चल पड़े।

ये दोनों सारा दिन सफ़र कर के उस जगह पहुंचे, जहां फ़ौज ठहरी हुई थी।

अब्दुल्लाह मुनाफ़िक़ ने हजरत आइशा रजि० को तन्हा ऊंट पर आते देखा, तो अपने क़रीब ही बैठे हजरत हस्सान साबित और मिस्तह बिन बसासा से बोला –

तुम देखते हो कि हजरत आइशा उम्मुल मोमिनीन कहलाती हैं और तन्हा सफ़वान के साथ आ रही हैं।

हां देखा, हस्सान ने कहा और देख कर बड़ा ताज्जुब करने लगे। ताज्जुब की क्या बात है, मिस्तह बोले, यक़ीनन हजरत आइशा जान-बूझ कर पीछे रह गयीं और अबू सफ़वान के हमराह आयी हैं। 

यही मैं भी कहता हूं, अब्दुल्लाह मुनाफ़िक को मौक़ा मिल गया, आखिर फ़ौज के पीछे और तन्हा रह जाने का क्या मतलब ?  

बड़ा बुरा जमाना आ गया है, हस्सान ने कहा, नबी की बीवी और ऐसी बातें ?

उम्मुल मोमिनीन हो या नबी जादी, मिस्तह ने कहा, औरत आखिर औरत है और वह अपने जज्बों पर क़ाबू नहीं रख सकती।

बड़े शर्म और ग़ैरत की बात है, अब्दुल्लाह मुनाफ़िक़ ने कहा, इस बात को तामम अंसार और मुहाजिरों में फैला दिया जाए।

मैं तो सब से पहले ख़ुदा के रसूल से यह माजरा कहता हूं, मिस्तह ने कहा, देखें, क्या जवाब देते हैं ?

जरूर कहो, अब्दुल्लाह मुनाफ़िक़ बोला, मैं और हस्सान लोगों से इस की चर्चा करेंगे।

इसके बाद ये तीनों उठे और प्रचार के लिए फ़ौज में घुस गये। अब्दुल्लाह मुनाफिक और हस्सान शाइर ने लोगों से इस बात का जिक्र शुरू किया। 

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चूंकि ऊंट अभी तक आ रहा था और हज़रत आइशा उस पर सवार नजर आ रही थीं, इस लिए लोगों ने हैरत से देखा और तरह-तरह की चर्चाएं शुरू कर दीं।

इधर मिस्तह सीधा हुजूर (ﷺ) की खिदमत में पहुंचा।

उधर हुजूर (ﷺ) खेमे के अन्दर बैठे थे और कोई आप के पास न था। मिस्तह ने जाते ही कहा –

ऐ अल्लाह के रसूल (ﷺ) ! खेमे से बाहर निकल कर देखिए । उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा रजि० आप पीछे रह गयी थीं और अब सफ़वान के साथ आयी हैं।

हुजुर (ﷺ) को यह खबर सुन कर कुछ रंज हुआ। आप ने फ़रमाया, मिस्तह ! शायद वह आइशा न हों और तुम को ग़लतफ़हमी हुई हो।

खुदा की क़सम ! हस्सान ने कहा, हज़रत आइशा रजि० हैं। चल कर देख लीजिए, तन्हा पीछे रह जाने और सफ़वान के साथ आने का क्या मतलब हो सकता है, यह तो बड़े शर्म की बात है नबी की बीवी को ऐसा नहीं करना चाहिए। 

हुजुर (ﷺ) बे-अख्तियार उठे, खेमे से बाहर आए, उस वक्त सफ़वान ऊंट बिठा रहा था ।

हज़रत आइशा रजि० ऊंट पर सवार थीं। हस्सान भी पीछे ही खेमे से निकल आये थे। उन्हों ने कहा, हुजूर (ﷺ) ! देखा, क्या यह बात उम्मुल मोमिनीन के शायानेशान है। खुदा की क़सम ! बुरी बात है, तमाम अंसार और मुहाजिरों में इस बात की चर्चा शुरू हो गयी है।

हज़रत आइशा को देख कर और हस्सान की बातें सुन कर हुजूर (ﷺ) के दिल को बड़ी तकलीफ़ पहुंची। आप फ़िक्रमन्द हो कर खेमे के अन्दर चले गये।

हस्सान भी पीछे ही पहुंचे। उन्हों ने कहा, हुजूर (ﷺ) रंज न कीजिये। औरत फिर औरत है। ऐसी औरतों से ताल्लुक तोड़ना बेहतर है।

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया –

हस्सान ! इस वक्त मुझे तन्हाई की जरूरत है। हस्सान चले गये।

हजूर (ﷺ) गोर व फ़िक्र में पड़ गये।

To be continued …

इंशा अल्लाह सीरीज का अगला हिस्सा कल पोस्ट किया जायेगा …
आप हज़रात से इल्तेजा है इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर हमारा हौसला अफ़ज़ाई में तावूंन फरमाए।

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