सिरतून नबी (ﷺ) सीरीज | Part 27

Seerat un Nabi (ﷺ) Series: Part 27

Seerat un Nabi (ﷺ) Series: Part 27

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हुजूर (ﷺ) कुबा में

यसरब में आप (ﷺ) के तशरीफ़ लाने की खबर आम हो गयी थी। यसरब के मुसलमानों को आप के आने का बड़ा इन्तिजार था, इसलिए आपको देखने के मुश्ताक जमा हो कर कूबा में आते, दोपहर तक इन्तिजार करते, जब सूरज पूरा तमतमाने लगता या धुप बरदाश्त के काबिल न रहती, तो ये मायूस हो कर लौट जाते।

कुबा असल शहर यसरब से दो मील की दूरी पर मक्का की तरफ़ वाकय है। यह भी एक छोटा-सा किला था और इस में ज्यादातर मुसलमान आबाद थे।

मुसलमानों ने हुजूर (ﷺ) के इस्तेकबाल की इस शान से तैयारियां की थी, जैसे किसी बड़े बादशाह के इस्तेकबाल की तैयारी की जाए।

मुसलमानों के घर-घर में खुशी की लहर दौड़ी हुई थी। हर आदमी और हर खानदान खुश था कि जो कासिद यसरब वालों की तरफ से हुजूर (ﷺ) की खिदमत में हुजूर (ﷺ) को बुलाने के लिए भेजा गया था, वह वापस आ गया था और उसने यह खुशखबरी आ कर सुना दी थी कि हुजूर (ﷺ) बहुत जल्द आने वाले हैं, इसलिए यसरबी मुसलमान हर दिन कुबा में हुजूर (ﷺ) का इन्तिजार करते। 

रबीउल अव्वल १४ नबवी का दिन आया। 

आज भी मुसलमान बड़ी तादाद में आये हुए थे। कुबा के किले से बाहर निकल कर खजूर के पेड़ों के साए में मक्का के रास्ते में बैठ कर हुजूर (ﷺ) के आने का इन्तिजार करने लगे। इन इन्तिजार करने वालों में मर्द भी थे, औरतें और बच्चे भी, लड़के और लड़कियां भी।

छोटी-छोटी बच्चियां डफ़ बजा-बजा कर हुजूर (ﷺ) की शाम में गीत (नात) गा रही थीं और हुजूर (ﷺ) की बहुत खुबियों का बयान कर रही थीं।

दोपहर तक सब गाते रहे। जब दोपहर हो गयी, सूरज की गर्मी बढ़ गई, धूप बरदाश्त के काबिल न रही, तो इन्तिजार में बैठे ये मुसलमान मक्के के रास्ते पर आखिरी नजर डाल कर वापस लौट गये। 

थोड़ी ही देर में कुबा के सामने का पूरा मैदान खाली हो गया। एक आदमी भी बाकी न रहा, उस वक्त मक्का के रास्ते पर गर्द व गुबार उड़ता नजर आया।

कुबा के करीब एक गढ़ी थी। उस गढ़ी में यहुदी आबाद थे। 

एक यहूदी अपने मकान की छत पर खड़ा था। उस ने गुबार को देखा।

उसे ताज्जुब हुआ कि इस धूप में कौन लोग आ रहे हैं। वह जो काम कर रहा था, उसे भूल गया और गुबार की तरफ देखने लगा। 

गुबार बढ़ता चला आ रहा था। थोड़ी देर में गुबार का दामन चाक हुआ और बहुत से ऊंट सवार कुबा की तरफ बढ़ते नजर आए। साथ में एक झंडा लहराता हुआ नजर आया, जिसे बुरैदा ने हाथ में ले रखा था।

यहुदी ने अन्दाजा लगाया कि यह हजरत मुहम्मद (ﷺ) हैं, जिन के आने का इन्तिजार मुसलमान कई दिन से कर रहे हैं।

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अगरचे वह यहूदी था, मगर इस वक्त उस पर कुछ ऐसा ग़लबा हुआ कि उस ने मुसलमानों को खबरदार करने के लिए ऊंची आवाज से कहा,

ऐ अरब ! ऐ दोपहर को आराम करने वालो ! तुम्हारा मत्लूब या तुम्हारी खुश नसीबी का सामान आ पहुंचा। 

तेज हवा ने उस की आवाज दूर तक पहुंचा दी।

कुबा के अक्सर मुसलमानों ने इस आवाज को सुना। वे मारे खुशी के ! घरों से निकल पड़े, चिल्लाये, मुसलमानो! चलो आफताबे अरब यसरब पर तुलू हो चुका है।

यह आवाज तमाम कबीलों में गूंज गयी।

कुबा के सारे मुसलमान, औरतें, मर्द, लड़के-लड़कियां घरों से निकल कर जल्दी-जल्दी कुबा से बाहर की तरफ दौड़े।

मूसलमानों की देखा-देखी कुफ्फार और यहुदी भी दौड़ने लगे। सैकड़ों लोग भाग-भाग कर कुबा से बाहर पहुंचे।

ये सभी रास्ते के दोनों किनारों पर खड़े हो गये। उन्हों ने देखा कि सामने वाले खजूरों के बांग के आगे ऊंट-सवारों का काफिला आ रहा है। 

सब से आगे एक ऊंटनी है। ऊंटनी पर एक खूबसूरत अरब सवार है। उस के बराबर में एक आदमी झंडा लिए चला आ रहा है। झंडा उस के सर पर लहरा रहा है। एक खूबसूरत और शानदार अरब चादर लिए उन पर साया किये हुए है। 

लोगों ने उस खूबसूरत अरब को पहचान लिया। यह हजरत अबू बक्र (र.अ) सिद्दीक थे। यह छोटा सा इस्लामी काफिला बड़ी शान से आगे बढ़ा चला आ रहा था। जब हुजूर (ﷺ) की सवारी करीब आयी, तो लोगों ने हुजूर (ﷺ) को पहचान लिया। सब ने आप को सलाम किया। 

हुजूर (ﷺ) ने ऊंटनी से उतरने का इरादा किया। तमाम मुसलमानों ने एक जुबान हो कर कहा, हुजूर! हमारी सब की आरजू है कि आप सवार ही रहें।

हुजूर (ﷺ) सवार रहे, सब को सलाम का जवाब दिया।

कुबा के सब से मुअज्जज आदमी ने आप के उंट की नकेल पकड़ ली और बड़े फकर, बड़ी खुशी और बड़े जोश से रवाना हुआ। लोग हुजूर (ﷺ) की सवारी के पीछे-पीछे चले।

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जब आप की सवारी कुबा में दाखिल हुई, तो कुबा की कमसिन और छोटी लड़कियों ने दफ बजा-बजा कर जोश व खरोश से गाना शुरू किया –

हम पर चांद तुलू हुआ है,
सनीयातिल विदा की घाटियों से

हम पर इस वक्त शुक्र करना वाजिब है, 
जब तक कोई अल्लाह से डरने वाला रहे,

ऐ हम में भेजे गये प्यारे नबी, 

आप ऐसा हुक्म लेकर आए हैं
जिसकी इताअत हम पर वाजिब है। 

अगरचे वह दोपहर का वक्त था, धूप बहुत तेज थी, और लू चल रही थी, लेकिन हुजूर (ﷺ) की मुहब्बत में किसी को किसी बात का एहसास न हो रहा था। सब आप के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। मुसलमान मुहब्बत और अक़ीदत के जोश में अल्लाहु अक्बर के नारे भी लगाते जा रहे थे।

इन नारों की गूंज यसरब में भी पहुंची।

यसरब के मुसलमान भी दौड़ पड़े। औरतें, मर्द, बच्चे भाग-भाग कर कुबा की तरफ जाने लगे। कुछ ऊंटों पर सवार हो कर दौड़े, कुछ घोड़ों पर, ज्यादातर तो पैदल ही भागे। फासला सिर्फ दो मील का था। बहुत जल्द ये लोग कुबा में दाखिल हो गये और भाग कर आप की सवारी के जुलूस में जा मिले।

इन लोगों के आने की वजह से जुलूस लम्बा हो गया। इंसानों का समुंदर ! लहरें लेता नजर आने लगा।

हुजूर (ﷺ) की ऊंटनी की नकेल जो सहाबी पकड़े हुए थे, उनका नाम कुलसुम बिन हारिस था। इन का ताल्लुक कबीला बनी नज्जार से था। इस क़बीले में हुजूर (ﷺ) की ननिहाल थी।

यसरब से आने वालों में साद बिन मआज भी थे जो औस कबीले के सरदार थे। हुजूर (ﷺ) की सवारी की शान को देख कर उन्हें ऐसा जोश आया कि तुरन्त घोड़े से उतरकर हुजूर (ﷺ) के ऊंट की नकेल पकड़ ली।

यह जुलुस जब क़ुबा के बीच में पहुंचा तो एक काफ़िर अरब गले में हड्डियों का हार डाले रास्ते के सिरों पर खड़ा नजर आया। उस अरब का चेहरा डरावना था। आँखें सूर्ख और उबल कर बाहर निकल आयी थीं। माथे पर मोटी-मोटी.लकीरें पड़ी हुई थीं, गालों की हड्डियां चिपकी हुई थीं। दाढ़ी अजीब किस्म की थी। 

उस ने हुजूर (ﷺ) को गौर से देखा, आप की सवारी को देखा और सवारी के जुलुस को देखा। जुलूस वालों के जोश को देख कर बड़बड़ाया, और उस ने कहा –

आज यसरब के बुतपरस्तों की हुकूमत खत्म हो गयी, बहुत जल्द इस्लामी हुकूमत का आरंभ होगा। बुत और बुतपरस्तों को जिल्लत से निकाल दिया जाएगा।

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लोगों ने उस के लफ़्ज सुने। मुसलमान सुन कर खुश हुए और गम में डूब गये।

जोश बढ़ता रहा, यहां तक कि क़बीला बनी नज्जार का मुहल्ला शुरू हुआ।

जब कुलसूम का मकान आया, उन्हों ने रुक कर अर्ज किया, ऐ अल्लाह के रसूल (ﷺ) ! आप के खादिम का गरीब खाना यही है। क्या हुजूर (ﷺ) यहां कियाम न फ़रमाएंगे और मुझे खिदमत की सआदत न हासिल होगी?

हुजूर (ﷺ) ने फरमाया, हां, मैं यहीं कियाम करूंगा। ऊंटनी को बिठा दो। 

कुलसूम ने ऊंटनी को इशारा किया। ऊंटनी बैठ गयी।

फौरन ही तमाम ऊँठ बिठाये गये।

पहले हुजूर (ﷺ) उतरे, फिर हजरत अबू बक्र, उन के बाद आमिर, बुरैदा और बुरैदा के क़बीले के लोग उतरे।

हुजूर (ﷺ) कुलसूम के मकान में दाखिल हुए। कुछ मुअज्जज लोग हुजूर (ﷺ) के साथ मकान के अन्दर चले गये। बाकी लोगों को तमाम मुसलमान एक-एक, दो-दो करके ले गये।

जुलूस बिखर गया। थोड़ी देर में कुबा की तमाम गलियां, सुनसान और वीरान नजर आने लगीं। 

हुजूर (ﷺ) कुलसूम के मकान में दाखिल होकर इत्मीनान से एक कमरे में बैठ गये। बैठते ही यसरब और कुबा के मुअज्जज लोग, जो हुजूर (ﷺ) के साथ मकान के अन्दर आ गये थे, निहायत अदब से आ बैठे। 

अब कुलसूम ने जल्दी-जल्दी सत्तू घोल कर पहले हुजूर (ﷺ) को पिलाया, फिर बाकी लोगों को दिया गया। जव सब लोग सत्तू पी चुके, तो साद बिन मुआज (र.अ) ने सब से पहले हुजूर (ﷺ) से अपना तआरुफ़ कराया और फिर तमाम लोगों का तआरुफ कराने लगे।

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हुजूर (ﷺ) ८ रबीउल अव्वल सन १४ नबवी, दोशंबा के दिन कुबा में तशरीफ़ लाये थे। वह तमाम दिन लोगों से मिलने और तआरुफ़ करने कराने में गुजर गया। दूसरे दिन फिर सुबह ही से लोगों के आने का तांता लगा रहा। 

अगरचे कुलसूम (र.अ) का मकान बड़ा था, पर हुजूर (ﷺ) सईद बिन खुसमा के मकान को दारुल-अवाम बना कर उस में मज्लिस फ़रमाने लगे।

लोग सुबह से शाम तक जमा रहते, वाज व नसीहत सुनते, कुरआन शरीफ़ सुन कर याद करते, नमाजें पढ़ते। सारे दिन सईद बिन खुसमा के मकान पर मेला सा लगा रहता।

दूसरे दिन हुजूर (ﷺ) ने बराबर और मुनासिब जमीन देख कर एक मस्जिद की बुनियाद रखी। कुबा वालों ने जल्द-जल्द मस्जिद की तामीर शुरू कर दी।


कुबा में इस्लाम की सबसे पहली मस्जिद

यह सब से पहली मस्जिद थी, जो इस्लाम में बनायी गयी। इस मस्जिद की बुनियाद खुद हुजूर (ﷺ) ने अपने दस्ते मुबारक से रखी। 

चार दिन तक हुजूर (ﷺ) कुबा में तशरीफ़ फ़रमा रहे। चौथे रोज जुमा के दिन १२ रबीउल अव्वल को सुबह की नमाज पढ़ कर हुजूर (ﷺ) ने यसरब (मदीने) के लिए रुखसत का इरादा किया।

कुबा वालों ने हुजूर (ﷺ) के और ठहरने पर इस्रार किया।

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया कि मैं कहीं दूर तो नहीं जा रहा हूं। कुबा यसरब का एक मुहल्ला है। मेरा इरादा यसरब में जिंदगी भर रहने का है।

लोग खामोश हो गये। हजूर (ﷺ) ने हजरत अबू बक्र (र.अ) को तैयारी करने का हुक्म दिया। 

अभी ये तैयारियां हो ही रही थीं कि इसी बीच हजरत अली (र.अ) दिखायी दे गये।


कुबा में हजरत अली (र.अ) से मुलाकात

हजरत अली (र.अ) के पैरों पर गर्द चढ़ी हुई थी। पैरों में कुछ सूजन थी। वह धीरे-धीरे आ रहे थे। उन की चाल बता रही थी कि वह थके हुए हैं। 

हुजूर (ﷺ) उन्हें देखते ही बढ़े। हजरत अली ने आप (ﷺ) को अपनी तरफ़ बढ़ता देख कर अपनी चाल कुछ, तेज कर दी।

आप ने हुजूर (ﷺ) के सामने पहुंच कर सलाम किया।

हुजूर (ﷺ) ने सलाम का जवाब देकर कहा, खूब आए अली ! कहो, अमानतें अमानत वालों को सुपुर्द कर आए। 

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अगरचे हुजूर (ﷺ) ने देख लिया था कि हजरत अली थके हुए हैं। उनकी हालत बता रही थी कि वे दूर से सफ़र किये चले आ रहे हैं, उन्हें आराम करने की जरूरत है, लेकिन हुजूर (ﷺ) को अमानतों की इतनी फ़िक्र थी कि आप ने हजरत अली की न हालत मालूम की, न सफ़र के वाकीआत मालूम किये, बल्कि सब से पहले अमानतों के बारे में पूछा। 

हजरत अली (र.अ) ने बताया, जी हां, मैंने तमाम अमानतें अमानत वालों के सुपुर्द कर दी हैं।

बहुत खूब किया ! तुम मक्का से कब चले थे? 

आज बारह दिन हुए। 

हजूर (ﷺ) ने हजरत अली को हैरत से देखा और बोले- 

बारह दिन हुए, गोया तुम भी उस दिन चले, जिस दिन मैं गारे सौर से चला था।

इस हिसाब से तो यही मालूम होता है, लेकिन हम एक दूसरे से मिल क्यों न सके?

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, इस लिए कि मैं सीधे रास्ते से नहीं आया, बल्कि अनजाने रास्ते से चला और तुम सीधे रास्ते से आए, इस लिए रास्ते में मुलाकात न हो सकी। क्या तुम पैदल आये हो ?

जी हां, मैं पैदल आया हूं। रात को सफ़र करता था और दिन के वक्त पहचाने जाने और गिरफ्तार होने के डर से रेत के टीलों में छिपा रहता था। 

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, काश, तुम पैदल न चलते और थोड़े दिन मक्का में रह कर इन्तिजार करते और किसी काफिले के साथ आ जाते।

असल में मुझ से सब्र न हो सका। अमानते तक्सीम करते ही चल पड़ा, हजरत अली (ﷺ) ने कहा।

हुजूर (ﷺ) ने पूछा, मेरे चले आने पर कुफ्फ़ारे मक्का ने मुसलमानों पर या हजरत अबू बक्र सिद्दीक (र.अ) के घर वालों पर सख्तियां तो नहीं की?

सख्तियां करना तो उन की आदत में शामिल है, हजरत अली ने जवाब दिया। आम मुसलमानों पर उनकी सख्तियां बहुत हैं, अल-बत्ता हुजूर (ﷺ) और हजरत अबू बक्र (र.अ) के रिश्तेदारों पर ज्यादा सख्तियों की जुर्रात नहीं होती, लेकिन निगरानी बहुत की जा रही है।

अगर अल्लाह ने चाहा, तो अब बहुत जल्द उन की हुकुमत और उनके जुल्म व सितम का खात्मा हो जायेगा। अल्लाह जालिमों को ज्यादा ढील नहीं देता। अली ! तुम मेरी ऊंटनी पर सवार हो जाओ, हुजूर (ﷺ) ने फरमाया। 

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हजरत अबू बक्र (र.अ) ने कहा, हुजूर (ﷺ) ! यह मेरे ऊंट पर सवार हो जाएंगे। 

हुजूर सल्ल० ने पूछा, और तुम ?

हजरत अबू बक्र (र.अ) ने जवाब दिया, मैं आप के साए में पैदल चलूंगा। 

आमिर बोल पड़े, मालिक ! यह कैसे होगा? आप मेरे आका हो कर पैदल चलें और मैं गुलाम हो कर ऊँट पर सवार हो कर चलूं। आप सवार हो जाएं, मैं पैदल चलूँगा। फासला ही कितना है, सिर्फ दो मील ही तो चलना है।

अगरचे हजरत अबू बक्र (र.अ) चाहते थे कि वह सवार हो कर न चलें, पर हजरत आमिर ने उन्हें इतना मजबूर किया कि उन्हें ऊंट पर सवार होना पड़ा। उन के पीछे हजरत अली सवार हुए।

हुजूर (ﷺ) पहले ही अपनी ऊंटनी पर सवार अब्दुल्लाह, बुरैदा और उन के साथी ऊंटों पर सवार हो गये।

आमिर ने हुजूर (ﷺ) के ऊंट की नकेल पकड़ी और चल पड़े। 

कुबा वालों ने जिस जोरदार अन्दाज में इस काफ़िले का इन्तिजार किया था, उसी तरह सब ने आ कर रुख्सत भी किया। हुजूर (ﷺ) की सवारी निहायत शान से रवाना हुई।


हुजूर (ﷺ) यसरब (मदीने) में 

हुजूर (ﷺ) के आने की खबर यसरब में पहले ही पहुंच गयी थी। यसरब वाले कुबा के रास्ते पर खड़े आफ़ताबे अरब के आने का इन्तिजार कर रहे थे। इस भीड़ में औरतें, मर्द, लड़के और लड़कियां सभी थे। 

सब के सब बहुत खुश थे।

बच्चे उछल-कूद रहे थे, रेत के टीलों पर दौड़-दौड़ कर चढ़ रहे थे। 

लड़कियां खुशी के गीत (नात) गा रही थीं।

जब सूरज कुछ ऊंचा हो गया, तो लड़कों ने दूर से ऊँटो को आते देखा। सब से अगले ऊंट पर झंडा लहरा रहा था।

अगरचे बच्चे ना-समझ थे, मगर उन्होंने दूर ही से ऊंटों को देख कर समझ लिया कि हुजूर (ﷺ) तशरीफ़ ला रहे हैं। इस लिए शोर मचाया, ‘कुबा से सूरज निकल आया।’

उन के गुल मचाते ही लोगों की नजरें कुबा की तरफ उठीं। वहां से ऊंटों की कतारें आती नजर आ रही थीं।

तमाम लोग सिमट कर रास्ते के दोनों तरफ़ एक लाइन में खड़े हो गए। ऊँट अब इतने करीब आ गये थे कि उन पर सवार लोगों की शक्लें नजर आने लगी। 

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यह सवारी हुजूर (ﷺ) की थी। आप के सर पर इस्लामी झंडा लहरा रहा था । बराबर में बुरैदा झंडा उठाये आ रहे थे और तमाम ऊंट एक के पीछे एक लगे आ रहे थे।

लोगों ने आप को दूर से देखते ही अल्लाहु अकबर के जोरदार नारे लगाने शुरू किये। इन नारों से यसरब की वादी गूंज उठी।

यसरब के यहूदियों को भी पता चला और वे भी हुजूर (ﷺ) की सवारी की शान देखने के लिए बाहर आ गये। हजारों आदमियों का मज्मा आ गया।

थोड़ी ही देर में आप की सवारी करीब आ गयी।

जब हुजूर (ﷺ) की सवारी सामने आ गयी, तो लोगों ने इस जोर से अल्लाहु अक्बर का नारा लगाया कि जमीन हिल गयी। वादी गूंज उठी।

हुजूर (ﷺ) ने यहां भी उतरने का इरादा किया, लेकिन हजरत साद ने बढ़ कर हुजूर (ﷺ) को रोकते हुए कहा, ऐ शहंशाहे दुनिया व दीं! आप को उतरने की जरूरत नहीं है। हम सब खादिमों की तमन्ना है कि हुजूर (ﷺ) पहले की तरह सवार हो कर तशरीफ़ ले चलें।

मजबूर हो कर आप सवारी पर बैठे ही रहे। 

हजरत साद (र.अ) ने ऊंटनी की नकेल पकड़ी और आगे चलना चाहा।

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, ऐ यसरब के हाकिम ! मैं यह गवारा नहीं कर सकता कि आप मेरी ऊंटनी की नकेल पकड़ कर चलें। इस से डर है कि कहीं मेरे दिल में घमंड पैदा हो। मैं वही हूँ जो पहले था।

हजरत साद (र.अ) ने फ़रमाया, हुजूर (ﷺ) ! अब आप अपने को वह न समझे, जो मक्के वालों ने समझने पर मजबूर किया। यह तो हमारी खुशकिस्मती है कि हम आपके ऊंट की नकेल पकड़ पाये हैं।

हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, साद ! यह मेरी तमन्ना है कि तुम अपने ऊंट पर सवार हो कर मेरे साथ चलो।

हजरत साद (र.अ) ने कहा, इस में भी मेरी सआदत है। मैं हजूर (ﷺ) के हर हुक्म की तामील करूंगा।

हजरत साद भी ऊंट पर सवार हो गये। अब आप की सवारी बढ़ी। मुसलमान नारे लगाते हए साथ चले।

हुजूर (ﷺ) की सवारी गोया अब जुलूस के साथ चली। जूलस यसरब में दाखिल हुआ। जो मर्द या औरतें यसरब में रह गये थे, उन में से कुछ तो रास्तों के किनारों पर खड़े हो कर, कुछ मकानों की छतों पर चढ़ कर हुजूर (ﷺ) के आने का शानदार नजारा करने लगे।

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अगरचे यह दोपहर का वक्त था, धूप में तेजी थी, गरम हवा के झोंके चलने शुरू हो गये थे, लोगों को पसीने आने लगे थे, पर वे इतने जोश में थे कि उनमें से किसी को भी गर्मी की परवाह न थी। सब बड़े इत्मीनान से जुलूस में चल रहे थे।

जिस वक्त यह काफिला मुहल्ला बनु सालिम में पहुंचा, तो नमाज का वक्त आ गया। चूंकि आज जूमा का दिन है। जुमा की नमाज जुहर के वक्त में पढ़ी जाती है, इस लिए हुजूर (ﷺ) ने आमिर को सवारी रोकने का हुक्म दिया।

आमिर खड़े हो गये, ऊंट रुक गये और जुलूस ठहर गया।

हुजूर (ﷺ) उतरे। हुजूर के उतरते ही सब लोग उतर पड़े। सब एक बड़े मैदान में जमा हो गये। लोग दौड़ कर पानी लाये। मुसलमानों ने वुज़ किया। सब ने मैदान में बगैर किसी फ़र्श और सायबान के जलती धूप और तपते मैदान में खड़े हो कर नमाज पढ़ी। नमाज से पहले हुजूर (ﷺ) ने खुत्बा भी पढ़ा।

नमाज पढ़ कर हुजूर (ﷺ) ऊंटनी पर सवार हुए।

आप के सवार होते ही हजरत साद, हजरत अबू बक्र, हजरत बुरैदा और उन के साथी ऊंटों पर सवार हो गये।


ऊंटनी को अल्लाह का हुक्म

अभी हुजूर (ﷺ) चले ही थे कि मुहल्ला बनू सालिम के मुअज्जज लोग आ गये और आप की ऊंटनी की नकेल पकड़ कर मुहल्ले के अन्दर चलने लगे। चूंकि हर मुहल्ला और हर क़बीले वाले यह चाहते थे कि हुजूर (ﷺ) उनके यहां ठहरें, इस लिए अक्सर कबीले के लोग आगे बढे और बहुत से लोग ऊंटनी की नकेल पकड़ने लगे। इस से बहस व तकरार होने लगी। हर आदमी अपना हक साबित करने की कोशिश कर रहा था।

हुजूर (ﷺ) ने यह हालत देख कर फ़रमाया, मुसलमानो ! हट जाओ, ऊंटनी की नकेल.छोड़ दो। उसे खुदा, की तरफ़ से हुक्म मिला है। जिस जगह यह खुद बैठ जाएगी, मैं उसी मुहल्ले में कियाम करूंगा।

लोग या तो बहस व तकरार कर रहे थे या आप का हुक्म सुन कर हट गये। 

ऊंटनी रवाना हुई। उस के पीछे तमाम लोग चले। लोग जुलूस में चले।

ऊंटनी चलते-चलते बनु बयाजा के मुहल्ले में पहुंची। उस मुहल्ले के ! सरदार जियाद और फ़र्वः थे। फौरन दोनों ने बढ़ कर ऊंटनी की नकेल पकड़ ली।

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हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, उसे छोड़ दो, उसे हुक्म मिला हुआ है। 

दोनों ने उसे छोड़ दिया और ऊंटनी फिर आगे बढ़ने लगी।

ऊंटनी बराबर चल रही थी, यहां तक कि मुहल्ला बनू माइदा में पहुंची। उस मुहल्ले के सरदार साद बिन उबादा और मंजिर बिन अम्र थे।

दोनों खुश हो कर आगे बढ़े और ऊंटनी की नकेल पकड़ ली। हुजूर (ﷺ) ने फ़रमाया, इसे छोड़ दो, इसे हुक्म मिला हुआ है। साद और मुंजिर अलग हट गए। 

ऊंटनी फिर चलने लगी। अब मुहल्ला बनुल हारिस में पहुंची।

इस मुहल्ले के मुअज्जज लोग साद बिन रवीअ और अब्दुल्लाह बिन रुवाहा थे। जब उन्होंने ऊंटनी की नकेल पकड़नी चाही, तो उन से भी कहा गया कि इसे छोड़ दो, इसे हुक्म मिला हुआ है।

वे भी नकेल छोड़ कर अलग हो गए। 

ऊंटनी फिर चलने लगी और मुहल्ला अबी बिन नज्जार में दाखिल हुई। 

चूंकि इस मुहल्ले के लोगों में हुजूर (ﷺ) के दादा अब्दुल मुत्तलिब की ननिहाल थी, इस लिए इन लोगों को बड़ा दावा और ख्याल था कि आप रिश्तेदारी का ख्याल कर के उन के मुहल्ले में ठहरेंगे। इस लिए सुलैत बिन कैस और उसरा बिन अबी खारिजा ने बढ़ कर ऊंटनी की नकेल पकड़ ली, लेकिन हुजूर (ﷺ) ने उन से भी वही फ़रमाया कि नकेल छोड दो। इसे अल्लाह की ओर से हुक्म मिला हुआ है।

फिर वे दोनों भी नकेल छोड़ कर अलग हो गए।

ऊंटनी फिर रवाना हुई और कुछ दूर चल कर मुहल्ला बनी मलिक बिन नज्जार में पहुंच कर एक गैर आबाद और बंजर जमीन पर आ कर खड़ी हो गयी। कुछ देर खड़ी रह कर बैठ गयी, लेकिन बैठते ही फिर उठी और फिर चलने लगी कि कुछ दूर चल कर खुद ही वापस लौटी और ठीक उसी जगह जहां पहले बैठी थी, फिर आ कर बैठ गयी।

इस बार ऊंटनी ने बैठ कर झुरझुरी ली। गरदन नीचे डाल दी और दुम हिलानी शुरू की, मतलब यह था कि मंजिल आ गयी, अब उतरिए। 

चुनांचे हुजूर (ﷺ) उतरे। फिर उतरते ही सब लोग जल्दी-जल्दी उतर पड़े।

इस बंजर जमीन के करीब हजरत अबू अय्यूब अंसारी (र.अ) का मकान था। 

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उन्होंने सपने में भी यह न सोचा होगा कि हुजूर (ﷺ) उनके मकान के करीब आ कर ठहरेंगे और उन्हें हुजूर (ﷺ) की खिदमत की सआदत नसीब होगी।

चुनांचे जब उन्होंने देखा कि ऊंटनी उन के मकान के करीब आ कर बैठ गयी और हुजूर (ﷺ) ऊंटनी से नीचे उतर आए, तो उन्होंने बढ़ कर हुजूर (ﷺ) से अर्ज किया, ऐ अल्लाह के रसूल (ﷺ) ! इस बंजर जमीन के करीब मेरा गरीबखाना है। मैं गरीब आदमी हूं। क्या हुजूर (ﷺ) मुझे खिदमत का मौका देंगे?

आप ने मुस्करा कर फ़रमाया, गरीबी और अमीरी की दुनियादारों की नजरो में कोई कीमत होगी, दीन वालों के लिए नहीं। मुसलमान गरीब हों या अमीर, सब भाई-भाई हैं, तुम भी भाई हो, मैं तुम्हारे ही मकान में ठहरूंगा।

हजरत अबू अय्यूब अंसारी मारे खुशी के फूले नहीं समाये। ख़ुशी के आंसू आखों में आ गये। आप ने बढ़ कर जल्दी-जल्दी हुजूर (ﷺ) का सामान उठाया। खुशी-खुशी अपने मकान में ले गए।

हुजूर (ﷺ) तो अबू अय्यूब अन्सारी के यहां ठहरे और दूसरे मुसलमानों को वहीं के दूसरे मुसलमानों ने अपना मेहमान बना लिया।

To be continued …

इंशा अल्लाह सीरीज का अगला हिस्सा कल पोस्ट किया जायेगा …
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