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मदीना में मुनाफिक़ीन का जुहूर

मुनाफिक उस शख्स को कहते हैं जो जबान से अपने आप को मुसलमान जाहिर करे, मगर दिल में कुफ्र छुपाए रखे, जब मुसलमान हिजरत कर के मदीना आ गए तो लोगों के ईमान कबूल करने की वजह से इस्लाम तेजी से फैलने लगा और मुसलमानों को ताक़त व कुव्वत हासिल होने लगी,तो इस्लाम और मुसलमानों से दुश्मनी रखने वाली मुनाफिकीन की जमात उभर कर सामने आ गई, जो मुसलमानों के ताकत व गलबे और अपने जाती नफे के लिये मुसलमानों के सामने अपने ईमान का इजहार करते, मगर जब अपने काफिर दोस्तों से मिलते, तो कहते के हम तो तुम्हारे ही साथ हैं. मुसलमानों को धोका देने और उनका मजाक उड़ाने के लिये उन के पास जाते हैं, उनका सरदार अब्दुल्लाह बिन उबइ था, जिस को मदीने का बादशाह बना कर ताज पोशी की तैयारियाँ की जा रही थीं, मगर हुजूर (ﷺ) के तशरीफ लाते ही अहले मदीना ने आप (ﷺ) को अपना सरदार और रसूल तस्लीमकर लिया और उस की बादशाहत खतरे में पड़ गई. इस लिये उस के दिल में आप (ﷺ) और मुसलमानों के खिलाफ दुश्मनी, हसद और नफरत पैदा हो गई।

इस के बावजूद हुजूर (ﷺ) उस के साथ हुस्ने सुलूक करते रहे, जिस के नतीजे में उस के बेटे अब्दुल्लाह (र.अ) ने ईमान कबूल कर लिया।

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