सिरतून नबी (ﷺ) सीरीज | Part 10

Seerat un Nabi (ﷺ) Series: Part 10

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नजाशी का दरबार

सुबह के वक़्त मक्का के कुफ्फार को मालूम हुआ कि कुछ मुसलमान हिजरत कर के हब्शा की ओर चले गये हैं। यह एक नयी बात थी। इस से मक्का के काफ़िरों में हलचल मच गयी। उन्हें ख्याल हुआ कि मुसलमान हब्शा में जा कर हमारे माबूदों की बुराइयां बयान करेंगे। इस से उन के मजहब की बेहद तौहीन होगी, वे सब लोग एक जगह जमा हुए और अगले प्रोग्राम पर मश्विरा करना शुरू किया।

तै हुआ कि साठ-सत्तर बहादुर जवानों को मुहाजिरों का पीछा करने के लिए रवाना किया जाए। अगर मुहाजिर वापस आने पर तैयार हो जाएं, तो ठीक है, वरना सब को क़त्ल कर डाला जाए। सत्तर आदमी भेज दिये गये। ये लोग ऊंटों पर सवार होकर तेजी से चले। लेकिन जब जद्दा पहुंचे, तो मालूम हुआ कि अब हब्शा जाने वाला कोई जहाज नहीं है। जो जहाज बन्दरगाह पर खड़ा था वह मुहाजिरों को ले कर जा चुका है। 

कुफ्फारे मक्का को बड़ा गुस्सा आया, पर वे कर ही क्या सकते थे?

मूहाजिर उन की पकड़ से बाहर हो गये थे। यह गुस्सा अब उन मुसलमानों पर और ज्यादा निकलने लगा, जो मक्के में मौजूद थे। उन्हों ने अब उन की जबरदस्त निगरानी शुरू कर दी और उन पर जुल्म की चक्की भी तेज चला दी। 

दर्द भरे जुल्मो सितम से मुसलमान इतने तंग आ गये कि उन का मक्का मुकर्रमा में सांस लेना भी दूभर हो गया, इस लिए तंग आ कर चुपके चुपके उन्होंने भी खुफ़िया तौर पर हिजरत शुरू कर दी। दो-दो, चार-चार करके रोजाना रात को छिप कर निकल जाते और जद्दा में पहुंच कर जहाजों के इंतिजार में छिपे रहते और जब कोई जहाज जाने लगता, उस पर बैठ कर हब्शा रवाना हो जाते।

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कुफ्फारे मक्का के जुल्मों से तंग आ कर हजरत जाफ़र बिन अबू तालिब ने भी हिजरत की और वह भी अपने मुसलमान भाइयों के पास हब्शा पहुंच गये। इस तरह सत्तर-अस्सी मुसलमान हिजरत करके हब्शा में जा पहुंचे और वे निहायत इत्मीनान से जिंदगी बसर करने लगे।

दुश्मनों को जब मालूम हुआ कि मुसलमान हब्शा में खुशहाली की जिंदगी जी रहे हैं, तो उन के सीने पर सांप लोट गया, उन्हों ने फौरन मज्लिसे शूरा बुलायी। सभी बड़े लोग जमा हो गये।

जोरदार तकरीरें हुई। इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ उगला गया। आखिर में यह बात ते पायी कि नजाशी के हुजूर में कीमती तोहफ़े ले कर वफ्द हाजिर हो, जो बादशाह के दरबारियों को हमवार कर के मुसलंमानों की वापसी की मांग कराये।

मुहाजिरीन मुसलमानो को गुलाम बनाने की साजिश 

मक्का के कुरैश और हब्शा के बादशाह नजाशी के बीच पहले तिजारती ताल्लुकात थे। इस लिए उन्हें पूरा यकीन था कि हब्शा का शाह इन बेकस व बेचारे मुसलमानों को उन के वफ्द के साथ भेज देगा। वपद तय्यार किया गया। अम्र बिन आस और अब्दुल्लाह बिन रबीआ रजि० को वफ्द का सरदार बनाया गया और कीमती तोहफ़े और सामान देकर उन्हें रवाना कर दिया गया। 

यह वफ्द बड़ी शान के साथ जद्दा की ओर रवाना हुआ। जद्दा से जहाज में बैठ कर हब्शा जा पहुंचा। चूंकि शानदार वपद था, इस लिए पूरे हब्शा को इस की खबर हो गयी। मजलूम मुसलमानों को मालूम हआ तो वह घबरा गये और उन्हें डर हुआ कि कहीं नजाशी उन को वपस जाने पर मजबूर न करे। 

उन्हों ने तै कर लिया कि हब्शा के बादशाह ने अगर हमें वफ्द के सुपुर्द किया, तो हम किसी और तरफ़ निकल जाएंगे, लेकिन मक्का वापस न जाएंगे। कुरैश के वफ्द ने दरबारियों को तोहफ़े-तहाइफ़ देकर इस बात पर तैयार कर लिया कि देश छोड़ कर आने वाले मुसलमानों को वापस मक्का जाने पर आमादा करें। उन्हों ने वायदा भी कर लिया। इस तरह नजाशी के दरबार में वफ्द की पहंच हो गयी। नजाशी ने शानदार तरीके से दरबार सजाया।

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जब वफ्द दरबार में पहुंचा तो दरबार की सजावट देख कर हैरान रह गया। अम्र बिन आस रजि० और अब्दुल्लाह बिन रबीआ रजि० ने बड़े अदब से झुक कर सलाम किया। नजाशी के सामने सलाम के लिए झुक गये। सलाम कर के तोहफे पेश किये।

नजाशी ने पूछा, अरबो ! तुम मेरे दरबार में किस लिए आये हो ? और क्या चाहते हो ?

अम्र बिन आस ने कहा, हमारी कौम ने एक जुट हो कर हमें आप के हुजूर में इस लिए भेजा है कि हुजूर से अर्ज करें कि हमारे शहर में एक जादूगर पैदा हुआ है, उस का नाम मुहम्मद (ﷺ) है। उस ने एक नया मजहब ईजाद किया है, ऐसा मजहब, जो किसी और मजहब से मेल नहीं खाता, बिल्कुल नया मजहब। हमारे शहर के कुछ नादान लोगों ने इसे कुबूल कर लिया है। 

हम ने जब इन पर जोर दिया कि इस नये मजहब को छोड़ दें, तो वे बेवकूफ़ वहां से भाग कर हुजूर की हुकूमत में आ गये हैं। हम उन को वापस ले जाने के लिए हुजूर के दरबार में हाजिर हुए हैं। नजाशी को उन की बातों को सुन कर बड़ा ताज्जुब हुआ और उस ने कहा, नया मजहब ईजाद किया है, लोग जादू के शिकार हो गये हैं। यह समझ में आने वाली बात नहीं है।


अम्र बिन आस ने कहा, जनाब ! हम को खुद अफ़सोस है। मुहम्मद (ﷺ) ऐसा जादूगर है। जो उस से एक बार बात कर लेता है, वह उस का आशिक हो जाता है। उस ने हमारी कोम में एक नया फ़ितना पैदा कर दिया है, नया मजहब ईजाद किया है। हुजूर उन लोगों को बुला कर मालूम कर लें।

नजाशी ने कहा, मैं जरूर बुलाऊंगा। मुझे उन के देखने का शौक है। वे अपने आप को क्या बतलाते हैं ?

अम्र बोला, वे खुद को मुसलमान कहते है। भला मुसलमान भी किसी मजहब का नाम हो सकता है ?

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अब वजीरे आजम उठा, यह बूढ़ा बादमी था। उस ने कहा, हुजूर! ये मुसलमान नये मजहब के मानने वाले हैं। मैं इन से मिल चुका हु। वे अजीब अकीदा रखते हैं, न यहूदी, न ईसाई, न बुतपरस्त। मुझे डर है कि कहीं अपने नये मजहब की तब्लीग मुल्क हब्शा में न कर दें। इसलिए मेरे ख्याल में उन तमाम लोगों को इस वफ्द के साथ रवाना कर दीजिए और अपने मूल्क और अपनी कौम को उन की शरारतों से बचाइय।

नजाशी ने कहा, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। अच्छा मुसलमानों को बुलायो। वजीर ने करमल की तरफ इशारा किया। वह दरबार से बाहर आया, सिपाहियों को साथ लिया और मुसलमानों की ओर चल पड़ा। 

मुसलमानो को पहले ही डर था। वह सहम रहे थे कि अब क्या होता है। मक्का में उन पर इतनी सख्तियां हुई थीं कि वे वहां जाने पर मौत को तर्जीह देते थे। उन्हों ने आपस में तै कर लिया था कि मर जाएंगे, मगर यहां से हरगिज़ न जाएंगे। 

जब ईसाई सिपहसालार उन की तलबी के लिए आया, तो सब लोग उस के दरबार में पहुंचे, सब ने बादशाह को सलाम किया। नजाशी ने उन को बैठने के लिए कुर्सियां डलवायीं। जब सब बैठ गये, तो नजाशी ने पूछा, क्या तुम ने कोई नया मजहब ईजाद किया है, जो ईसाइयत और बुतपरस्ती दोनों के खिलाफ़ है ? हजरत जाफ़र जवाब देने के लिए खड़े हए।

आप ने फ़रमाया, ऐ बादशाह ! ऐ लोगो! हम लोग जाहिल परस्त थे, बुतों को पूजते थे, मुरदार खाते थे, हराम-हलाल की कोई तमीज न थी, बदकारियां करते थे, पड़ोसियों को सताते थे, भाई-भाई पर जुल्म करते थे और हर मजबूत हर कमजोर को पीस डालता था, गोया दुनिया भर के ऐब हम में थे। 

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खुदा ने हम पर रहम किया और अपने प्यारे नबी को हम पर भेजा। उस नबी की शराफत, दयानत और सदाकत को हम खूब जानते थे। उसने हम को इस्लाम की दावत दी। हमें सिखाया कि हम पत्थरों को पूजना छोड़ दें, हमेशा सच बोलें, खूरेजी न करें, यतीमों का माल न खाएं, पड़ोसियों को आराम दें। नमाज पढ़ें, रोजे रखें, जकात दें। हम ने उस की दावत मानी, खुदा पर ईमान लाये, शरारत और बुतपरस्ती छोड़ दी, बदकारियों से तौबा की। इस जुर्म में हमारी कौम हमारी दुश्मन हो गयी और हम पर सख्तियां करने लगी। हम पर ऐसे-ऐसे जुल्म किये गये, जिन को सुन कर रौंगटे खड़े हो जाते हैं। हमें मजबूर किया गया कि हम फिर तबाही के गढ़े में गिर पड़ें। हमने तंग आ कर पनाह ली। 

अब ये हम पर फिर जुल्म ब सितम करने के लिये यहां से ले जाना चाहते। 

नजाशी और तमाम दरबारी पूरी तवज्जोह से हजरत जाफ़र रजि० की बातें सुनते रहे। जब खामोश हए तो नजाशी ने कहा, जो बातें तुम ने बयान की हैं, वे तो कुछ बुरी नहीं।

हजरत जाफर रजि० ने कहा, आप इन से पूछिए कि क्या हम इन के गुलाम है? 

अब मुसलमानों की बात नजाशी के वास्ते से अम्र बिन आस से शुरू हुई।

अम्र ने जवाब दिया, इस में से एक भी गुलाम नहीं है, सब के सब आजाद हैं।

हज़रत जाफ़र रजि० ने फिर पूछा, हममें से किसी ने किसी का खून किया है?

तुम्हारा दामन इस इल्जाम से भी पाक है। जवाब मिला। 

हम में से किसी ने किसी का माल चुराया है ?

नहीं। 

हम में से कोई आप का या आप की कौम के किसी आदमी का कर्ज खाये हुए है?

यह बात भी नहीं है। 

क्या तुम्हारी दिली मंशा यह नहीं है कि हम तुम्हारे मजहब में लौट आएं?

बेशक, हम यही चाहते हैं ।

क्या तुम बुतों को नहीं पूजते हो?

हमारे बाप-दादा का मजहब यही हैं। तुम्हारे बाप-दादों का भी यही मजहब था, अब तुम ने नया दीन अपना लिया है।

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नजाशी के दरबार में कुरआन की तिलावत 

जब नजाशी ने देखा कि वात बढ़ती जा रही है, तो दोनों को खामोश रहने का हुक्म दिया। दोनों चुप हो गये। 

नजाशी ने हजरत जाफ़र रजि० से कहा, तुम्हारे नबी पर कोई किताब भी नाजिल हुई है ?

हजरत जाफ़र रजि० ने जवाब दिया, हां हमारे मोहतरम नबी पर कुरआन मजीद नाजिल हो रहा है ?

उस ने फिर पूछा, तुम्हें कुरआन का कोई हिस्सा याद है ? याद है। तो सुनाओ।

तमाम मुसलमान हाथ बांध कर खड़े हो गये। हजरत जाफ़र रजि० ने सूरह मरयम की तिलावत शुरू की। आप ने बड़ी अच्छी आवाज में पढ़ना शुरू किया, जिस में कहा गया था –

“तेरे परवरदिगार की रहमत बन्दा जकरिया को याद करती है। जिस वक्त उस ने अपने पालनहार को धीरे से पुकारा। उस ने कहा, ऐ परवरदिगार ! मेरी हड्डियां सुस्त हो गई हैं, मेरे सर ने बुढ़ापे का शोला मारा है और मेरे परवरदिगार ! मैं तुझे पुकारने में बद-नसीब न था और मैं डरता हूँ कि मेरे कोई वारिस नहीं है। मेरी औरत बांझ है। ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे औलाद बक्श, ताकि मेरा वारिस हो और ऐ मेरे परवरदिगार ! उसे पसन्दीदा कर। हजरत जाफ़र रजि० इतनी अच्छी आवाज़ में कुरआन मजीद पढ़ रहे थे कि तमाम दरबार उस प्यारी आवाज़ से भर गया। नजाशी, वजीर, दरबारी सब सर झुकाये बैठे बड़ी तवज्जोह से सुन रहे थे। 

नजाशी की शान कह रही थी कि वह बहुत कुछ ज़ब्त कर रहा है, उस से न रहा गया और बेकाबू हो कर उस के आंसू जारी हो गये।

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हजरत जाफ़र रजि० कुछ और आयतें पढ़ कर खामोश हो गये। देर तक आप की आवाज गूंजती रही। कुछ देर बाद नजाशी ने सर उठाया, रेशमी रूमाल से आंसू पोंछा और कहा खुदा की कसम ! इस कलाम से सच्चाई की बू आती है। यह ऐसा ही कलाम मालूम होता है, जैसा कि तोरात में है। मैं इकरार करता हूं कि यह कलाम इंसान का कलाम नहीं है, बल्कि यह खुदा का कलाम है।

नजाशी के इन लफ़्ज़ों से जहां मुसलमान इसलिए खुश हुए कि उन्हें उम्मीद हुई कि बादशाह नजाशी उन्हें कुरैश के वफ्द के हवाले न करेगा, वफ्द वालों को यह डर हुआ कि शायद वे यहां से नाकाम हो जाएंगे।

अम्र विन आस ने नजाशी से कहा, हुजूर ! ग़ज़ब तो यही है कि जब वह कलाम पढ़ते हैं, जो मुहम्मद (सल्ल.) उन को लिख कर देता है, तो सुनने वाले पर बड़ा असर होता है। यह कलाम खुदा का कलाम नहीं है, बल्कि मुहम्मद का कलाम है।

हज़रत जाफ़र रजि० को अम्र की इस बेहुदा बात पर बड़ा गुस्सा आया और गुस्से की वजह यह थी कि अम्र अच्छी तरह जानता था कि हुजूर सल्ल अनपढ़ हैं, लेकिन नजाशी को धोखा देने के लिए अब कह रहा था कि वह लिख कर देते हैं। 

उन्हों ने जोश में आकर कहा, अम्र ! सच बोलो, क्या तुम नहीं जानते कि हुजूर (सल्ल.) उम्मी (अनपढ़) हैं।

नजाशी भी बोल पड़ा, लगता है, तुम झूठ बोलते हो। जब तुम इस बात के कायल हो कि वह लिखना-पढ़ना नहीं जानते, तो एक अनपढ़ का कलाम इतना जोरदार हो सकता है ? तास्सुब ने तुम को अन्धा कर दिया है। तुम सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनते हो।

अम्र डर गया। उसे डर हुआ कि शायद नजाशी उसे और उस के साथियों को दरबार से न निकलवा दे। उस ने फौरन कहा, एक बात कहने की रह गयी है।

नजाशी ने पूछा, वह क्या है ? 

अम्र ने कहा, ये लोग हज़रत ईसा अलैहिसलाम के बारे में बुरी-बुरी बातें कहते हैं। उन्हें खुदा का बेटा नहीं मानते।

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एक पादरी ने खड़े होकर अम्र के इन लफ्जों की ताईद की और कहा, यह बात बिल्कुल सही है। ये नये मजहब के मानने वाले खुदावन्द (हजरत ईसा) की शान में गुस्ताखी की बातें करते हैं।

यह सुन कर नजाशी को गुस्सा आ गया। उस ने हजरत जाफ़र रजि० से कहा कि क्या यह सही है कि तुम हजरत ईसा अलैहिसलाम की शान में गुस्ताखी करते थे? 

हजरत जाफ़र रजि० ने पूरी हिम्मत से काम लेते हए जवाब दिया, यह बात भी ग़लत है। हम ईसा अलैहिस्सलाम को नबी मानते हैं और उन की शान में वही कहते हैं, जो खुदा ने उन की शान में फ़रमाया है।

क्या है ? नजाशी ने कहा।

हजरत जाफ़र रजि० ने कहा, अल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया, “वह अल्लाह के बन्दे और उस के रसूल हैं और उस का हुक्म हैं, उन को मरयम की तरफ़ डाल दिया और रूह की तरफ़ से हैं।” 

नजाशी ने कहा, खुदा की कसम ! इंजील में भी यही लिखा है। तुम सच कहते हो।

अब अम्र को यकीन.हो गया कि नजाशी मुसलमानों को उन के हवाले न करेगा। उस ने कहा, बादशाह ! हमारे यह आदमी हैं, जो हम से, अपनी कौम से और अपने मुल्क और अपने माबूदों से बागी होकर भाग आए हैं, इसलिए आप इन को हमारे हवाले कर दें, यही बेहतर है।

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कुरैशी वफ्द का निराश होकर लौटना 

नजाशी को जोश आ गया, बोला, हरगिज़ नहीं, उन्हें मेरे मुल्क से कोई ताक़त नहीं ले जा सकती। तुम मुझको लालच देने के लिए ये तोहफ़े लाये हो,

इन(तोहफों) को वापस ले जाओ और कुरैश के सरदारों से कह दो कि हब्शा का बादशाह एक मुसलमान को भी तुम्हें वापस न.देगा और ऐ मुसलमानो! तूम आजाद हो, पूरी बे-फ़िक्री से तुम यहां रहो। जब तक मैं जिंदा हूँ, कोई तुम्हारा बाल बाका नहीं कर सकता।

हजरत जाफ़र रजि० और तमाम मुसलमानों ने नजाशी का शुक्रिया अदा किया। वह नजाशी के दरबार से विदा होकर अपने ठहरने की जगहों पर चले गये।

कुरैशी वफ्द तमाम तोहफ़ों को लेकर बड़ी बद-दिली से विदा हुआ और उसी दिन जहाज पर बैठ कर जद्दा की तरफ रवाना हो गया।

मक्का वालों को पूरा यकीन था कि हब्शा का बादशाह नजाशी मुसलमानों को वफ्द के हवाले कर देगा। उन्हों ने तै कर लिया था कि अब तमाम मुसलमानों को कैद कर देंगे, ताकि वे बाहर न जा सकें, न किसी से मिल सकें। 

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चाहते तो यह थे कि तमाम मुसलमानों को क़त्ल कर डालें, लेकिन मुसलमान किसी एक कबीले से ताल्लुक न रखते थे, इस लिए उन्हें यह अंदेशा था कि अगर एक कबीला भी किसी एक मुसलमान के खून का बदला लेने के लिए उठ खड़ा हुआ, तो फिर तमाम कबीलों में लड़ाई छिड़ जाएगी और चूंकि आए दिन की लड़ाइयों ने उन का तमाम कस-बल निकाल दिया था, इसलिए वे किसी एक लड़ाई के लिए भी तैयार न थे, जिस से कि तमाम अरब में आग लग जाए और अरब का अम्न व अमान खाक में मिल जाए।

इस डर से, वे मुसलमानों को कत्ल करने में हील-इज्जत कर रहे थे। उन्हों ने यह ते कर लिया था कि जितने मुसलमान हैं, उन सब को एक जगह जमा कर के कैद कर दें और बहुत कड़ाई से उन की निगरानी की जाए।

यह ख्याली पुलाव पका ही रहे थे कि वफ्द आ गया और उस ने अपनी नाकामी की पूरी दास्तान कुरैश को कह सुनायी। वपद के नाकाम आने से मक्का के तमाम काफ़िरों को बड़ा रंज हुआ। 

हब्शा के बादशाह नजाशी पर भी गुस्सा आया, पर उनमें इतनी ताकत नहीं थी कि हब्शा के बादशाह पर चढ़ाई कर देते और उस से तलवार के बल पर अपनी मांग मंजूर करा सकते। इस लिए खामोशी को ही बेहतर समझा। उन्हें यह डर हा कि शायद हब्शा के मुसलमान मसीही बादशाह नजाशी को मक्के पर न चढ़ा लायें। इसलिए उन्हों ने खुफ़िया तरीके से लड़ाई की तैयारियां शुरू कर दी और जद्दा में सुरागरसां भेज दिये, ताकि जब वे ईसाई फ़ौज को आता देखें, तो मक्के वालों को खबर कर दें।

To be continued …

इंशा अल्लाह सीरीज का अगला हिस्सा कल पोस्ट किया जायेगा …. 
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