शर्म व हया ईमान का जुज़ है

रसूलल्लाह (ﷺ) ने फर्माया :

“ईमान के साठ से ऊपर या सत्तर से कुछ जायद शोअबे हैं। सब से अफज़ल (ला इलाहा इलल्लाहु) पढ़ना है और सब से कम दर्जा रास्ते से तकलीफ़ देह चीज़ का हटा देना है और शर्म व हया ईमान का हिस्सा है।”

📕 मुस्लिम: १५३

और देखे :

Share on:

Trending Post

Leave a Reply

close
Ummate Nabi Android Mobile App