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दावत व तबलीग़ का हुक्म

नुबुव्वत मिलने के बाद भी हुजूर (ﷺ) बादस्तूर गारे हिरा जाया करते थे। शुरू में सूरह अलक़ की इब्तेदाई पाँच आयतें नाज़िल हुईं, फिर कई दिनों तक कोई वहीं नाज़िल नहीं हुई। उस को “फतरतुलवह्य” का जमाना कहते हैं।

एक रोज़ आप गारे हिरा से तशरीफ ला रहे थे के एक आवाज़ आई, आप ने चारों तरफ घूम कर देखा, मगर कोई नजर नहीं आया। जब निगाह ऊपर उठाई,तो देखा के जमीन व आस्मान के दर्मियान हज़रत जिब्रईल (अ.) एक तख्त पर बैठे हुए हैं । हज़रत जिब्रईल (अ.) को इस हालत में देख कर आप पर खौफ तारी हो गया और घर आकर चादर ओढ़ कर लेट गए। आप की यह अदा अल्लाह तबारक व तआला को पसंद आई और सूर-ए-मुदस्सिर की इब्तेदाई आयतें नाज़िल फ़रमाई। “ऐ कपड़े में लिपटने वाले ! खड़े हो जाइये और (लोगों को) डराइये और अपने पर्दरदिगार की बड़ाई बयान कीजिए और अपने कपड़ों को पाक साफ रखिये और हर किस्म की नापाकी से दूर रहिये।”
[सूरह मुद्दस्सिर : १ ता ५]
इस तरह आप को दावत व तब्लीग का हुक्म भी दिया गया, चूँकि पूरी दुनिया सदियों से शिर्क व बुत परस्ती में मुब्तला थी और खुल्लम खुल्ला दावत देना मुश्किल था, इस लिये शुरू में पोशीदा तौर पर आपने इस्लाम की दावत देना शुरू की। आपकी दावत से औरतों में सबसे पहले आपकी जौजा-ए-मुहतरमा हज़रत ख़दीजा ने, मर्दों में हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (र.अ) ने और बच्चों में हजरत अली (र.अ) ने इस्लाम क़बूल किया।

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