हजरत मूसा अलैहि सलाम » Qasas ul Anbiya: Part 15.11

हजरत मूसा अलैहि सलाम (भाग: 11)

हज़रत मूसा (अ.स.) और हज़रत ख़िज़्र (अ.स.)

हज़रत मूसा (अ.स.) की जिंदगी के वाक़ियों में एक अहम वाकिया उस मुलाक़ात का है जो उनके और एक साहिबे बातिन के दर्मियान हुई और हज़रत मूसा (अ.स.) ने उनसे तक्वीनी दुनिया के कुछ असरार व रुमूज़ मालूम किए। इस मुलाक़ात का ज़िक्र तफसील के साथ सूरः कहफ़ में किया गया है और बुख़ारी में इस वाकिए से मुताल्लिक कुछ और तफ़सील से ज़िक्र आया है।

बुख़ारी में सईद बिन जुबैर (र) से रिवायत है कि उन्होंने अब्दुल्लाह बिन अब्बास से अर्ज़ किया कि नौफ़ बकाली कहता है कि ख़िज़्र के मूसा (अ.स.), बनी इसराईल के मूसा (अ.स.) नहीं हैं, यह एक दूसरे मूसा (अ.स.) हैं। हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने फ़रमाया, ख़ुदा का दुश्मन झूठ कहता है मुझसे उबई बिन काब ने हदीस बयान की है कि उन्होंने रसूले अकरम (ﷺ) से सुना है: इर्शाद फ़रमाते हैं कि,

‘एक दिन हज़रत मूसा (अ.स.) बनी इसराईल को खिताब कर रहे थे कि किसी आदमी ने मालूम किया कि इस ज़माने में सबसे बड़ा आलिम कौन है? हज़रत मूसा (अ.स.) ने फ़रमाया, मुझे अल्लाह ने सबसे ज़्यादा इल्म अता फ़रमाया है। अल्लाह तआला को यह बात पसन्द न आई और उन पर इताब हुआ कि तुम्हारा मंसब तो यह था कि उसको इसे इलाही के सुपुर्द करते और कहते, ‘वल्लाहु आलम और फिर वह्य नाजिल फरमाई कि जहां दो समुन्दर मिलते हैं (मजमाउल बहरैन) वहां हमारा एक बन्दा है जो कुछ मामलों में तुझसे भी ज़्यादा आलिम व दाना है।’

हजरत मूसा (अ.स.) ने अर्ज़ किया, परवरदिगार! तेरे इस बन्दे तक पहुंचने का क्या तरीक़ा है? अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि मछली को अपने तोशेदान में रख लो। पस जिस जगह वह मछली गुम हो जाए, उसी जगह वह आदमी मिलेगा।

हज़रत मूसा (अ.स.) ने मछली को तोशेदान में रखा और अपने ख़लीफ़ा यूशेअ बिन नून को साथ लेकर ‘मर्दे सालेह’ की तलाश में रवाना हो गए। जब चलते-चलते एक मक़ाम पर पहुंचे, तो दोनों एक पत्थर पर सर रखकर सो गए। मछली में ज़िंदगी पैदा हुई और वह जंबील से निकल कर समुन्दर में चली गई। मछली पानी के जिस हिस्से पर बहती गई और जहां तक गई, वहां पानी बर्फ की तह जम कर एक छोटी-सी पगडंडी की तरह हो गया, ऐसा मालूम होता था कि समुद्र में एक लकीर या खत खिंचा हुआ है।

यह वाक़िया यूशेअ बिन नून ने देख लिया था, क्योंकि वह हज़रत मूसा (अ.स.) से पहले बेदार हो गए थे मगर जब हज़रत मूसा (अ.स.) बेदार हुए तो उनसे ज़िक्र करना भूल गए और फिर दोनों ने अपना सफ़र शुरू कर दिया और उस दिन-रात आगे बढ़ते ही गए। जब दूसरा दिन हुआ तो हज़रत मूसा (अ.स.) ने फ़रमाया कि अब थकान ज़्यादा महसूस होने लगी, वह मछली लाओ, ताकि अपनी मूख मिटाएं। नबी अकरम (ﷺ) ने फ़रमाया, हज़रत मूसा (अ.स.) को अल्लाह तआला की बताई हुई मंजिले मसूद तक पहुंचने में कोई थकान न हुई थी, मगर मंजिल से आगे ग़लती से निकल गए तो अब थकान भी महसूस होने लगी।

यूशेअ बिन नून ने कहा, आपको मालूम रहे कि जब हम पत्थर की चट्टान पर थे तो वहीं मछली का ताज्जुब भरा वाकिया पेश आया कि उसमें हरकत पैदा हुई और वह मक्तल (जंबील) में से निकल कर समुन्दर में चली गई और उसकी रफ्तार पर समुद्र में रस्ता बनता चला गया। मैं आपसे यह वाकिया कहना भूल गया। यह भी शैतान का एक चरका था।

नबी अकरम (ﷺ) ने फरमाया कि समुन्दर का वह ‘ख़त’ मछली के लिए “सब्र” (रास्ता) था और मूसा (अ.स.) और यूशेअ के लिए ‘उज्व’ (ताज्जुब वाली बात)।

हज़रत मूसा (अ.स.) ने फ़रमाया कि जिस जगह की हमको तलाश है, वह वही जगह थी और यह कहकर दोनों फिर एक दूसरे से बात-चीत करते हुए उसी राह पर लौटे और उस सख़रा (पत्थर की चट्टान) तक जा पहुंचे।

वहां पहुंचे तो देखा कि उस जगह उम्दा कपड़ा पहने हुए एक आदमी बैठा है। हज़रत मूसा (अ.स.) ने उसको सलाम किया। उस आदमी ने कहा, तुम्हारी इस सरजमीन में ‘सलाम’ कहां? (यानी इस सरज़मीन में तो मुसलमान नहीं रहते) यह ख़िज़्र (अ.स.) थे। हज़रत मूसा (अ.स.) ने कहा, हां, मैं तुमसे वह इल्म हासिल करने आया हूं जो अल्लाह ने तुम ही को बख्शा है।

ख़िज़्र (अ.स.) ने कहा, तुम मेरे साथ रहकर उन मामलों पर सब्र न कर सकोगे? मूसा ! अल्लाह ने मुझको तक्वीनी असरार द रुमूज़ का वह इल्म अता किया है जो तुमको नहीं दिया गया और उसने तुमको (तशरीई इल्मों का) वह इल्म अता फरमाया है जो मुझको अता नहीं हुआ।

हज़रत मूसा (अ.स.) ने कहा, ‘इन्शाअल्लाह‘ आप मुझको सब्र व ज़ब्त करने वाला पाएंगे और मैं आपके इर्शाद की बिल्कुल खिलाफ़वर्ज़ी नहीं करूंगा। हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) ने कहा, तो फिर शर्त यह है कि जब आप मेरे साथ रहें तो किसी मामले के मुताल्लिक़ भी, जिसको आपकी निगाहें देख रही हों, मुझसे कोई सवाल न करें। मैं खुद उनकी हक़ीक़त आपको बता दूंगा। हज़रत मूसा (अ.स.) ने मंजूर कर लिया और दोनों एक तरफ़ को रवाना हो गए।

जब समुद्र के किनारे पहुंचे तो सामने से एक नाव नज़र आई। हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) ने मल्लाहों से किराया पूछा। वे ख़िज़्र (अ.स.) को पहचानते थे, इसलिए उन्होंने किराया लेने से इंकार कर दिया और इसरार करके दोनों को कश्ती पर सवार कर लिया और कशती रवाना हो गई। अभी चले हुए ज़्यादा देर न हुई थी कि हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) ने कश्ती के सामने वाले हिस्से का एक तख़्ता उखाड़ कर कश्ती में सूराख़ कर दिया। हज़रत मूसा (अ.स.)  से ज़ब्त न हो सका, ख़िज़्र (अ.स.) से कहने लगे, कश्ती वालों ने यह एहसान किया कि आपको और मुझको मुफ़्त सवार कर लिया और अपने उसका यह बदला दिया कि कश्ती में सूराख़ कर दिया कि सब कश्ती वाले कश्ती समेत डूब जाएं, यह तो बहुत नामुनासिब हरकत हुई?

हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) ने कहा कि मैंने तो पहले ही कहा था कि आप मेरी बातों पर सब्र न कर सकेंगे? आखिर वहीं हुआ। हज़रत मूसा (अ.स.) ने फ़रमाया, में वह बात बिल्कुल भूल गया, इसलिए आप भूल-चूक पर पकड़ें नहीं और मेरे मामले में सख़्ती न करें। यह पहला सवाल वाकई मूसा (अ.स.) की भूल की वजह से था। इसी बीच एक चिड़िया कश्ती के किनारे आकर बैठी और पानी में चोंच डालकर एक क़तरा पानी पी लिया। हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) ने कहा, बेशक तश्वीहे इल्म इलाही के मुकाबले में मेरा और तुम्हारा इल्म ऐसा ही बे-हकीकत है, जैसा कि समुद्र के सामने यह क़तरा।

कश्ती किनारे लगी और दोनों उतर कर एक ओर को रवाना हो गए। समन्दर के किनारे-किनारे जा रहे थे कि एक मैदान में कुछ बच्चे खेल रहे थे। हज़रत ख्रिज (अ.स.) आगे बढ़े और उनमें से एक बच्चे को क़त्ल कर दिया। हज़रत मूसा (अ.स.) फिर सब्र न कर सके, फ़रमाने लगे- ‘नाहक एक मासूम जान को आपने मार डाला, यह तो बहुत ही बुरा किया?’ हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) ने कहा, मैं तो शुरू ही में कह चुका था कि आप मेरे साथ रहकर सब्र व ज़ब्त से काम न ले सकेंगे।

नबी अकरम (ﷺ) ने फरमाया, चूंकि यह बात पहली बात से भी ज़्यादा सख्त थी, इसलिए हज़रत मूसा (अ.स.) फिर सब्र न कर सके। हज़रत मूसा (अ.स.) ने फ़रमाया, खैर इस बार और नजरअंदाज कर दीजिए इसके बाद भी अगर सब्र न हो सका, तो फिर उज़्र करने का कोई मौका न रहेगा और इसके बाद आप मुझसे अलग हो जाइएगा।

ग़रज फिर दोनों रवाना हो गए और चलते-चलते एक ऐसी बस्ती में पहुंचे, जहां के रहने वाले खुशहाल और मेहमानदारी के हर तरह काबिल थे, मगर दोनों की मुसाफिराना दरख्वास्त पर भी उनको मेहमान बनाने से इंकार कर दिया था। ये अभी बस्ती ही में से गुज़रे थे कि ख़िज़्र (अ.स.) एक ऐसे मकान की ओर बढ़े, जिसकी दीवार कुछ झुकी हुई थी और उसके गिर जाने का डर था। हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) ने उसको सहारा दिया और दीवार को सीधा कर दिया। हज़रत मूसा (अ.स.) ने फिर ख़िज़्र (अ.स.) को टोका और फ़रमाने लगे कि “हम इस बस्ती में मुसाफिर की हैसियत से दाखिल हुए मगर उसके बसने वालों ने न मेहमानदारी की और न टिकने को जगह दी। आपने यह क्या किया उसके एक बाशिंदे की दीवार को बगैर मुआवजे के दुरुस्त कर दिया। अगर करना ही तो भूख-प्यास को दूर करने के लिए कुछ उजरत ही तै कर लेते।

हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) ने फ़रमाया, अब मेरी और तेरी जुदाई का वक्त आ गया, “हाजा फ़िराकु व बैनक‘ और फिर उन्होंने हजरत मूसा को इन तीनों मामलों हक़ीक़तों को समझाया और बताया कि ये सब अल्लाह की तरफ़ से वे थीं, जिन पर आप सब्र न कर सके। 


हज़रत ख़िज़्र (अ.स.)  से मुताल्लिक अहम बातें

हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) से मुताल्लिक़ कुछ बातें ज़िक्र के क़ाबिल हैं –

1. ख़िज़्र नाम है या लकब? 

कुरआन मजीद में न हज़रत ख़िज़्र का नाम ज़िक्र हुआ है औ लकब, बल्कि ‘अब्दम मिन इबादिना’ (हमारे बन्दों में से एक बन्दा) का ज़िक्र किया गया है। बुख़ारी व मुस्लिम की सही हदीसों में ख़िज़्र (अ.स.) कहकर’ हुआ है, इसलिए न यह कहा जा सकता है कि ख़िज़्र नाम है और न यह ख़िज़्र लकब है और इसका खोलना ज़रूरी भी नहीं।

2. ख़िज़्र सिर्फ ‘नेक बन्दा’ हैं या वली हैं या नबी हैं या रसूल? 

तर्जीह के काबिल यही है कि वह नबी थे। कुरआन मजीद ने अन्दाज़ में उनके शरफ़ का ज़िक्र किया है, वह नबी की पदवी के लिए ही उतरता है विलायत का मक़ाम तो उससे बहुत पीछे है।

3. उनको हमेशा की जिंदगी हासिल है या वफ़ात पा चुके? 

तहक़ीक़ करने वाले उलेमा की सही राय यह है कि वह वफ़ात पा चुके हैं, क्योंकि इस दुनिया में मौत एक हकीकत है।

तर्जुमा- 'और ऐ मुहम्मद! हमने तुझसे पहले भी किसी बशर को हयात अता नहीं की। (अल-अंबिया

4. मज्मउल बहरैन (बहरैन की जगह) कहां है? 

‘मजमउल बहरैन’ के बारे में हज़रत उस्ताद अल्लामा सैयद मु० अनवर शाह कद्द-स सिर्रहु फ़रमाते हैं ‘यह मकाम वह है जो आजकल अक़्बा के नाम से मशहूर है।’

5. हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) का मक़ाम व मर्तबा क्या है?

हज़रत ख्रिज (अ.स.) का मक़ाम-कुरआन मजीद ने इस वाकिए के शुरू में ख़िज़्र के ‘इल्म’ के मुताल्लिक कहा है ‘व अल्लमहू मिल्लदुन्नी इलमा

तर्जुमा- और हमने उसको अपने पास से इल्म अता किया। (अल-कहफ़ 15)

और क़िस्से के आखिर में ख़िज़्र का यह क़ौल नक़ल किया है- “वमा फ़-अत्तु हू अन अमरी’  

तर्जुमा- 'मैंने वाकियों के इस सिलसिले को अपनी ओर से नहीं किया। (अल-कहफ़ 88)

तो इन दोनों जुम्लों से मालूम होता है कि अल्लाह तआला ने ख़िज़्र (अ.स.) को कुछ चीजों की हक़ीक़तों का वह इल्म अता फ़रमाया था, जो तक्वीनी रुमूज़ व असरार और बातिनी हक़ीक़तों से मुताल्लिक़ है और यह एक ऐसा मुजाहरा था, जिसे अल्लाह तआला ने हक़ वालों पर वाज़ेह कर दिया। अगर इस दुनिया की तमाम हकीकतों पर से इसी तरह परदा उठा दिया जाए जिस तरह कुछ हक़ीक़तों को ख़िज़्र (अ.स.) के लिए बेनकाब कर दिया था,

तो इस दुनिया के तमाम हुक्म ही बदल जाएं और अमल की आजमाइशों का यह सारा कारखाना बिखर कर रह जाए, मगर दुनिया आमाल की आज़माइशगाह है, इसलिए ‘तक्वीनी हक़ीक़तों’ पर परदा पड़ा रहना ज़रूरी है, ताकि हक़ व बातिल की पहचान के लिए जो तराजू अल्लाह की कुदरत ने मुक़र्रर कर दिया है, वह बराबर अपना काम अंजाम देता रहे।

जहां तक हज़रत मूसा (अ.स.) का ताल्लुक है, तो नबूवत व रिसालत के मामलात के मज्मूए के एतबार से हज़रत मूसा (अ.स.) का मकाम हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) के मकाम से बहुत बुलन्द है, क्योंकि वे अल्लाह के नबी भी हैं और जलीलुलक़द्र रसूल भी, शरीअत वाले भी हैं और किताब वाले भी और रसूलों में अज़्म वाले रसूल हैं, पस हज़रत ख़िज़्र (अ.स.) का वह जुज़ई इल्म तक्वीन के असरार से ताल्लुक रखता था हज़रत मूसा (अ.स.) की शरीअत के जामे इल्म से आगे नहीं जा सकता।

To be continued …

इंशा अल्लाह उल अजीज! अगले पार्ट 15.12 में हज़रत मूसा (अ.स.) और बनी इसराईल का ईज़ा पहुंचाने वाले वाकिये को तफ्सील में देखेंगे।

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