जब मस्जिदों का असल हक़ हुआ अदा और खोला गया गैरमुस्लिमो के लिए दरवाजा

केरला: देशभर में 7 मई को मेडिकल कॉलेजों में नीट का एग्ज़ाम था. ये एग्जाम सुबह 10.00 बजे से 01 बजे तक होना था. लेकिन एक्साम सेंटर बड़े शहरों में होने के कारण स्टूडेंट्स को जल्दी ही एक्साम सेंटर के लिए निकलना पड़ा.

सीबीएसई की और से छात्रों को निर्देश था कि वे परीक्षा केंद्र पर सुबह 7.30 बजे तक पहुंच जाएं. इसलिए दूर-दूर से तमाम छात्र और कुछ अभिभावक सुबह जल्दी ही अलूवा जुमा मस्जिद के पास वाले सेंटर पर भी टाइम से काफी पहले आ गए.

ऐसे में तेज गर्मी में वे इधर-उधर घूमते रहे. जब आसपास के मुसलमानों ने इन परेशान लोगों को देखा तो उन सभी के लिए मस्जिद का दरवाज़ा खोल दिया ताकि वहां वह चैन से बैठ सके और आराम कर सके.
इस दौरान बिना किसी रोक-टोक के सभी मज़हब और जाति के लोगों ने मस्जिद में जाकर आराम किया और स्थानीय मुसलमानों के इस कदम की खूब सराहना भी की.

*मस्जिदों का असल मकसद इस्लाम में क्या है ?
आपको बतादे की मस्जिदे किसी एक कौम की जगिर नहीं है ,.. ये इस मकसद से बनायीं जाती है के पूरी इंसानियत इसमें जमा होकर सिर्फ एक रब की इबादत करें, उसके बारे में तारुफ़(इंट्रोडक्शन) हासिल करे और कांधे से कान्धा मिलाकर तमाम इंसानियत एक की सफ्फ(raw) में खड़ी होकर उसी एक सच्चे इश्वर(अल्लाह) के आगे नतमस्तक हो जिसने हम सबको बनाया ,.. जिसके लिए इंसानों में कोई वर्णभेद नहीं, नाही कोई मालदार किसी गरीब से बेहतर है, बल्कि उसके लिए बेहतर और प्रिय तो वही है जो सबसे ज्यादा ईशपरायण(तकवा) रखता है ,.

यही वजह है के आज दुनिया में सबसे तेजी से फैलने वाला कोई धर्म है तो वो इस्लाम है ,. क्यूंकि इस्लाम हर तरह के भेदभाव से मुक्त है ,..

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