Safar ki Dua in Hindi | सफर की दुआ: जानिए कैसे करें अपने सफर को मेहफ़ूज़ !

Safar ki Dua in Hindi | सफर की दुआ: जानिए कैसे करें अपने सफर को मेहफ़ूज़ !

۞ बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम ۞

सफ़र का मतलब क्या है?

Safar ki Dua in Hindi | सफ़र (سفر) एक अरबी शब्द है जिसका मतलब यात्रा करना, यात्रा पर जाना या परिवहन से है। यह चाँद के कैलेंडर (lunar calendar) का दूसरा इस्लामी महीना भी है और वह महीना है जब मुसलमान भोजन इकट्ठा करने के लिए अपने घर खाली कर देते थे।

हदीस और पैगंबर (ﷺ) की सुन्नत के हिसाब से, कई दुआएं हैं जिन्हें कोई भी सफर/यात्रा पर जाने के लिए पढ़ सकता है और हम इस एक पोस्ट में उन सभी को शामिल करेंगे। इनका इस्तेमाल सफर के किसी भी तरीके के लिए किया जा सकता है चाहे वह हवाई जहाज हो, कार हो या नाव से हो, या मोटर साईकल हो ।


Safar ki Dua in Hindi : सफर की दुआ

سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَـٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ وَإِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ

सुब्हानल्लजी सख्ख-र-लना हाज़ा वमा कुन्ना लहू मुकरिनीन, व इन्ना इला रब्बिना लमुन्कलिबून

तर्जुमा: पाक है वह ज़ात जिसने इस सवारी को हमारे क़ाबू में कर दिया है, हालांकि हम इसे अपने क़ाबू में नहीं कर सकते थे। हम अपने रब की ओर लौट कर जाने वाले हैं।

📕 सूरह जुखरूफ : आयत 13 और 14


मंजिल पर पहुंचने पर यह दुआ करें:

أعوذ بكلمات الله التامات من شر ما خلق

अऊजु बि-कलिमातिल्लाहि त्ताम्माति मिन शर्रि मा ख़लक

तर्जुमा : मैं अल्लाह तआला के कामिल कलीमात के साथ उसकी मखलूक के शर से, पनाह में आता हूं।

📕 सहीह मुस्लिम : किताबुज्ज़िक्र (6/295)

वजाहत :

1. कुरआन ने कश्ती (स्टीमर) के सफर के लिए यही दुआ बताई है, देखिए सूरह जुखरूफ आयत 12, 13 और 14 |

2. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने कश्ती पर सवार होकर यह दुआ पढ़ी थी । बिस्मिल्लाहि मजरिहा व मुर साहा इन्न रब्बी ल- गफूरुर्रहीम (सूरह हूद आयत 41)

3. सफर चाहे किसी भी सवारी का हो, सफर की दुआएँ ज़रूर पढ़ लेनी चाहिए।


सवारी परेशान करे तब की दुआ:

بِسمِ اللهِ

बिस्मिल्लाह

तर्जुमा: अल्लाह के नाम से शुरु।

फजीलत : रसूलुल्लाह ﷺ की सवारी ( जानवर ) ने शरारत की तो आप के पीछे बैठे हुए सहाबी ने कहा ‘मरे शैतान’ उस वक़्त आप ﷺ ने कहा ऐसा बोलने से शैतान खुश होकर एक मकान की तरह बड़ा हो जाता है । इस लिए ‘बिस्मिल्लाह’ बोला करो, इस से शैतान सुकड़कर मख्खी की तरह हो जाता है।

📕 सहीह सुनन अबी दाऊद : किताबुल अदब (4982)


ऊँचाई पर चढ़ने की दुआ:

सफर में जब ऊंचाई पर पहुंचो (हवाई जहाज पर जाओ) तोह यह दुआ किया करो।

الله أكبر.

अल्लाहु अकबर

तर्जुमा : अल्लाह सब से बड़ा है।

वज़ाहतः सहाबा ऊँची जगह चढ़ते तो ‘अल्लाहु अकबर’ कहते।

📕 सहीह बुख़ारी : किताबुल जिहाद (2 / 147)


नीचे उतरने की दुआ:

سُبْحَانَ اللهِ

सुब्हानल्लाह

तर्जुमा : अल्लाह पाक है।

वज़ाहत : सहाबा नीची जगह में उतरते तो ‘सुब्हानल्लाह’ कहते।

📕 सहीह बुख़ारी : किताबुल जिहाद (2 / 147)


सफर में ठहरने की दुआ:

اَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللهِ التَّامَّاتِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ

अऊजु बि-कलिमातिल्लाहि त्ताम्माति मिन शर्रि मा ख़लक

तर्जुमा : मैं पनाह माँगता हूँ अल्लाह के पूरे कलिमों के ज़रीए, तमाम मख़्लूक की बुराई से ।

फाइदा : रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया जो शख़्स किसी मंज़ील (कोई जगह) उतरे और यह दुआ पढ़े तो उसको कोई चीज़ नुकसान नहीं पहुँचा सकती यहाँ तक के वह वहाँ से आगे बढ़ जाए ।

📕 सहीह मुस्लिम : किताबुज्ज़िक्र (6/295)


सफर में साथी की अहमियत :

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने कहा,
“अगर लोगों को यह पता होता कि मैं अकेले सफर करने के खतरों के बारे में जानता हूं, तो कोई भी सवार रात में अकेले सफर नहीं करेगा।”

एक और रिवायत में, अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने कहा,
“एक सवार शैतान है (साथ में) और दो सवार दो शैतान हैं। तीन सवार एक गिरोह बनाते हैं। 1

📕 रियाज़स सालिहिन अरबी/अंग्रेजी पुस्तक संदर्भ: पुस्तक 8, हदीस 959

रसूलल्लाह (ﷺ) के समय में यह ज्यादा लागू और अच्छी सलाह थी, क्योंकि रात में सफर करना कहीं ज्यादा जोखिम भरा था, खासकर अगर अकेले जाना हो। आज रात में सफर करना ज्यादा मेहफ़ूज़ है लेकिन आप उतने सतर्क नहीं होंगे जितने पहली बार जागने पर होंगे।

लिहाजा रात के वक्त अगर सफर करना हो तो साथीयो के साथ या गिरोह में सफर करे, ये ज्यादा बेहतर होगा।


छुट्टियों के दौरान मुख़्तसर दुआ :

इब्न अब्बास (रजी.) से रिवायत है: रसूलल्लाह (ﷺ) एक बार उन्नीस दिनों तक रुके थे और मुख़्तसर दुआएं कीं। इसलिए जब हम उन्नीस दिनों के लिए सफर करते थे (और रुकते थे), तो हम दुआ को छोटा कर देते थे, लेकिन जब हम लम्बे अर्से के लिए सफर करते थे (और रुकते थे) तो हम पूरी दुआ करते थे।

📕 सहिह अल-बुखारी 1080, इन-बुक संदर्भ: पुस्तक 18, हदीस 1


औरत का तन्हा सफर करना कैसा?

रसूलल्लाह (ﷺ) ने फरमाया के –
“जो औरत अल्लाह और कयामत के दिन पर ईमान रखती है उसके लिए ये हलाल नहीं के वो अपने बाप, भाई, शोहर, बेटे, या किसी मेहरम के बगैर 3 दिन या इस से ज़ियादा का सफ़र करे।”

📕 सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 3270, पेज#901

वजाहत: उलमाए कराम ने इस की हद किलोमीटर में 92 किमी बयान फरमाई है। वल्लाहु आलम!

۞ अल्लाह ताला हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक अता फरमाए,
۞ हमारे सफर को कामियाब फरमाए ,
۞ सफर की तमाम सख्तियों और मुसीबतों से हमारे जानो माल और इज़्ज़तो इमांन की हिफाज़त फरमाए।

۞ जब तक हमे जिन्दा रखे, इस्लाम और इमांन पर रखे।
۞ खात्मा हमारा ईमान पर हो।

वा आखीरु दा-वाना अलहम्दुलिल्लाही रब्बिल आलमीन। आमीन


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