बग़ैर मेहरम से सफ़र व अजनबी से ख़लवत।

पोस्ट 35 :
बग़ैर मेहरम से सफ़र व अजनबी से ख़लवत।

इब्ने अ़ब्बास रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि,
उन्होंने अल्लाह के नबी ﷺ को यूं फ़रमाते सुना कि:

कोई मर्द किसी (नामेहरम) औ़रत के साथ ख़लवत इख़्तियार ना करे, और कोई औ़रत मेहरम के बग़ैर सफ़र ना करे। (ये सुन कर) एक शख़्स़ खड़ा हुवा और कहा: ऐ अल्लाह के रसूल, मैं ने अपना नाम फुलां ग़ज़्वे (जंग) में जाने के लिए लिखा दिया है और मेरी बीवी ह़ज के लिए जा रही है। (अब मैं क्या करूं ?)

आप ने फ़रमाया: जाओ, अपनी बीवी के साथ ह़ज करो। 

📕 बुखारी: अल जिहाद वस्सियर 3006,
📕 मुस्लिम: अल ह़ज 2391

और एक रिवायत में आप ने फ़रमाया:
“ख़बरदार, जब भी एक मर्द किसी (ना मेहरम) औ़रत के साथ अकेला रहता है तो उन में तीसरा शैतान होता है।”

📕 मुस्नद अहमद, तिर्मिज़ी, हाकिम; रावी: उमर
📕 स़ही़ह़ अल जामे 2546-स़ही़ह़

————-J,Salafy————
इल्म हासिल करना हर एक मुसलमान मर्द-और-औरत पर फर्ज़ हैं
(सुनन्ऩ इब्ने माजा ज़िल्द 1, हदीस 224)

Series : ख़्वातीन ए इस्लाम

Rate this post

Leave a Reply

Related Posts: