औ़रत का मर्द पर ह़क़

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औ़रत का मर्द पर ह़क़

मआ़विया अल कुशैरी रज़िअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत हैं, फ़रमाते हैं: मैं ने अर्ज़ किया:

❝ ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ हमारी बीवियों का हम पर क्या ह़क़ है ?
आप ﷺ ने फ़रमाया: ये कि जब तुम खाओ तो उन्हें भी खिलाओ, और तुम पहनो तो उन्हें भी पहनाओ, या फ़रमाया कि जब तुम कमाओ तो उन्हें पहनाओ । और उन के चेहरे पर ना मारो, और ना उन्हें बुरा कहो, और अगर उन से दूरी इख़्तियार करो तो घर ही में करो।

इमाम अबू दाऊद कहते हैं कि “उन्हें बुरा ना कहो” का मतलब है: उन्हें इस त़रह़ ना कहो कि अल्लाह तेरा बुरा करे। (या अल्लाह तुझे ज़लील व रूस्वा करे) ❞

📕 मुस्नद अहमद, अबू दाऊद, नसाई, इब्ने माजा-अल्फ़ाज़ अबू दाऊद के हैं।
📕 सुनन अबी दाऊद बि तहक़ीक़िल अल्बानी 2142-ह़सन स़ही़ह़

————-J,Salafy————
इल्म हासिल करना हर एक मुसलमान मर्द-और-औरत पर फर्ज़ हैं
(सुनन्ऩ इब्ने माजा ज़िल्द 1, हदीस 224)

 

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