हज़रत युसूफ अलैहि सलाम (भाग: 3) » Qasas ul Anbiya: Part 13.3

युसूफ अलैहि सलाम की बेगुनाही का साबित होना

साक्री ने यह सब मामला बादशाह के सामने जा सुनाया। बादशाह ने ख्वाब की ताबीर का मामला देखकर कहा कि ऐसे आदमी को मेरे पास लाओ। जब बादशाह का दूत हजरत यूसुफ़ अलैहि सलाम के पास पहुंचा तो हजरत यूसुफ ने कैदखाने से बाहर आने से इंकार कर दिया और फरमाया कि इस तरह तो मैं जाने को तैयार नहीं हूं, तुम अपने आका के पास जाओ और उससे कहो कि वह यह जांच करे कि इन औरतों का मामला क्या था, जिन्होंने हाथ काट लिए थे? पहले यह बात साफ़ हो जाए कि उन्होंने कैसी कुछ मक्कारियां की थीं और मेरा परवरदिगार तो उनकी मक्कारियों को खूब जानता है।

………. ग़रज बादशाह ने जब यह सुना तो उन औरतों को बुलवाया और उनसे कहा कि साफ़-साफ़ और सही-सही बताओ कि इस मामले की सही हक़ीक़त क्या है, जबकि तुमने यूसुफ़ पर डोरे डाले थे, ताकि तुम उसको अपनी तरफ़ मायल कर लो? वह एक जुबान होकर बोलीं-

……… तर्जुमा- बोली: माशाअल्लाह! हमने इसमें बुराई की कोई बात नहीं पाई [यूसुफ 12:51]

मज्मा में अजीज की बीवी भी थी और अब वह इश्क व मुहब्बत की मट्टी में ख़ाम न थी, कुन्दन थी और जिल्लत व रुस्वाई के डर से आगे निकल चुकी थी। उसने जब यह देखा कि यूसुफ़ अलैहि सलाम की ख्वाहिश है कि हक़ीकते हाल सामने आ जाए तो बे-अख्तियार बोल उठी –

……… तर्जुमा- ‘जो हक़ीक़त थी, वह अब जाहिर हो गई, हा.. वह मैं ही थी, जिसने यूसुफ़ पर डोरे डाले कि अपना दिल हार बैठे। बेशक वह (अपने बयान में) बिल्कुल सच्चा है।’‘ [यूसुफ 12:51]

इस तरह अब वह वक्त आ गया कि तोहमत लगाने वालों की जुबान से ही साफ़ हो जाए, चुनांचे वाजेह और जाहिर हो गया यानी शाही दरबार में मुजिरमों ने जुर्म का एतराफ़ करके यह बता दिया कि यूसुफ़ अलैहि सलाम का दामन हर किस्म की आलूदगियों से पाक है।

अजीजे मिस्र के ख्वाब ताबीर

अजीजे मिस्र पर जब हकीकत वाजेह हो गई तो उसके दिल में हजरत यूसुफ़ अलैहि सलाम की अजमत व जलालत का सिक्का बैठ गया, वह कहने लगा –

……… तर्जुमा- ‘उसको (जल्द) मेरे पास लाओ कि मैं उसको खास अपने कामों के लिए मुकर्रर करूं।‘ [यूसुफ 12:51]

अजीजे मिस्र के इस हुक्म की तामील में हज़रत यूसुफ़ अलैहि सलाम बादशाह के दरबार में तशरीफ़ लाए, तो अजीजे मिस्र ने कहा –

……… तर्जुमा- ‘बेशक आज के दिन तू हमारी निगाहों में बड़े इक्तिदार का और अमानतदार है।‘ [यूसुफ़ 12:54]

और उनसे मालूम किया कि मेरे ख्वाब में अकाल का ज़िक्र है, उसके बाद में मुझको क्या-क्या उपाय करने चाहिए। हजरत यूसुफ़ ने जवाब दिया –

……… तर्जुमा- ‘अपने राज्य के ख़ज़ानों पर आप मुझे मुख्तार (अख्तियार वाला) कर दीजिए, मैं हिफाजत कर सकता हूं और मैं इस काम का जानने वाला है।‘ [यूसुफ़ 12:55]

……… चुनांचे बादशाह ने ऐसा ही किया और हज़रत यूसुफ़ अलैहि सलाम को अपने पूरे राज्य का मुकम्मल ज़िम्मेदार बना दिया और शाही ख़जाने की कुजियां उनके हवाले करके मुख़्तारे आम कर दिया। इसीलिए अल्लाह तआला ने अज़ीज के कारोबार का मुख्तार बनाकर यूसुफ़ अलैहि सलाम के लिए यह फ़रमाया था कि हमने उसको ‘तम्कीन फ़िल अर्जि‘ (ज़मीन का पूरा मालिक के मुख्तार) अता कर दी। सूरः यूसुफ़ में ‘तम्कीन फ़िल अर्जि’ की खुशखबरी दो बार सुनाई गई है। ग़रज़ हज़रत यूसुफ़ अलैहि सलाम ने मिस्र राज्य के मुख्तारे कुल होने के बाद ख्वाब से मुताल्लिक वे तमाम तदबीरें शुरू कर दी जो चौदह साल के अन्दर फायदेमंद हो सकें और अवाम अकाल के दिनों में भी भूख और परेशानहाली से बची रह सके।

अकाल और याकूब अलैहि सलाम का ख़ानदान

गरज जब अकाल का ज़माना शुरू हुआ तो मिस्र और उसके आस-पास के इलाके में सनत अकाल पड़ा और कनआन में हजरत याकूब अलैहि सलाम ने साहबजादों से कहा कि मिस्र में अजीजे मिस्र ने एलान किया है कि उसके पास ग़ल्ला हिफ़ाजत से रखा हुआ है, तुम सब जाओ और ग़ल्ला खरीद कर लाओ। चुनांचे बाप के हुक्म के मुताबिक यह कनानी क़ाफ़िला मिस्र के अजीज से ग़ल्ला लेने के लिए मिस्र रवाना हुआ।

……… तर्जुमा- ‘और यूसुफ़ के भाई (गल्ला ख़रीदने मिस) आए। वे जब यूसुफ के पास पहुंचे तो उसने फ़ौरन उनको पहचान लिया और वे यूसुफ़ को नपहचान सके।‘ [यूसुफ़ 12:58]

……… तौरात का बयान है कि यूसुफ़ अलैहि सलाम के भाइयों पर जासूसी का इलज़ाम लगाया गया और इस तरह उनको यूसुफ़ अलैहि सलाम के सामने हाज़िर होकर आमने-सामने बात करने का मौक़ा मिला और उन्होंने अपने बाप (हजरत याकूब अलैहि सलाम, सगे भाई बिन यमीन) और घर के हालात को खूब कुरेद-कुरेद कर पूछा और –

……… तर्जुमा- ‘और जब यूसुफ़ ने उनका सामान मुहैया कर दिया तो कहा, अब आना तो अपने सौतेले भाई बिन यमीन को भी साथ लाना। तुमने अच्छी तरह देख लिया है कि मैं तुम्हें (गल्ला) पूरी तौल देता हूं और बाहर से आने वालों के लिए बेहतर मेहमान नवाज हूं, लेकिन अगर तुम उसे मेरे पास न लाए तो फिर याद रखो, न तुम्हारे लिए मेरे पास खरीद व फरोख्त होगी, न तुम मेरे पास जगह पाओगे।‘ [यूसुफ़ 12:59-60]

फिर यूसुफ़ अलैहि सलाम के भाई जब हज़रत यूसुफ़ से रुख्सत होने आए, तो उन्होंने अपने नौकरों को हुक्म दिया कि ख़ामोशी के साथ उनके कजावों में उनकी वह पूंजी भी रख दो जो उन्होंने ग़ल्ले की कीमत के नाम से दी है, ताकि जब घर जाकर उसको देखें, तो अजब नहीं कि फिर दोबारा आएं। जब यह क़ाफ़िला कनआन वापस पहुंचा तो उन्होंने अपने तमाम हालात अपने बाप याकूब अलैहि सलाम को सुनाए और उनसे कहा कि मिस्र के वली (ज़िम्मेदार मालिक) ने साफ़-साफ़ हमसे कह दिया है कि उस वक्त तक यहां न आना और न ग़ल्ले की खरीद का ध्यान करना, जब तक कि अपने सौतेले भाई बिन यमीन को साथ न लाओ, इसलिए अब आपको चाहिए कि उनको हमारे साथ कर दें, हम उसके हर तरह के निगहबान और हिफाजत करने वाले हैं। इस मौके पर हजरत याकूब अलैहि सलाम ने कहा-

……… तर्जुमा- ‘कहा, क्या मैं तुम पर (बिन यमीन) के बारे में ऐसा ही एतमाद करू जैसा कि इससे पहले उसके भाई (यूसुफ़) के बारे में कर चुका हूं, सो अल्लाह ही बेहतरीन हिफाजत करने वाला है और वह ही सबसे बढ़कर रहम करने वाला है।’ [यूसुफ़ 12:64]

इस बात-चीत से फ़ारिग होने के बाद अब उन्होंने अपना सामान खोलना शुरू किया, तो देखा, उनकी पूंजी उन्हीं को वापस कर दी गई है। यह वे कहने लगे, ऐ बाप! इससे ज़्यादा और क्या हमको चाहिए? इजाजत दें कि हम दोबारा उसके पास जाएं और घर वालों के लिए रसद: और बिन यमीन को भी हमारे साथ भेज दे, हम उसकी पूरी हिफाजत करेंगे।

हज़रत याकूब ने फरमाया कि मैं ‘बिन यमीन’ को हरगिज़ तुम्हारे साथ नहीं भेजूंगा, जब तक तुम अल्लाह के नाम पर मुझसे अहद न करो। अहद व पैमान के बाद यूसुफ़ अलैहि सलाम के भाइयों का काफ़िला दोबारा मिस्र को रवाना हुआ और इस बार बिन यमीन भी साथ था। हज़रत याकूब अलैहि सलाम ने उनको रुखसत करते वक्त नसीहतें फरमाई –

……… तर्जुमा- ‘फिर जब ये मिस्र में उसी तरह दाखिल हुए जिस तरह उनके बाप ने उनको हुक्म दिया, तो यह (एहतियात) उनको अल्लाह की मशीयत के मुकाबले में कुछ काम न आई, मगर यह एक ख्याल था याकूब के जी में जो उसने पूरा कर लिया और बेशक वह इल्म वाला था और हमने ही उसको यह इल्म सिखाया था, लेकिन अक्सर लोग नहीं समझते।‘ [यूसुफ 12:68]

इस बीच यह सूरत पेश आई कि जब यूसुफ़ अलैहि सलाम के भाई कनआन से रवाना हुए, तो रास्ते में बिन यमीन को तंग करना शुरू कर दिया। कभी उसको बाप की मुहब्बत का ताना देते और कभी इस बात पर हसद करते कि अज़ीजे मिस्र ने ख़ास तौर पर उसको क्यों बुलाया है और जब ये लोग मंज़िले मक्सूद पर पहुंचे तो –

……… तर्जुमा- ‘और जब ये सब यूसुफ के पास पहुंचे तो उसने अपने भाई (बिन यमीन) को अपने पास बिठा लिया और उससे (धीरे से) कहा, मैं तेरा भाई (यूसुफ) हूं पस जो बदसुलूकी ये तेरे साथ करते आए हैं, तू उस पर गमगीन न हो।‘ [यूसुफ़ 12:69]

कनानी काफिला कुछ दिनों के क्रियाम के बाद जब रुखसत होने लगा तो यूसुफ अलैहि सलाम ने हुक्म दिया कि उनके ऊंटों को इस कदर लाद दो, जितना ये ले जा सकें। हजरत यूसुफ़ अलैहि सलाम की यह ख्वाहिश थी कि किसी तरह अपने प्यारे भाई ‘बिन यमीन’ को अपने पास रोक लें, लेकिन मिस्र की हुकूमत के कानून के मुताबिक किसी गैर-मिस्री को बगैर किसी माकूल वजह के रोक लेना सख्त मना था और हज़रत यूसुफ़ अलैहि सलाम उस वक़्त हकीक़त खोलना नहीं चाहते थे, इसलिए जब क़ाफ़िला रवाना होने लगा तो किसी को इत्तिला किए बगैर शाही पैमाने को बिन यमीन की खुरजी में रख दिया, (ताकि भाई के पास एक निशानी रहे।)

……… कनान के इस क़ाफ़िले ने अभी थोड़ा ही फ़ासला तै किया होगा कि यूसुफ़ अलैहि सलाम के कारिंदों ने शाही बरतनों की देख-भाल की, तो उसमें प्याला न मिला, समझे कि शाही महल में कन्आनियों के सिवा दूसरा कोई नहीं आया, इसलिए उन्होंने ही चोरी की है, फ़ौरन दौड़े और चिल्लाए।

……… तर्जुमा- ‘फिर पुकारा पुकारने वाले ने, ऐ काफ़िले वालो! तुम तो अलबत्ता चोर हो। वे कहने लगे उनकी ओर मुंह करके तुम्हारी क्या चीज़ गुम हो गई? वे कारिन्दे बोले, हम नहीं पाते बादशाह (यूसुफ़) का पैमाना (कटोरा) और जो कोई उसको लाए उसको मिले एक ऊंट का बोझ (ग़ल्ला) और मैं हूं उसका जामिन। वे बोले, ख़ुदा की कसम! तुमको मालूम है कि हम शरारत करने को नहीं आए मिस्र के मुल्क में और न हम कभी चोर थे। वे (कारिंदे) बोले, फिर क्या सज़ा है उसकी अगर तुम निकले झूठे। कहने लगे, उसकी सज़ा यह है कि जिनके सामानों में हाथ आए, वही उसके बदले में जाए। हम यही सजा देते हैं जालिमों को।‘ [यूसुफ़ 12:71-75]

इस मरहले के बाद यह मामला अज़ीजे मिस्र के सामने पेश हुआ और उनकी तलाशी ली गई तो बिन यमीन के कजाये में वह प्याला मौजूद था।

……… तर्जुमा- ‘फिर यूसुफ़ ने उनकी खुर्जियां देखनी शुरू की। आखिर में वह बरतन निकाला अपने भाई की खुरजी से।‘ [यूसुफ़ 12:76] .

इसके बाद अल्लाह तआला फ़रमाता है-

……… तर्जुमा- ‘यों खुफ़िया तदबीर कर दी हमने यूसुफ़ के लिए। वह हरगिज़ न ले सकता या अपने भाई यमीन को उस बादशाह (मिस्र) के तरीके के मुताबिक, मगर यह कि अल्लाह तआला ही चाहे।‘ [यूसुफ़ 12:76] .

इस तरह ‘बिन यमीन’ को मिस्र में रोक लिया गया और यूसुफ़ अलैहि सलाम के भाइयों ने जब यह रंग देखा तो बाप का अहद व पैमान याद आ गया और खुशामद भरे अर्ज-मारून करके अजीज़े मिस्र को बिन-यमीन की वापसी की तर्गीब दिलाई। यह तरीक़ा भी कामियाब न हो सका तो आपस में मश्विरे से पाया कि वालिद बुजुर्गवार को सही सूरत बतला दी जाए और कहा कि वे इस वाकिये की तस्दीक दूसरे क़ाफ़िले वालों से भी कर लें। इस मशविरे के मुताबिक यूसुफ़ अलैहि सलाम के भाई कनआन वापस आए और हज़रत याकूब अलैहि सलाम से बिना घटाए-बढ़ाए सारा वाकिया कह सुनाया।

……… हज़रत याकूब यूसुफ़ के मामले में उनकी सदाक़त का तजुर्बा कर चुके थे, इसलिए फ़रमाया ‘तुम्हारे जी ने एक बात बना ली है, वाकिया यों नहीं है, बिन यमीन और चोरी? यह नहीं हो सकता, खैर अब सब्र के सिवा कोई चारा नहीं, ऐसा सब्र कि बेहतर से बेहतर हो। अल्लाह तआला के लिए नामुम्किन तो नहीं कि एक दिन हम लोगों को फिर जमा कर दे और एक साथ इन दोनों को मुझसे मिला दे। बेशक वह दाना है और हिक्मत वाला है और उनकी ओर से रुख कर लिया और फ़रमाने लगे- ‘आह! यूसुफ की जुदाई का ग़म!

……… हज़रत याकूब अलैहि सलाम की आंखें ग़म की ज़्यादती की वजह से रोते-रोते सफेद पड़ गई थीं और सीना ग़म की जलन से जल रहा था, मगर सब्र के साथ अल्लाह पर तवक्कुल किए बैठे थे।

बटे यह हाल देखकर कहने लगे, ‘खुदा की कसम! तुम हमेशा इसी तरह यूसुफ़ की याद में घुलते रहोगे या इसी ग़म में जान दे दोगे!

हज़रत याकूब ने यह सुनकर फ़रमाया, मैं कुछ तुम्हारा शिकवा तो नहीं। करता और न तुमको सताता हूं।

……… तर्जुमा- ‘बल्कि मैं तो अपनी हाजत और ग़म अल्लाह को बारगाह में अर्ज करता हूँ। में अल्लाह की ओर से वह बात जानता हूं, जो तुम नही जानते।‘ [यूसुफ 12:86]

इंशा अल्लाह, अगले पार्ट में हम देखेंगे युसूफ अलैहि सलाम की सच्चाई का अपने भाइयों और वालिद के सामने जाहिर होना।

To be continued …

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