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Topic: इस्लामी तारीख

इस्लामिक बातें तारीख की रौशनी में , Islamic Waqiat In Hindi, Islamic history in hindi

शराब की हुरमत का हुक्म

अल्लाह तआला ने मुसलमानों को इस्लामी माहौल में जिन्दगी गुजारने और अहकामे इलाही पर अमल करने के लिये मदीने का साजगार माहौल अता किया, ताके जमान-ए-जाहिलियत की तमाम रस्मों और बुरी आदतों को खत्म कर के इस्लामी मुआशरे का अमली नमूना दुनिया के सामने आ जाए, उन की सब से बुरी आदत शराब नोशी थी, […]

हमराउल असद पर तीन रोज कयाम

ग़ज़व-ए-उहुद के बाद अबू सुफियान अपना लश्कर ले कर मक्का वापस जाते हुए मकामे रोहा में पहुँच कर कहने लगा, हमें मुकम्मल तौर पर फतह हासिल करना चाहिये, तो (नऊज़ बिल्लाह) मुहम्मद (ﷺ) को कत्ल क्यों न करूँ ? चलो ! वापस जाकर मुसलमानों को सफ्ह-ए-हस्ती से मिटा कर आएँ। जब रसूलुल्लाह (ﷺ) को इस […]

ग़ज़व-ए-उहुद में सहाबा-ए-किराम की बेमिसाल क़ुरबानी

गजवा-ए-उहुद में हुजूर (ﷺ) के सहाबा ने जिस वालिहाना मुहब्बत व फिदाकारी का मुजाहरा किया उस का तसव्वुर भी रहती दुनिया तक आलमे इस्लाम को रूहानी जज़्बे से माला माल करता रहेगा। जब मुश्रिकीन ने आप (ﷺ) का घेराव कर लिया तो फ़रमाया : मुझ पर कौन जान कुरबान करता है ? जियाद बिन सकन […]

ग़ज़वा-ए-उहुद में मुसलमानों की आज़माइश

ग़ज़वा-ए-उहुद में मुसलमानों ने बड़ी बहादुरी से मुशरिकीने मक्का का मुकाबला किया, जिस में पहले फतह हुई, मगर बाद में एक चूक की वजह से नाकामी का सामना करना पड़ा। जंग शुरू होने से पहले रसूलुल्लाह (ﷺ) ने पचास तीरअन्दाजों की एक जमात को पहाड़ की घाटी पर जहाँ से दुश्मनों के हमले का खतरा […]

जंगे ओहद

जंगे बद्र की शिकस्त से कुरैशे मक्का के हौसले तो पस्त हो गए थे, मगर उन में ग़म व गुस्से की आग भड़क रही थी, उस आग ने उन को एक दिन भी चैन से बैठ ने न दिया। एक साल तो उन्होंने किसी तरह गुजारा, लेकिन सन ३ हिजरी में अबू सुफियान ने मुकम्मल […]

रमज़ान की फरज़ियत और ईद की खुशी

सन २ हिजरी में रमजान के रोजे फर्ज हुए। इसी साल सदक-ए-फित्र और जकात का भी हुक्म नाजिल हुआ। रमजान के रोजे से पहले आशूरा का रोज़ा रखा जाता था, लेकिन यह इख्तियारी था, जब रसूलुल्लाह (ﷺ) मदीना तशरीफ लाए, तो देखा के अहले मदीना साल में दो दिन खेल, तमाशों के जरिये खुशियाँ मनाते […]

कैदियों के साथ हुस्ने सुलूक

ग़ज़व-ए-बद्र में ७० मुश्रिकीन कैद हुए, जिन को मदीना मुनव्वरा लाया गया, हुजूर (ﷺ) ने कैदियों को सहाबा में तकसीम कर दिया, उन के साथ हुस्ने सुलूक और भलाई करने का हुक्म दिया, इस हुक्म को सुनते ही सहाबा ए किराम (र.अ) ने उन के साथ ऐसा सुलूक किया के दुनिया की कोई कौम उस […]

गजवा-ऐ-बद्र

मुसलमानों को सफह-ए-हस्ती से मिटाने के लिये मुश्रिकीने मक्का एक हज़ार का फौजी लश्कर लेकर मक्का से निकले, सब के सब हथियारों से लैस थे, जब हुजूर (ﷺ) को इत्तेला मिली, तो आप (ﷺ) उन के मुकाबले के लिये अपने जाँनिसार सहाबा को ले कर मदीना से निकले, जिन की तादाद तीन सौ तेरा या […]

मदीना की चरागाह पर हमला

जब मुसलमान अपने दीन व ईमान की हिफाज़त के लिये हिजरत कर के मदीना चले गए और खुश्शवार माहौल में लोगों को इस्लाम की दावत देनी शुरू की, लोग इस्लाम में दाखिल होने लगे, चुनान्चे मुसलमानों की बढ़ती हुई तादाद को देख कर कुफ्फारे मक्का अपने लिये खतरा महसूस करने लगे तो मुश्रिक़ीने मक्का ने […]

औस और खजरज में मुहब्बत और यहूद की दुश्मनी

मदीना तय्यिबा में मुख्तलिफ कबीले आबाद थे, उन में मुशरिकों के दो कबीले औस और खजरज थे, उन के अकसर अफराद इस्लाम में दाखिल हो गए थे, इस्लाम से पहले उन दोनों क़बीलों में हमेशा लड़ाई रहा करती थी। आप (ﷺ) की आमद के मौके पर ईमान क़बूल करने की वजह से दोनों कबीलों के […]

मदीना के कबाइल से हुजूर (ﷺ) का मुआहदा

मदीना तय्यिबा में मुख्तलिफ नस्ल व मज़हब के लोग रहते थे, कुफ्फार व मुश्रिकीन के साथ यहुद भी एक लम्बे जमाने से आबाद थे। रसूलुल्लाह (ﷺ) ने मदीना पहुँचने के बाद हिजरत के पहले ही साल मुसलमानों और यहूदियों के दर्मियान बाहमी तअल्लुकात ख़ुशगवार रखने के लिये एक बैनल अक्रवामी मुआहदा फर्माया। ताके नसल व […]

मदीना में मुनाफिक़ीन का जुहूर

मुनाफिक उस शख्स को कहते हैं जो जबान से अपने आप को मुसलमान जाहिर करे, मगर दिल में कुफ्र छुपाए रखे, जब मुसलमान हिजरत कर के मदीना आ गए तो लोगों के ईमान कबूल करने की वजह से इस्लाम तेजी से फैलने लगा और मुसलमानों को ताक़त व कुव्वत हासिल होने लगी,तो इस्लाम और मुसलमानों […]

असहाबे सुफ्फा

जब मस्जिदे नबवी की तामीर हुई, तो उस के एक तरफ चबूतरा बनाया गया था, जिस को सुफ़्फ़ा कहा जाता है। यह जगह इस्लामी तालीम व तरबियत और तब्लीग व हिदायत का मरकज़ था, जो सहाबा (र.अ) यहाँ रहा करते थे, उन को “असहाबे सुफ्फा” कहा जाता है, इन लोगों ने अपनी ज़िंदगी को अल्लाह […]

मुहाजिर और अंसार में भाईचारा

मक्का के मुसलमान जब कुफ्फार व मुशरिकीन की तकलीफों से परेशान हो कर सिर्फ अल्लाह, उसके रसूल और दीने इस्लाम की हिफाजत के लिये अपना माल व दौलत, साज व सामान और महबूब वतन को छोड़ कर मदीना मुनव्वरा हिजरत कर गए। उस मौके पर रसूलल्लाह (ﷺ) ने उन मुसलमानों की दिलदारी के लिये आपस […]

अज़ान की इब्तेदा

हजरत इब्ने उमर (र.अ) फ़र्माते हैं के हुजूर (ﷺ) ने जमात की नमाज के लिये जमा करने का मशवरा किया, तो सहाब-ए-किराम (र.अ) ने मुख़्तलिफ राएँ पेश की, किसी ने यहूद की तरह बूक (Beegle) बजाने और किसी ने ईसाइयों की तरह नाकूस (घंटी) बजाने का मशवरा दिया, लेकिन आप (ﷺ) ने पसंद नहीं फ़र्माया, […]

मस्जिदे नबवी की तामीर

हिजरत के बाद रसूलुल्लाह (ﷺ) ने सब से पहले एक मस्जिद की तामीर फ़रमाई, जिस को आज “मस्जिदे नब्वी” के नाम से जाना जाता है। उस के लिये वही जगह मुन्तखब की गई थी, जहाँ हुजूर (ﷺ) की ऊँटनी बैठी थी, यह जमीन बनू नज्जार के दो यतीम बच्चों की थी, जिस को आप (ﷺ) […]

हज़रत खदीजा (र.अ) की फजीलत व खिदमात

उम्मुल मोमिनीन हज़रत खदीजा (र.अ) को जो फज़ल व कमाल अल्लाह तआला ने अता फ़रमाया था, उस में कयामत तक कोई खातून शरीक नहीं हो सकती, उन्होंने सब से पहले हुजूर (ﷺ) की नुबुव्वत की तसदीक करते हुए ईमान कबूल किया। सख्त आज़माइश में आप (ﷺ) का साथ देना, इस्लाम के लिए हर एक तकलीफ़ […]

हजरत सालेह (अ.) की दावत और कौम का हाल

हज़रत सालेह हजरत हूद के तकरीबन सौ साल बाद पैदा हुए। कुरआन में उन का तजकिरा ८ जगहों पर आया है। अल्लाह तआला ने उन्हें कौमे समूद की हिदायत व रहेनुमाई के लिये भेजा था। उस कौम को अपनी शान व शौकत, इज्जत व बड़ाई फक्र व गुरूर और शिर्क व बुत परस्ती पर बड़ा […]

मदीना मुनव्वरा

तुफाने नूह के बाद हज़रत नूह (अ.) के परपोते इमलाक़ बिन अरफख्शज बिन साम बिन नूह यमन में बस गए थे। अल्लाह तआला ने उन को अरबी जबान इलहाम की, फिर उन की औलाद ने अरबी बोलना शुरू कर दिया, यह अरब के इलाकों में चारों तरफ फैले, इस तरह पूरे जज़ीरतुल अरब में अरबी […]

वह मुबारक घर जहाँ आप (ﷺ) ने कयाम फर्माया

रसूलुल्लाह (ﷺ) जब मक्का से हिजरत कर के मदीना आए, तो यहाँ के लोगों ने आप (ﷺ) का पुर जोश इस्तिकबाल किया। कुबा से मदीना तक रास्ते के दोनों जानिब सहाब-ए-किराम की मुक़द्दस जमात सफ बनाए हुए खड़ी थी, जब आप मदीने में दाखिल हए तो हर कबीले और खान्दानवाला ख्वाहिशमन्द था और हर शख्स […]

मदीना में हुजूर (ﷺ) का इस्तिकबाल

कुबा में चौदा दिन कयाम फ़र्मा कर रसूलुल्लाह (ﷺ) मदीना तय्यिबा के लिये रवाना हो गए, जब लोगों को आप के तशरीफ लाने का इल्म हुआ, तो खुशी में सब के सब बाहर निकल आए और सड़क के किनारे खड़े हो गए, सारा मदीना “अल्लाहु अक्बर” के नारों से गूंज उठा, अंसार की बच्चियाँ खुशी […]

हज़रत इस्हाक़ (अ.) की पैदाइश

हजरत इस्हाक़ (अ.) की विलादत बा सआदत अल्लाह तआला की एक बड़ी निशानी है, क्योंकि उन की पैदाइश ऐसे वक्त में हुई जब के उन के वालिद हजरत इब्राहीम (अ.) की उम्र 100 साल और उनकी वालिदा हजरत सारा की उमर 90 साल हो चुकी थी, हालाँके आम तौर पर इस उम्र में औलाद नहीं होती है। जब फरिश्तों […]

हुजूर (ﷺ) का एक तारीख़ी फैसला

रसूलुल्लाह (ﷺ) की नुबुव्वत से चंद साल क़ब्ल खान-ए-काबा को दोबारा तामीर करने की जरुरत पेश आई। तमाम कबीले के लोगों ने मिल कर खान-ए-काबा की तामीर की, लेकिन जब हज्रे अस्वद को रखने का वक्त आया, तो सख्त इख्तिलाफ पैदा हो गया, हर कबीला चाहता था के उस को यह शर्फ हासिल हो, लिहाजा […]

हुजूर (ﷺ) गारे हिरा में

नुबुव्वत मिलने का वक़्त जितना करीब होता गया, उतना ही रसूलुल्लाह (ﷺ) तन्हाई को जियादा ही पसन्द करने लगे। सबसे अलग हो कर अकेले रहने से आप को बड़ा सुकून मिलता था। आप अकसर खाने पीने का सामान ले कर कई कई दिन तक मक्का से दूर जाकर “हिरा” नामी पहाड़ के एक गार में […]

हुजूर (ﷺ) को नुबुव्वत मिलना

जब दुनिया में बसने वाले इंसान जहालत व गुमराही में भटकते हुए आखरी हद तक पहुँच गए। अल्लाह तआला ने उनकी हिदायत व रहनुमाई का फैसला फ़रमाया और शिर्क व बुतपरस्ती से निकाल कर ईमान व तौहीद की दौलत से नवाजने का इरादा किया और जिस रौशनी की आमद का एक ज़माने से इन्तेजार हो रहा […]

पहली वही के बाद हुजूर (ﷺ) की हालत

गारे हिरा में हुजूर (ﷺ) को नुबुव्वत मिलने और वही उतरने का जो वाकिआ पेश आया था, वह जिंदगी का पहला वाकिआ था, इस लिये फितरी तौर पर आप को घबराहट महसूस हुई और इसी हालत में घर तशरीफ़ लाये और कहा के “मुझे चादर उढा दो मुझे चादर उदा दो” चुनान्चे हज़रत ख़दीजा (र.अ.) […]

दावत व तबलीग़ का हुक्म

नुबुव्वत मिलने के बाद भी हुजूर (ﷺ) बादस्तूर गारे हिरा जाया करते थे। शुरू में सूरह अलक़ की इब्तेदाई पाँच आयतें नाज़िल हुईं, फिर कई दिनों तक कोई वहीं नाज़िल नहीं हुई। उस को “फतरतुलवह्य” का जमाना कहते हैं। एक रोज़ आप गारे हिरा से तशरीफ ला रहे थे के एक आवाज़ आई, आप ने […]

सफा पहाड़ पर इस्लाम की दावत

नुबुव्वत मिलने के बाद रसूलुल्लाह (ﷺ) तीन साल तक पोशीदा तौर पर दीन की दावत देते रहे, फिर अल्लाह तआला की तरफ से हुजूर (ﷺ) को खुल्लमखुल्ला इस्लाम की दावत देने का हुक्म हुआ, इस हुक्म के बाद रसूलुल्लाह (ﷺ) ने सफा पहाड़ की चोटी पर चढ़ कर मक्का के तमाम खानदान वालों को आवाज़ […]

रसूलुल्लाह (ﷺ) की चचा अबू तालिब से गुफ्तगू

जब रसूलुल्लाह (ﷺ) लोगों की नाराजगी की परवा किये बगैर बराबर बुत परस्ती से रोकते रहे लोगों को सच्चे दीन की दावत देते रहे, तो कुरैश के सरदारों ने आप (ﷺ) के चचा अबू तालिब से शिकायत की, के तुम्हारा भतीजा हमारे माबूदों को बुरा भला कहता है, हमारे बाप दादाओं को गुमराह कहता है। […]