हजरत शुएब अलैहि सलाम» Qasas ul Anbiya: Part 14

हज़रत शुऐब अलैहि सलाम की कौम

हज़रत शुऐब अलैहि सलाम मदयन या मदयान की ओर भेजे गए थे। मदयन एक कबीले का नाम है, जो हजरत इब्राहीम अलैहि सलाम के बेटे मदयन की नस्ल से था। शुएब अलैहि सलाम भी चूंकि उसी नस्ल और उसी क़बीले से थे, इसलिए उनके भेजे जाने के बाद यह कौम ‘शुऐब की क़ौम‘ (क़ौमे शुऐब) कहलाई।

मदयन या असहाबे ऐकः

कुरआन मजीद में इस क़बीले से मुताल्लिक़ हमको दो बातें बताई गई।

………. तर्जुमा- ‘एक यह कि वह इमामे मुबीन पर आबाद था और लूत की कौम और मदयन दोनों बड़ी शाहराहे पर आबाद थे।‘ [सूरह अल हिज्र 15:79]

अरब के भूगोल में जो शाहराह (Main Road) हिजाज़ के ताजिर क़ाफ़िलों को शाम, फलस्तीन, यमन, बल्कि मिस्र तक ले जाती और लाल सागर के पूर्वी किनारे से होकर गुजरती थी, कुरआन उसी को ‘इमामे मुबीन‘ (खुला और साफ़ रास्ता) कहता है, जहां तक अस्हाबे ऐकः का ताल्लुक है, तो अरबी में ‘ऐका’ हरी-भरी झाड़ियों को कहते हैं जो झांदले की शक्ल अख्तियार कर लेती है।

………. इन दोनों बालों के जान लेने के बाद मदयन की आबादी के बारे में यही कहा जा सकता है कि मदयन का कबीला लाल सागर के पूर्वी किनारे और आब के उत्तर पश्चिम में ऐसी जगह आबाद था जो शाम से मिले हुए हिजाज़ का आखिरी हिस्सा कहा जा सकता है। कुछ विद्वानों ने मदयन और अस्हाबे ऐका में फर्क किया है, लेकिन तीही बात यही है कि मदयन और असहाबे ऐकः एक ही कबीला है जो बाप की निस्बत से मदयन कहलाया और जमीन की तबई और भौगोलिक हैसियत से अस्हाबे ऐका कहलाया।

हक की दावत

बहरहाल शुऐब अलैहि सलाम जब अपनी क़ौम में भेजे गए तो उन्होंने देखा कि अल्लाह की नाफरमानी और बड़े गुनाह के काम सिर्फ कुछ लोगों में ही नहीं पाए जाते। बल्कि सारी कौम इसकी शिकार है और अपनी बद-आमालियों में इतनी मस्त है कि एक लम्हे के लिए भी उनको यह एहसास नहीं होता कि जो कुछ हो रहा है, अल्लाह की नाफरमानी और गुनाह है बल्कि ये अपने इन आमाल को फक्र की वजह समझते हैं।

उनकी बहुत-सी नाफरमानियों और बद-अख़्लाकियों से हटकर जिन गंदे कामों ने खास तौर से उनमें रिवाज पा लिया था, वे यह थे-
1. बुतपरस्ती और मुशरिकाना रस्म और अकीदे।
2. ख़रीदे बेचने में पूरा लेना और कम तौलना, यानी दूसरे को उसके हक में कम देना और अपने लिए हक के मुताबिक़ लेना, बल्कि उससे ज्यादा।
3. तमाम मामलों में खोट और डाकाजनी।

………. कौमों के आम रिवाज के मुताबिक असल में उनकी सनआसानी, ऐश परस्ती, दौलत की ज़्यादती, जमीन और बालों की जरखेजी और हरियाली ने उनको इतना घमंडी बना दिया था कि वे इन तमाम चीज़ों को अपनी जाती मीरास और अपना खानदानी हुनर समझ बैठे थे और एक लम्हे के लिए भी उनके दिल में यह खतरा नहीं गुज़रता था कि यह सब कुछ अल्लाह की अता और बशिश है कि शुक्रगुज़ार होते और सरकशी से बाज़ रहते, ग़रज़ उनकी खुशहाली ने उनमें तरह-तरह की बद-अख़्लाक़ियां और किस्मकिस्म के ऐब पैदा कर दिए थे।

………. आख़िर हक़ की गैरत हरकत में आई और अल्लाह की सुन्नत के मुताबिक़ उनको हक़ का रास्ता दिखाने, नाफ़रमानियों और ग़लत और गन्दे कामों से बचाने और अमीन व मुत्तकी और अख़्लाक़ वाला बनाने के लिए उन्हीं में से एक हस्ती को चुन लिया और नुबूवत व रिसालत से नवाज़ कर उसको इस्लाम की दावत और हक़ के पैग़ाम का इमाम बनाया। यह हस्ती हजरत शुऐब अलैहि सलाम की जाते गरामी थी।

………. अल्लाह की तौहीद और शिर्क से बेजारी का एतकाद तो तमाम (अलैहिमुस्सलाम) की तालीम की मुश्तरक बुनियाद और असल है जो शुऐब के हिस्से में भी आई थी, मगर कौम की मासूस बद-अख्लानियों पर तवज्जोह दिलाने और उनको सीधे रास्ते पर लाने के लिए उन्होंने कानून को भी अहमियत दी कि बेचने-खरीदने के मामले में यह हमेशा नजरों में रहना चाहिए कि जो जिसका हक है, वह पूरा-पूरा उसको मिले कि दन्यता मामलों में यही एक ऐसी बुनियाद है जो डगमगा जाने के बाद हर किस्म के जुल्म, फ़िस्क व फुजूर और मुस्लिक खराबियों और बद-अख़्लाक्रियों की वजह बनती है।

………. खुलासा यह है कि हजरत शुऐब अलैहि सलाम ने भी अपनी कौम की बदआमालियों को देखकर बड़ा दुख महसूस किया और रुश्द ब हिदायत की तालीम देते हुए क़ौम को उन्हीं उसूलों की तरफ़ बुलाया जो नबियों की दावत व इर्शाद का खुलासा है –
उन्होंने फ़रमाया : ‘ऐ कौम! एक अल्लाह की इबादत कर, उसके अलावा कोई इबादत के काबिल नहीं है और ख़रीदने-बेचने में नाप-तौल को पूरा रख और लोगों के साथ मामलों में खोट न कर, कल तक मुम्किन है कि तुझको उन बद-अख्लाकीयों और बुराइयों का हाल मालूम न हुआ हो, मगर आज तेरे पास अल्लाह की हुज्जत, निशानी और बुरहान आ चुका, अब जहल व नादानी, अक्ल व दरगुज़र के काबिल नहीं है, हक को कुबूल कर और बातिल से बाज़ आ कि यही कामियाबी और कामरानी की राह है और अल्लाह की जमीन में फ़ित्ना व फ़साद न कर, जबकि अल्लाह तआला ने उसकी सलाह व खैर के तमाम सामान जुटा दिए, अगर तुझमें ईमान व यकीन की सदाक़त मौजूद है तो समझ कि यही फलाह व बहबूदी की राह है और देख ऐसा न कर कि हक की दावत के रास्ते को रोकने और लोगों को लूटने के लिए हर राह पर जा बैठे और जो आदमी भी ईमान ले आए उसको अल्लाह का रास्ता अख्तियार करने पर धमकियां देने लगे और उसमें टेढ़ पैदा करने पर उत्तर आए। ऐ कौम के लोगो! उस वक़्त को याद करो और अल्लाह का एहसान मानो कि तुम बहुत थोड़े थे, फिर उसने अम्न व आफ़ियत देकर तुम्हारी तायदाद को ज्यादा से ज्यादा बढ़ा दिया।

………. ‘ऐ मेरी कौम! जरा इस पर भी गौर कर कि जिन लोगों ने अल्लाह की जमीन में फ़साद फैलाने का तरीका अख्तियार किया था, उनका अंजाम कितना खरतनाक हुआ, और अगर तुममें से एक जमाअत मुझ पर ईमान ले आई और एक जमाअत ईमान नहीं ले आई तो सिर्फ इतनी ही बात पर मामला ख़त्म हो जाने वाला नहीं, बल्कि सब्र के साथ इंतिज़ार कर, यहां तक कि अल्लाह तआला हमारे दर्मियान आखिरी फैसला कर दे और वही बेहतरीन फैसला करने वाला है।’

………. हज़रत शुऐब अलैहि सलाम बड़े फ़सीह व बलीग़ मुरिर (स्पष्ट और उत्साहवर्धक वक्ता) थे। शीरीं कलामी (बातों में मिठास) हुस्ने खिताबत (सुन्दर वक्तव्य) तर्जेबयान (वर्णन-शैली) और तलाक़ते लिसानी (भाषा-विद्वता) में बहुत नुमायां इम्तियाज रखते थे, इसलिए मुफस्सिर (टीकाकार) उनको खतीबुल अंबिया के लकब से याद करते हैं। पस उन्होंने निहायत नर्म-गर्म हर तरीके से रुश्द व हिदायत के ये कलिमे कहे, पर उस बदबख्त क़ौम पर ज़रा भी कोई असर न हुआ और कुछ कमजोर और बूढ़े लोगों के अलावा किसी ने हक़ के पैग़ाम पर कान न धरा, वे खुद भी इसी तरह बद-आमाल (दुष्कर्मी) रहे और दूसरों का रास्ता भी मारते रहे, वे रास्तों में बैठ जाते और हज़रत शुऐब अलैहि सलाम के पास आने जाने वालों को हक कुबूल करने से रोकते और अगर मौका लग जाता तो लोगों को लूट लेते।

………. अगर इस पर भी कोई खुशकिस्मत हक़ पर लब्बैक कह देता, तो उसको डराते-धमकाते और तरह-तरह से टेढ़े रास्ते पर चलने पर आमादा करते, लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद हजरत शुऐब अलैहि सलाम की हक की दावत का सिलसिला बराबर जारी रहा, तो उनमें से बड़े किस्म के लोगों ने, जिन में अपनी शौकत और ताकतवर पर घमंड था, हजरत शुऐब अलैहि सलाम से कहाः ऐ शुऐब! दो बातों में से एक बात ज़रूर होकर रहेगी या हम तुझको और तुझ पर ईमान लाने वालों को अपनी बस्ती में से निकाल देंगे और तेरा देश निकाला करेंगे या तुझको मजबूर करेंगे कि फिर हमारे दीन में वापस आ जाओ।

………. हज़रत शुऐब अलैहि सलाम ने फ़रमाया : ‘अगर हम तुम्हारे दीन को ग़लत और बातिल समझते हों, तब भी जबरदस्ती मान लें, यह तो बड़ा जुल्म है? जबकि हमको अल्लाह तआला ने तुम्हारे उस दीन से नजात दे दी तो फिर उसकी तरफ लौट जाएं, तो इसका मतलब तो यह होगा कि हमने झूठ बोल अल्लाह तआला पर बोहतान बांधा, यह नामुमकिन है। हां, अगर अल्लाह की (जो कि हमारा परवरदिगार है) यही मर्जी हो तो वह जो चाहेगा करेगा। हमारे रब का इल्म तमाम चीज़ों पर छाया हुआ है, हमारा तो सिर्फ उसी पर भरोसा है। ऐ परवरदिगार! तू हमारे और हमारी कौम के दर्मियान हक़ और सजा के साथ फैसला कर दे, तू ही बेहतरीन फैसला करने वाला है।

………. कौम के सरदारों ने जब हज़रत शुऐब अलैहि सलाम का यह अज़्म व इस्तिकलाल देखा तो उन से चेहरा फेर कर अपनी कौम के लोगों से कहने लगा : ‘ख़बरदार! अगर तमने शुऐब का कहना माना तो तुम हलाक व बर्बाद हो जाओगे।

………. हजरत शुऐब अलैहि सलाम ने यह भी फ़रमाया : ‘देखो, अल्लाह तआला ने मुझको इसलिए भेजा है कि मैं अपनी ताक़त पर तुम्हारी इस्लाह की कोशिश करूं और मैं जो कुछ कहता हूं उसकी सदाक़त और सच्चाई के लिए अल्लाह की हुज्जत और दलील और निशानी भी पेश कर रहा हूं। मगर अफ़सोस तम इस वाजेह हुज्जत को देखकर भी सरकशी और नाफरमानी पर क़ायम हो और मुखालफ़त का कोई पहलू ऐसा नहीं है जो तुमसे छूटा हुआ हो, फिर मैं तुमसे अपनी इस रुश्द व हिदायत के बदले में कोई उजरत भी नहीं मांगता और न कोई दुनिया के नफ़ा को तलब कर रहा हूं। मेरा बदला तो अल्लाह के पास है और अगर तुम अब भी न मानोगे, तो मुझे डर है कि कहीं अल्लाह का अज़ाब तुमको हलाक व बर्बाद न कर डाले, उसका फैसला अटल है और किसी की मजाल नहीं कि उसको रद्द कर दे।

………. क़ौम के सरदार त्यौरी चढ़ा कर बोले : शुऐब! क्या तेरी नमाज़ हमसे यह चाहती है कि हम अपने बाप-दादा के देवताओं को पूजना छोड़ दें और उसको अपने माल व दौलत में यह अख्तियार न रहे कि जिस तरह चाहें, मामला करें, अगर हम कम तौलना छोड़ दें, लोगों के कारोबार में खोट न करें तो ग़रीब और खल्लाश होकर रह जाएं पस क्या ऐसी तालीम देने में तुझको कोई संजीदा और सच्चा रहबर कह सकता है?

………. हजरत शुऐब अलैहि सलाम ने बड़ी दिलसोजी और मुहब्बत के साथ फ़रमायाः ऐ कौम! मुझे यह डर लग रहा है कि तेरी ये बेवाकिया और अल्लाह के मुकाबले में नाफरमानियां कहीं तेरा भी वह अंजाम न कर दें, जो तुझसे पहले कौमे नूह, कौमे हूद, क़ौम सालेह और कौमे लूत का हुआ। अब भी कुछ नहीं गया, अल्लाह के सामने झुक जा और अपनी बद-किरदारियों के लिए बख्रिशश का तलबगार बन और हमेशा के लिए उनसे तौबा कर ले। बेशक मेरा परवरदिगार रहम करने वाला और बहुत ही मेहरबान है। वह तेरी तमाम खताएं बख्श देगा।

………. कौम के सरदारों ने यह सुनकर जवाब दिया: ‘शुऐब! हमारी समझ में कुछ नहीं आता कि तू क्या कहता है? तू हम सबसे कमजोर और ग़रीब है। अगर तेरी बातें सच्ची होती, तो तेरी जिंदगी हम सबसे अच्छी होती और हमको सिर्फ तेरे खानदान का डर है, वरना तुझको संगसार करके छोड़ते, तू हरगिज हम पर ग़ालिब नहीं आ सकता।

………. हज़रत शुऐब अलैहि सलाम ने फ़रमाया : ‘अफ़सोस है तुम पर! क्या तुम्हारे लिए अल्लाह के मुकाबले में मेरा ख़ानदान ज़्यादा डर की वजह बन रहा है, हालांकि मेरा रब तुम्हारे तमाम कामों का एहाता किए हुए है और वह दाना व बीना है।’
खैर, अगर तुम नहीं मानते तो तुम जानो, तो वह सब कुछ करते रहो जो कर रहे हो, बहुत जल्द अल्लाह का फ़ैसला बता देगा कि

………. अजाब का हक़दार कौन है और कौन झूठा और काजिब है, तुम भी इन्तिज़ार करो और में भी इन्तिजार करता हूँ। आखिर वही हुआ जो अल्लाह के कानून का अब्दी व सरमदी फैसला है, ‘यानी हुज्जत व बुरहान की रोशनी आने के बाद भी जब बातिल पर इसरार हो और उसकी सच्चाई का मज़ाक उड़ाया जाए और उसकी इताअत में रुकावटें डाली जाएं, तो फिर अल्लाह का अज़ाब इस मुज्रिमाना जिंदगी का खात्मा कर देता है और आने वाली कौमो के लिए उसको इबरत व मौइज़त बना दिया करता है।

अज़ाब की किस्में

कुरआन अज़ीज़ कहता है कि नाफरमानी और सरकशी के बदले में ही शुएब अलैहि सलाम की कौम को दो किस्म के अज़ाब ने आ घेरा. एक ज़लज़ले का अजाब और दूसरा आग की बारिश का अजाब यानी जब वे अपने घरों में आराम कर थे तो यकायक एक हौलनाक ज़लज़ला आया। अभी यह हौलनाकी ख़त्म न हुई थी कि ऊपर से आग बरसने लगी और नतीजा यह निकला कि सुबह को देखने वालों ने देखा कि कल के सरकश और मगरूर आज घुटनों के डर औंधे झुलसे हुए पड़े हैं।

………. तर्जुमा- ‘फिर आ पकड़ा उनको ज़लज़ले ने, पस सुबह को रह गए अपने-अपने घरों के अन्दर औंधे पड़े।‘ [अल-आराफ 7:78]

………. तर्जुमा- ‘फिर उन्होंने शुऐब को झुठलाया, पस आ पकड़ा उनको बादल वाले अज़ाब ने (जिसमें आग थी) बेशक वह बड़े होलनाक दिन का अज़ाब था।‘ [सूरह अस-शुआरा 26:189]

हज़रत शुऐब अल० की कब्र

हजरमौत में एक क़ब्र है, वहां के बाशिदों का दावा है कि यह हज़रत शुऐब अलैहि सलाम की क़ब्र है, जो मदयन की हलाकत के बाद यहां बस गए थे और यहीं उनकी वफ़ात हुई।

सबक़ भरी नसीहतें

1. इस्लाम में बन्दों के हक की हिफ़ाज़त, समाजी दुरुस्तकारी और मामलों में दवानत व अमानत को इस दर्जा अहम समझा गया है कि अल्लाह ने जलीलुलकद्र पैग़म्बर को भेजे जाने का मक्सद इसी को करार दिया और इन्हीं मामलों की इस्लाह के लिए रसूल बनाकर भेजा।

2. खरीदने-बेचने में दूसरे के हक को पूरा न देना इंसानी जिंदगी में ऐसा रोग लगा देता है कि यह बद-अखलाखी बढ़ते-बढ़ते बन्दों के तमाम हक़ों के बारे में हक़ मारने की खसलत पैदा कर देती है और इस तरह इंसानी शराफ़त और आपसी भाईचारा और मुहब्बत के रिश्ते को काट करके लालच, लोभ, खुदगर्जी और कंजूसी जैसे ख़राब कामों वाला बना देती है।

3. नाप-तौल में इंसाफ़ सिर्फ चीज़ों के ख़रीदने-बेचने तक महदूद नहीं है, बल्कि इंसानी किरदार का यह कमाल होना चाहिए कि अल्लाह और उसके बन्दे के तमाम हक़ और फ़र्ज़ में इस असल को काम की बुनियाद बनाए और किसी मौके पर किसी हालत में भी अद्ल व इंसाफ़ के तराजू को हाथ से जाने न दे।

4. ख़रीदने-बेचने के दर्मियान नाप-तौल में कमी न करना और इंसान को बाक़ी रखना, गोया एक कसौटी है कि जो इंसानी जिंदगी के मामूली लेन-देन में अद्ल व इंसाफ़ नहीं बरतता, उससे क्या उम्मीद हो सकती है कि वह अहम दीनी और दुनियावी मालों में अद्ल व इंसाफ़ को काम में लाएगा।

5. सुधार के बाद अल्लाह की ज़मीन में फ़साद पैदा करने से बढ़कर कोई जुर्म नहीं है, इसलिए कि जुल्म, किब्र, कत्ल और इस्मतरेज़ी जैसे बड़े-बड़े जुर्मों की बुनियाद और असल यही रज़ीला (गन्दे और घटिया काम) हैं।

6. नबियों और उनके मानने वालों की जिंदगी के पढ़ने से पता चलता है कि नबियों के रोशन दलील देने, आयातुल्लाह यानी अल्लाह की निशानियां दिखाने, मुहब्बत और रहम के जज्बो को जाहिर करने और अपनी दावत व तब्लीग पर किसी किस्म का अज्र तलब न करने का इत्मीनान दिलाते रहे हैं मगर इसके बावजूद दूसरी तरफ यानी बातिल पर कायम रहने वालों की तरफ़ से यही जबाव मिलता रहा है कि तमको संगसार कर दिया जाएगा, क़त्ल कर दिया जाएगा। अल्लाह के पैगम्बर के वजूद तक को बरदाश्त नहीं किया गया और यहां तक कहा गया कि अगर सच्चे हो तो जिस अज़ाब से डराते हो, वह अभी ले आओ, वरना तो हमेशा के लिए तुम्हारा और तुम्हारे मिशन का ख़ात्मा कर दिया जाएगा।

7. हक़ व बातिल का यही वह आखिरी मरहला है जिसके बाद अल्लाह तआला का वह कानून जिसको ‘अमल के बदले का कानून’ कहा जाता है, ऐसी सरकश और तकब्बुर भरी कौमों के लिए दुनिया ही में लागू हो जाता है और उनको हलाक व तबाह करके आने वाली नस्लों और क़ौमों के लिए इबरत और नसीहत का सामान जुटा देता है।

हज़रत शुऐब का ज़िक्र कुरआन पाक में

कुरआन हकीम में हजरत शुऐब अलैहि सलाम और उनकी कौम का तज़किरा सूरह आराफ, सूरह हूद और सूरह शुअरा में कुछ तफ्सील से किया गया है और सूरह हिज्र व सूरह अंकबूत में थोड़े में है।

इंशाअल्लाह अगले पार्ट (Qasas ul Anbiya: Part 15) में हम हज़रत मूसा और हारून अलैहि सलाम तज़किरा करेंगे।

To be continued …

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