हजरत मूसा अलैहि सलाम » Qasas ul Anbiya: Part 15.1

हज़रत मूसा अलैहि सलाम की शुरूआती जिंदगी
और बनी इसराईल मिस्र में

………. हज़रत यूसुफ़ अलैहि सलाम के किस्से में बनी इसराईल का जिक्र सिर्फ इसी क़दर किया गया था कि हज़रत याकूब और उनका ख़ानदान हज़रत यूसुफ़ अलैहि सलाम से मिलने मिस्र में आए, मगर उसके सदियों बाद फिर एक बार कुरआन करीम बनी इसराईल के वाकिए तफ्सील के साथ सुनाता है जिनसे मालूम होता है कि बनी इसराईल हज़रत यूसुफ़ अलैहि सलाम के ज़माने में मिस्र ही में बस गए थे। तौरात से और तफ़सील मालूम होती है और यह भी कि हज़रत यूसुफ़ अलैहि सलाम ने फ़िरऔन से अपने बाप और ख़ानदान के लिए अर्जे जाशान (Goshen) तलब की जो फ़िरऔन ने ख़ुशी-खुशी उनके सुपुर्द कर दी।

………. बहरहाल इन तफ़्सीलों से यह वात साफ़ हो जाती है कि बनी इसराईल हजरत यूसुफ़ अलैहि सलाम और हज़रत मूसा अलैहि सलाम की दर्मियानी सदियों में मिस्र में आबाद रहे और उनकी तायदाद लगभग छः लाख हो गई थी। (‘नेशनल ज्योग्रेफ़िक’ जनवरी 1078 ई. के मुताबिक ये छः सौ खानदान यानी पन्द्रह हजार लोगों से कुछ कम ही हो सकते हैं।)


फ़िरऔन

………. शुरू ही में यह साफ़ कर देना ज़रूरी है कि “फ़िरऔन‘ मिस्र के बादशाहों का लकब है, किसी ख़ास हुक्मरौं या बादशाह का नाम नहीं है। तारीखी एतबार से तीन हजार साल कब्ल मसीह से शुरू होकर सिकन्दर आजम के जमाने तक फ़िरऔनों के 31 खानदान मिस्र पर हुक्मरा रहे हैं। (अल्लाहु आलम) हजरत मूसा अलैहि सलाम के जमाने में मिस्र का हुक्मरां (फ़िरऔन) कौन था और उसका क्या नाम था, यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता, इसलिए यहां फ़िरऔन को उस वक़्त के मिस्र का हुक्मरां (शासक) समझा जाए।


फ़िरऔन का ख्वाब

………. तौरात में है और तारीख के माहिर भी कहते हैं कि फ़िरऔन को बनी इसराईल के साथ इसलिए दुश्मनी हो गई थी कि उस ज़माने के काहिनों, नजूमियों और क़याफ़ागरों ने उसको बताया था कि उसकी हुकूमत का ज़वाल एक इसराईली लड़के के हाथ से होगा और कुछ तारीख़ी रिवायतों में है कि फ़िरऔन ने एक भयानक ख्वाब देखा था, जिसकी ताबीर दरबार के ज्योतिषियों और काहिनों ने वहीं दी थी, जिसका ज़िक्र गुज़र चुका है। इस पर फ़िरऔन ने एक जमाअत को इसलिए मुकर्रर किया कि वह तफ़्तीश
और तलाश के साथ इसराईली लड़कों को क़त्ल कर दे और लड़कियों को छोड़ दिया करे।


हज़रत मूसा अलैहि सलाम की पैदाइश

………. हज़रत मूसा अलैहि सलाम का नसब (वंश) कुछ वास्तों से हज़रत याकूब अलैहि सलाम तक पहुंचता है। उनके वालिद का नाम इमरान और वालिदा का नाम यूकाबुद था। इमरान के घर में मूसा अलैहि सलाम की पैदाइश ऐसे ज़माने में हुई जबकि फ़िरऔन इसराईली लड़कों के क़त्ल का फैसला कर चुका था। बहरहाल जूं-जूं करके तीन माह तक उनके पैदा होने की किसी को मुतलक खबर न होने दी। इस सख्त और नाजुक वक़्त में आख़िर अल्लाह तआला ने मदद की और मूसा अलैहि सलाम की वालिदा के दिल में यह बात डाल दी कि एक ताबूत की तरह का सन्दूक बनाओ, जिस पर राल और रोगन पालिश कर दो, ताकि पानी अन्दर असर न कर सके और उसमें उस बच्चे को हिफाजत से रख दो और फिर उस सन्दूक को नील नदी के बहाव पर छोड़ दो।

………. मूसा अलैहि सलाम की मां ने ऐसा ही किया और साथ ही अपनी बड़ी लड़की मूसा की बहन को लगाया कि वह इस सन्दूक के बहाव के साथ किनारे-किनारे चलकर सन्दूक को निगाह में रखे और देखे कि अल्लाह उसकी हिफाजत का वायदा किस तरह पूरा करता है, क्योंकि मूसा अलैहि सलाम की वालिदा को अल्लाह तआला ने यह बशारत पहले ही सुना दी थी कि हम इस बच्चे को तेरी ही तरफ ला कर देंगे और यह हमारा पैग़म्बर और रसूल होगा।


फ़िरऔन के घर में तर्बियत

………. हज़रत मूसा अलैहि सलाम की बहन बराबर सन्दूक के बहाव के साथ-साथ किनारे-किनारे निगरानी करती जा रही थीं कि उन्होंने देखा सन्दूक तैरते हुए शाही महल के किनारे आ लगा और फ़िरऔन के घराने में से एक औरत ने ख़ादीमों के जरिए उसको उठवा लिया और शाही महल में ले गई। हज़रत मुसा अलैहि सलाम की हमशीरा (बहन) यह देखकर बहुत खुश हुई और हालात की सही तफ़्सील मालूम करने के लिए शाही महल की नौकरानियों में शामिल हो गई।

………. यहां यह बात हो रही थी, उधर हजरत मूसा अलैहि सलाम की वालिदा लतीफन रोवी के इन्तिजार में आंखें फैलाए हुए थीं कि लड़की (हज़रत मूसा की बहन) ने आकर पूरी दास्तान कह सुनाई और कहा कि अब तुम चलकर अपने बच्चे को सीने से लगाओ और आंखें ठंडी करो और उसका शुक्र अदा करो कि उसने अपना वायदा पूरा कर दिया। इस तरह अल्लाह तआला ने हजरत मूसा की परवरिश का पूरा इन्तिजाम कर दिया।


मूसा अलैहि सलाम का मिस्र से निकलना

………. हज़रत मूसा अलैहि सलाम एक अर्से तक शाही तबियत में बसर करते-करत जवानी के दौर में दाखिल हुए तो निहायत मज़बूत, कड़यल और बहादुर जवान निकले। चहरे से रौब टपकता और बातों से एक खास वकार और अजमत को शान शाहिर होती थी। उनको यह भी मालूम हो गया था कि वह इसराईली हैं और मिस्री खानदानों से इनकी कोई रिश्तेदारी नहीं है। उन्होंने यह भी देखा कि बनी इसराईल पर बड़े जुल्म हो रहे हैं और वे मिस्र में बड़ी जिल्लत और गुलामी की जिंदगी बसर कर रहे हैं। यह देखकर उनका खून खौलने लगता और मौके-मौके से इबरानियों की हिमायत व मदद में पेश हो जाते।

………. एक बार शहरी आबादी से एक किनारे जा रहे थे कि देखा एक मिस्री एक इसराईली को बेकार के लिए घसीट रहा है। इसराईली ने मूसा अलैहि सलाम को देखा तो लगा फ़रियाद करने और मदद चाहने। हज़रत मूसा को मिस्री की इस जाबिराना हरकत पर सख्त गुस्सा आया और उसको बाज़ रखने की कोशिश की, मगर मिस्री न माना, मूसा ने गुस्से में आकर एक तमांचा रसीद कर दिया। मिस्री इस मार को सह न सका और उसी वक्त मर गया। हजरत मूसा अलैहि सलाम ने यह देखा तो बहुत अफ़सोस किया, क्योंकि उनका इरादा बिल्कुल उसके क़त्ल का न था और नदामत व शर्मिन्दगी के साथ दिल में कहने लगे कि बेशक यह शैतान का काम है। वही इंसान को ग़लत रास्ते पर लगाता है और अल्लाह की बारगाह में अर्ज करने लगे कि यह जो कुछ हुआ, अनजाने में हुआ, मैं तुझसे माफ़ी चाहता हूं। अल्लाह ने भी उनकी ग़लती को माफ़ कर दिया और मग़फ़िरत की बशारत से नवाज़ा।

………. इधर शहर में मिस्री के क़त्ल की ख़बर फैल गई, मगर क़ातिल का कुछ पता न चला। आख़िर फ़िरऔन के पास मदद तलब की कि यह काम किसी इसराईली का है, इसलिए आप मदद फ़रमाएं। फ़िरऔन ने कहा कि इस तरह सारी क़ौम से बदला नहीं लिया जा सकता, तुम क़ातिल का पता लगाओ, मैं उसको ज़रूर पूरी सज्ञा दूंगा।

………. बुरा इत्तिफ़ाक़ कहिए या अच्छा इत्तिफ़ाक़ कि दूसरे दिन भी हज़रत मूसा अलैहि सलाम शहर के किनारे पर सैर फ़रमा रहे थे कि देखा वहीं इसराईली एक क़िब्ती से झगड़ रहा है और किब्ती गालिब है। मूसा अलैहि सलाम को देखकर कल की तरह उसने आज भी फ़रियाद की और मदद चाही।

………. इस वाकिए को देखकर हज़रत मूसा अलैहि सलाम ने दोहरी नागवारी महसूस की, एक तरफ़ क़िब्ती का जुल्म था और दूसरी तरफ़ इसराईली का शोर और पिछले वाकीए की याद थी, इसी झुंझलाहट में एक तरफ मिस्री को बाज रखने के लिए हाथ बढ़ाया और साथ ही इसराईलीही को झिड़कते हुए फरमाया ‘इन-क समावीयुन अमीन० (तू ही बेशक, खुला हुआ गुमराह है) यानी ख्वामखाही झगड़ा मोल लेकर दाद व फ़रियाद करता रहता है।

………. इसराईली ने हजरत मूसा अलैहि सलाम को हाथ बढ़ाते और फिर अपने मुताबिक नागवार और कड़वे अलफाज कहते सुना तो यह समझा कि यह मुझको मारने के लिए हाथ बढ़ा रहे हैं और मुझको पकड़ में लेना चाहते हैं, इसलिए शरा भरे अन्दाज में कहने लगा –

………. तर्जुमा- ‘जिस तरह कल तूने एक जान (क़िब्ती) को हलाक किया उसी तरह आप मुझको क़त्ल कर देना चाहता है।’ [क़ुरान 28:19]

………. मिस्री ने जब यह सुना तो उस वक्त फिरौनियों से जाकर सारी दास्ताँ कह सुनाई। उन्होंने फिरौन को इत्तिला दी कि मिस्री का कातिल मूसा है। फ़िरऔन ने यह सुना तो जल्लाद को हुक्म दिया कि मूसा को गिरफ्तार कर हाजिर करे। मिस्रियों के इस मज्मे में एक मुअज्जज शहरी वह भी था जो दिल व जान से हजरत मूसा से मुहब्बत रखता और इसराईली मजहब को जानता था।

………. यह फ़िरऔन ही के खानदान का आदमी था और दरबार में हाजिर था। उसने फ़िरऔन का यह हुक्म सुना तो फिरौनी जल्लाद से  पहले ही दरबार से निकल कर दौड़ता हुआ हज़रत मूसा की खिदमत में हाजिर हुआ और उनसे सारा किस्सा बयान किया और उनको मशविरा दिया कि इस वक्त मस्लहत यही है कि खुद को मिस्रियों से नजात दिलाइए और किसी ऐसे मक़ाम पर हिजरत कर जाइए जहां उनकी पकड़ न हो सके। हजरत मूसा अलैहि सलाम ने उसके मशविरे को कुबूल फ़रमाया और अर्जे मदयन की तरफ खामोशी के साथ रवाना हो गए।

To be continued …

इंशा अल्लाह! अगले पार्ट (15.2) में हम देखेंगे हज़रत मूसा अलैहि सलाम की शुएब अलैहि सलाम से मुलाकात और उनकी बेटी से आपका निकाह।

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