24. शव्वाल | सिर्फ पाँच मिनट का मदरसा (कुरआन व हदीस की रौशनी में)

  1. इस्लामी तारीख: हज़रत जैनब बिन्ते रसूलुल्लाह (ﷺ)
  2. हुजूर (ﷺ) का मुअजिजा: उंगलियों से पानी का निकलना
  3. एक सुन्नत के बारे में: कयामत की रुसवाई से बचने की दुआ
  4. एक अहेम अमल की फजीलत: खाने के बाद शुक्र अदा करना
  5. एक गुनाह के बारे में: कुफ्र करने वाले नाकाम होंगे
  6. दुनिया के बारे में : लोगों की कन्जूसी
  7. आख़िरत के बारे में: हौज़े कौसर क्या है ?
  8. तिब्बे नबवी से इलाज: खजूर से इलाज
  9. नबी ﷺ की नसीहत: मजलिस में जाये तो सलाम करे


1. इस्लामी तारीख:

हज़रत जैनब बिन्ते रसूलुल्लाह (ﷺ)

.     हज़रत जैनब हुजूर (ﷺ) की सब से बड़ी साहबजादी (बेटी) थीं, नुबुव्वत मिलने से तकरीबन दस साल पहले हजरत खदीजा (र.अ) से पैदा हुई, रसूलुल्लाह (ﷺ) की दावत के शुरु जमाने में ही मुसलमान हो गई।

.     उन का निकाह अबुल आस बिन रबीअ से हुआ था, वह उस वक्त तक मुसलमान नही हुए थे; इसलिए हिजरत न कर सकी, गजवा-ए-बद्र में कुफ्फ़ारे मक्का के साथ अबुल आस भी कैद हुए, सब ने अपने कैदी को छुड़ाने के लिए फ़िदया भेजा, जैनब ने भी वह हार जो हजरत ख़दीजा (र.अ) का दिया हुआ था फ़िदये में भेजा, जब हुजूर (ﷺ) की नजर उस हार पर पड़ी, तो आप (ﷺ) को हजरत ख़दीजा (र.अ) की याद आ गई और आँखों से आँसू जारी हो गए, सहाबा से मशवराह किया, यह बात तय हुई के अबुल आस को बगैर फ़िदया के रिहा किया जाए, इस शर्त पर के वह मक्का पहुँचने के बाद ज़ैनब (र.अ) को मदीना भेज दें। चुनांचे वह गए और अपने छोटे भाई के साथ मदीना रवाना किया मगर कुफ्फ़ारे मक्का ने उनको रोका उस वक्त उन को ज़ख्म भी आया, आखिर कार अबुलआस ने कुफ़्फ़ार से छुपा कर उन्हें मदीना भेज दिया।

.     छ: साल बाद सन ८ हिजरी में ज़ैनब (र.अ) का हिजरत वाला ज़ख्म हरा हुआ और उसी ज़ख्म की वजह से उन की शहादत हो गई।

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2. हुजूर (ﷺ) का मुअजिजा

हजरत कतादा (र.अ) की आँख का ठीक हो जाना

जंगे बद्र के दिन हज़रत कतादा बिन नोअमान (र.अ) की आँख में तीर लग गया, जिस की वजह से खून रुखसार पर बहने लगा, तो सहाबा (र.अ) ने रसूलुल्लाह (ﷺ) से पूछा : क्या उन की आँख निकाल दें? तो आप (ﷺ) ने मना फ़रमाया : और हजरत कतादा को बूलाकर अपनी हथेली से उन की आँख की तरफ़ इशारा किया, तो वह इतनी अच्छी हो गई के पता नहीं चलता था के कौन सी आँख में तीर लगा था।
[बैहकी फी दलाइलिन्नुयुष्या : १११२]

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4. एक सुन्नत के बारे में:

कयामत की रुसवाई से बचने की दुआ

कयामत के दिन जिल्लत व रुसवाई से बचने के लिए इस दुआ का एहतमाम करना चाहिए:

رَبَّنَا وَآتِنَا مَا وَعَدتَّنَا عَلَىٰ رُسُلِكَ وَلَا تُخْزِنَا يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ إِنَّكَ لَا تُخْلِفُ الْمِيعَادَ

तर्जमा : ऐ हमारे परवरदिगार! तूने जो अपने रसूलों से वादा किया है, वह हमें अता फर्माइये और कयामत के दिन हमें रुसवा न कीजिए बेशक तू वादा खिलाफ़ी नहीं करता। [सूर-ए-आले इमरान: १९४]

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5. एक अहेम अमल की फजीलत:

खाने के बाद शुक्र अदा करना

۞ हदीस: रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

“खाना खा कर जो (अल्लाह का) शुक्र अदा करता है, वह रोजा रख कर सब्र करने वालों के बराबर है।”

[मुस्तदरक : १५३७]

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6. एक गुनाह के बारे में:

कुफ्र करने वाले नाकाम होंगे

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है :

“बेशक जो लोग काफ़िर हो गए और (दूसरों को भी) अल्लाह के रास्ते से रोका और हिदायत जाहिर होने के बाद अल्लाह के रसूल की मुखालफ़त की, तो यह लोग अल्लाह (के दीन) को ज़रा भी नुकसान नहीं पहुँचा सकेंगे और अल्लाह तआला उन के तमाम आमाल को बरबाद कर देगा।”

[सूर-ए-मुहमम्द: ३२]

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7. दुनिया के बारे में :

लोगों की कन्जूसी

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

“सुनलो! तुम ऐसे हो के जब तुम को अल्लाह की राह में खर्च करने के लिए बुलाया जाता है, तुम में से बाज़ लोग बुख्ल करते हैं और जो शख्स कन्जूसी करता है, तो वह हकीकत में अपने ही लिए कन्जूसी करता है और अल्लाह तआला ग़नी है (किसी का मोहताज नहीं) और तुम सब उस के मोहताज हो।”

[सूर-ए-मुहमम्द: 38]

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8. आख़िरत के बारे में:

हौज़े कौसर क्या है ?

۞ हदीस: रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

कौसर जन्नत में एक नहर है, जिस के दोनों किनारे सोने के हैं और वह मोती और याकूत पर बहती है, उसकी मिट्टी मुश्क से ज़ियादा खुशबूदार, उस का पानी शहद से ज़्यादा मीठा और बर्फ से ज़ियादा सफेद है।”

[तिर्मिज़ी:३३६१, अन इब्ने उमर (र.अ)]

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9. तिब्बे नबवी से इलाज:

खजूर से इलाज

۞ हदीस: रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया :

“जचगी की हालत में तुम अपनी औरतों को तर खजूरे खिलाओ और अगर वह न मिलें तो सूखी खजूरे खिलाओ।”
[मुस्नदे अबूयअला: ४३४, अन अली (र.अ)]

फायदा: बच्चे की पैदाइश के बाद खजूर खाने से औरत के जिस्म का फ़ासिद खून निकल जाता है और न बदन की कमजोरी खत्म हो जाती है।

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10. नबी ﷺ की नसीहत:

मजलिस में जाये तो सलाम करे

۞ हदीस: रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया :

“जब तुम में से कोई आदमी मजलिस में जाए, तो सलाम करे और फिर जी चाहे, तो मजलिस में शरीक हो जाए, और फिर जाते वक्त भी सलाम कर के जाए।”

[तिर्मिज़ी : २७०६ . अन अबी हुरैराह (र.अ)]

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