28. शव्वाल | सिर्फ पाँच मिनट का मदरसा (कुरआन व हदीस की रौशनी में)

  1. इस्लामी तारीख: रसूलुल्लाह (ﷺ) के बेटे
  2. हुजूर (ﷺ) का मुअजिजा: नबी (ﷺ) की दुआ से बारिश का होना
  3. एक फर्ज के बारे में: नमाज़ों को सही पढ़ने पर माफी का वादा
  4. एक सुन्नत के बारे में: सुबह व शाम पढ़ने की दुआ
  5. एक अहेम अमल की फजीलत: रोज़ा जहन्नम से दूर करने का सबब
  6. एक गुनाह के बारे में: इस्लाम की दावत को ठुकराना एक बड़ा जुल्म
  7. दुनिया के बारे में : इन्सान की खस्लत व मिजाज
  8. आख़िरत के बारे में: जन्नत का खेमा
  9. तिब्बे नबवी से इलाज: बीमार को परहेज़ का हुक्म
  10. नबी ﷺ की नसीहत: सफो को पूरा करो

1. इस्लामी तारीख:

रसूलुल्लाह (ﷺ) के बेटे

.     रसूलुल्लाह (ﷺ) के दो फ़र्ज़न्द हजरत खदीजा से मक्का में पैदा हुए, बड़े हजरत कासिम (र.अ) हैं, जिन की वजह से आप की कुन्नियत अबुल कासिम है। दूसरे हजरत अब्दुल्लाह (र.अ) है जिनको ताहिर और तय्यब भी कहा जाता है, उन की पैदाइश नुबुव्वत के बाद हुई थी, उन के इन्तेकाल पर कुफ़्फ़ार ने यह अफ़वाह उड़ाई थी के हुजूर (ﷺ) के बेटे की मौत हो गई इस लिए अब उन का दीन भी नहीं चलेगा, उन की नस्ल भी नहीं चलेगी। हुजूर (ﷺ) को इस अफवाह से बहुत सदमा पहुँचा था।

.     हुजूर (ﷺ) की तसल्ली के लिए अल्लाह ने सूर-ए-कौसर नाज़िल फ़रमाई। हुजूर (ﷺ) के तीसरे बेटे हजरत मारिया किबतिया (र.अ) के बतन से माहे जिल हिज्जा सन ८ हिजरी में पैदा हुए, जिन का नाम इब्राहीम (र.अ) था, हुजूर (ﷺ) ने हज़रत मारिया (र.अ) को मदीना के मोहल्ला आलिया में रखा था। यह मोहल्ला बाद में सरया उम्मे इब्राहीम कहा जाने लगा।

.     हजरत इब्राहीम (र.अ) ने अठारह माह यानी डेढ साल की उम्र में इन्तेकाल फ़रमाया।

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2. हुजूर (ﷺ) का मुअजिजा

नबी (ﷺ) की दुआ से बारिश का होना

आप (ﷺ) और सहाबा (र.अ) सफर में जा रहे थे और पानी बिल्कुल खत्म हो गया, तो सहाबा ने आप (ﷺ) के सामने इस की शिकायत की। हुजूर (ﷺ) ने अल्लाह से दुआ फ़रमाई, अल्लाह ने उसी वक्त ( एक बादल भेजा वह इतना बरसा के सब लोग सैराब हो गए और अपनी अपनी ज़रूरत के बकद्र (पानी जमा कर के) साथ ले लिया।

[बैहकी फीदलाइलिनबुवह १९८५, अन आसिम बिन उमर बिन कतादा (र.अ)]

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3. एक फर्ज के बारे में:

नमाज़ों को सही पढ़ने पर माफी का वादा

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया:

“पाँच नमाजें अल्लाह तआला ने फ़र्ज़ की हैं, जिस ने उन के लिए अच्छी तरह वुजू किया और ठीक वक्त पर उन को पढ़ा और रुकू व सजदा जैसे करना चाहिए वैसे ही किया, तो ऐसे शख्स के लिए अल्लाह तआला का वादा है, के वह उस को बख्श देगा; और जिस ने ऐसा नहीं किया तो उस के लिए अल्लाह तआला का कोई वादा नहीं, चाहेगा तो उस को बख्श देगा और चाहेगा तो सज़ा देगा।”

[अबू दाऊद: ४२५,अन उबादा बिन सामित (र.अ)]

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4. एक सुन्नत के बारे में:

सुबह व शाम पढ़ने की दुआ

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

“जो शख्स इस दुआ को सुबह व शाम पढ़ेगा, तो अल्लाह तआला उस को खुश कर देगा:

“रजितु बिल्लाहि रब्बहु वा बिल इस्लामी दीना वा बी मुहम्मदिन नबियन”

तर्जमा : मैं अल्लाह तआला को अपना रब, इस्लाम को अपना दीन और मुहम्मदुर्ररसूलुल्लाह को अपना रसूल मान कर खुश हो गया।

[अबू दाऊद :५०७२, अन अबी सल्लाम (र.अ)]

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5. एक अहेम अमल की फजीलत:

रोज़ा जहन्नम से दूर करने का सबब

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया:

“जो शख्स एक दिन अल्लाह तआला के लिए रोज़ा रखेगा अल्लाह तआला उस से जहन्नम को सौ साल की मसाफ़त के बराबर दूर कर देगा।”

[नसई : २२५६, अन उक़्बा बिन आमिर (र.अ)]

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6. एक गुनाह के बारे में:

इस्लाम की दावत को ठुकराना एक बड़ा जुल्म

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है :

“उस शख्स से बड़ा जालिम कौन होगा, जो अल्लाह पर झूट बाँधे, जब के उसे इस्लाम की दावत दी जा रही हो और अल्लाह ऐसे ज़ालिमों को हिदायत नहीं दिया करता।”

[सूर-ए-सफ: ५]

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7. दुनिया के बारे में :

इन्सान की खस्लत व मिजाज

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

“इन्सान का हाल यह है के जब उस का रब उस को आज़माता है और उस को इज्जत व नेअमत से नवाजता है, तो कहने लगता है : मेरे रब ने मुझे बड़ी इज्जत अता फ़रमाई और जब उस का रब उस को (एक और अंदाज़ से) आजमाता है और उसकी रोजी तंग कर देता है, तो कहने लगता है: मेरे रब ने मुझे जलील कर दिया। “

[सूरह अल-फज्र 89: 15-16]

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8. आख़िरत के बारे में:

जन्नत का खेमा

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

 “जन्नत में मोती का खोल दार खेमा होगा, जिस की चौडाई साठ मील होगी। उस के हर कोने में जन्नतियों की बीवियाँ होंगी, जो एक दूसरी को नहीं देख पाएँगी और (अहले जन्नत) मोमिनीन अपनी बीवियों के पास आते जाते रहेंगे।”

[बुखारी : ४८७९, अन अब्दुल्लाह बिन कैस (र.अ)]

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9. तिब्बे नबवी से इलाज:

बीमार को परहेज़ का हुक्म

एक मर्तबा उम्मे मुन्जिर (र.अ) के घर पर रसूलुल्लाह (ﷺ) के साथ साथ हजरत अली (र.अ) भी खजूर खा रहे थे, तो आप (ﷺ) ने फ़रमाया: “ऐ अली! बस करो, क्योंकि तुम अभी कमजोर हो।”

[अबू दाऊद: ३८५६]

फायदाः बीमारी की वजह से चूंकि सारे ही आज़ा कमज़ोर हो जाते हैं, जिन में मेअदा भी है, इस लिए ऐसे मौके पर खाने पीने में एहतियात करना चाहिए और मेअदे में हल्की और कम ग़िज़ा पहुँचनी चाहिए ताके सही तरीके से हज़्म हो सके।

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10. नबी ﷺ की नसीहत:

सफो को पूरा करो

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया :

 “तुम पहली सफ को पूरा करो, फिर उस सफ़ को जो उस से मिली हुई हो और अगर कुछ कमी हो तो आखरी सफ़ में होनी चाहिए। (यानी अगली सफें मुकम्मल तौर पर पुर होनी चाहिए)”

[नसई : ८१९, अन अनस (र.अ)]

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