16. शव्वाल | सिर्फ पाँच मिनट का मदरसा (कुरआन व हदीस की रौशनी में)

  1. इस्लामी तारीख: उम्मुल मोमिनीन हज़रत हफ्सा (र.अ)
  2. हुजूर (ﷺ) का मुअजिजा: लागर और बीमार का शिफ़ा पाना
  3. एक फर्ज के बारे में: मस्जिद में नमाज़ अदा करना
  4. एक सुन्नत के बारे में: जहन्नम के अज़ाब से हिफाज़त की दुआ
  5. एक अहेम अमल की फजीलत: दो रकात पढ़ कर गुनाह से माफ़ी
  6. एक गुनाह के बारे में: मुअजिजात को न मानना
  7. दुनिया के बारे में : समुंदर इन्सानों की गिजा का ज़रिया है
  8. आख़िरत के बारे में: कयामत से हर एक डरता है
  9. तिब्बे नबवी से इलाज: कलौंजी से इलाज
  10. नबी ﷺ की नसीहत: भूके को खाना खिलाओ और बीमारों की इयादत करो

1. इस्लामी तारीख:

उम्मुल मोमिनीन हज़रत हफ्सा (र.अ)

.     हजरत हफ्सा (र.अ) हजरत उमर की साहबजादी और हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर की हकीकी बहन हैं, नुबुव्व त से पाँच साल पहले पैदा हुई, पहले हज़रत खुनैस बिन हुज़ाफ़ा से निकाह हूआ, वह गजव-ए-बद्र में शदीद जख्मी हो कर कुछ दिनों के बाद शहीद हो गए, तो हुजूर (ﷺ) ने उन से निकाह फ़रमाया

.     हज़रत हफ़्सा (र.अ) बड़ी फ़ज़ल व कमाल की मालिक थीं उनके बारे में इब्ने सअद ने लिखा है के वह दिन में रोजा रखतीं और रात में इबादत करती थीं, और आखिर तक उन का रोज़ा रखने का अमल जारी रहा, इखतिलाफ़ से बड़ी नफ़रत करती थीं, दजाल और उसके फितने से बहुत डरती थीं, उन्हें इल्मे हदीस व फ़िकह में भी महारत हासिल थी, हदीस की किताबों में इनसे साठ हदीसें बयान की गई हैं, जो उन्होंने हुजूर (ﷺ) और हजरत उमर (र.अ) से सुनी थीं।

.     हजरत अमीर मुआविया (र.अ) के दौरे खिलाफत में शाबान सन ४५ हिजरी में मदीना में उन का इन्तेकाल हुआ, मदीना के गवर्नर मरवान ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और जन्नतुल बक्री में दफ़्न की गई।

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2. हुजूर (ﷺ) का मुअजिजा

लागर और बीमार का शिफ़ा पाना

.     एक औरत अपने कमजोर और बीमार बच्चे को लेकर रसूलुल्लाह (ﷺ) की खिदमत में हाजिर हुई और कहने लगी : “या रसूलल्लाह ! इसकी इतनी उम्र हुई है, लेकीन इसकी हालत तो देखिये, दुआ कीजिए के अल्लाह इसे मौत दे दे”, तो हुजूर (ﷺ) ने फर्माया: नहीं बल्के में इसके लिए दुआ करता हुँ के अल्लाह इसे शिफ़ा अता फरमाए और जवानी बख्शे और नेक आमाल करने वाला बन जाए और फिर अल्लाह के रास्ते में किताल करते हुए शहीद हो जाए और जन्नत में चला जाए, चुनान्चे हुजूर (ﷺ) की दुआ की वजह से अल्लाह ने उसे शिफ़ा बख्शी और जवानी पाई और नेक आमाल भी किए और फिर अल्लाह के रास्ते में किताल करते हुए शहीद हो गए और फिर जन्नत में दाखिल हो गए। [बैहक़ी फी दलाइलिनबी: २४४१]

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3. एक फर्ज के बारे में:

मस्जिद में नमाज़ अदा करना

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया : “जो मुसलमान नमाज़ और अल्लाह तआला के जिक्र के लिए मसाजिद को अपना ठिकाना बना लेता है, तो अल्लाह तआला उस से ऐसे खुश होता हैं, जैसे घर के लोग अपने किसी घरवाले के वापस आने पर खुश होते हैं।”

[ इब्ने माजाह: ८००, अन अबी हरैराह (र.अ) ]

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4. एक सुन्नत के बारे में:

जहन्नम के अज़ाब से हिफाज़त की दुआ

जहन्नम के अज़ाब से बचने के लिए इस दुआ का एहतमाम करना चाहिये:

“ऐ हमारे परवरदिगार! हम ईमान लाए हैं लिहाजा हमारे गुनाह माफ़ कर और हमें दोजख के अज़ाब से बचा।”

[सूर-ए-आले इमरान: १६]

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5. एक अहेम अमल की फजीलत:

दो रकात पढ़ कर गुनाह से माफ़ी

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया :

“किसी से कोई गुनाह हो गया और फिर वुजू कर के नमाज पढ़े और अल्लाह तआला से उस गुनाह की माफ़ी मांगे, तो अल्लाह तआला उसको माफ़ कर देता है।”

[तिर्मिजी:४०६, अन अबी बक्र (र.अ)]

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6. एक गुनाह के बारे में:

मुअजिजात को न मानना

कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:

“जब हमारे रसूल उन पहली कौंमो के पास खुली हुई दलीलें लेकर आए तो वह लोग अपने इस दुनियावी इल्म पर नाज करते रहे, जो उन्हें हासिल था, आखिरकार उनपर वह अजाब आ पड़ा जिसका वह मजाक उड़ाया करते थे।”

[सूर-ए-मोमिन: ८३]

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7. दुनिया के बारे में :

समुंदर इन्सानों की गिजा का ज़रिया है

कुरआन में अल्लाह तआला फ़र्माता है:

“अल्लाह तआला ही ने समुंदर को तुम्हारे काम में लगा दिया है, ताके तुम उसमें से ताजा गोश्त खाओ और उसमें से जेवरात (मोती वगैरह) निकाल लो, जिनको तुम पहनते हो और तुम कश्तियों को देखते हो, के वह दरया में पानी चीरती हुई चली जा रही है, ताके तुम अल्लाह तआला का फ़ज़ल यानी रोजी तलाश कर सको और तुम शुक्र अदा करते रहो।”

[सूर-ए-नहल: १४]

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8. आख़िरत के बारे में:

कयामत से हर एक डरता है 

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया :

“कोई मुकर्रब फ़रिश्ता, कोई आस्मान, कोई ज़मीन, कोई हवा, कोई पहाड़, कोई समुंदर ऐसा नहीं,जो जुमा के दिन से न डरता हो (इस लिए के जुमा के दिन कयामत कायम होगी।”

[इब्ने माजा: १०८४, अबू लुबाबा]

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9. तिब्बे नबवी से इलाज:

कलौंजी से इलाज

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया :

“बीमारियों में मौत के सिवा ऐसी कोई बीमारी नहीं जिस के लिए कलौंजी में शिफा न हो।”

[मुस्लिम:५७६८, अन अबी हुरैरह (र.अ)]

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10. नबी ﷺ की नसीहत:

भूके को खाना खिलाओ और बीमारों की इयादत करो

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया :

“कैदियों को छुड़ाओ, भूके को खाना खिलाओ और बीमारों की इयादत करो।”

[बुखारी:३०४६, अन अबी मूसा (र.अ)]

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